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'बीमार आंगनबाडिय़ों में दम तोड़ रही है सरकार की मंशा

Updated: IST Raisen
रायसेन. बच्चों की सेहत बनाने और बेहतर शारीरिक विकास के लिए सरकार ने आंगनबाडिय़ां खोलकर यहां छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा के साथ पोषण आहार और खेल-कूद की सुविधाएं देने के इंतजाम किए गए हैं। साथ ही आंगनबाडिय़ों में महिलाओं के लिए भी योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन तंग कमरों में, गली कूचों में खुली आंगनवाडिय़ों में सरकार की मंशा दम तोड़ रही है।

रायसेन. बच्चों की सेहत बनाने और बेहतर शारीरिक विकास के लिए सरकार ने आंगनबाडिय़ां खोलकर यहां छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा के साथ पोषण आहार और खेल-कूद की सुविधाएं देने के इंतजाम किए गए हैं। साथ ही आंगनबाडिय़ों में महिलाओं के लिए भी योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन तंग कमरों में, गली कूचों में खुली आंगनवाडिय़ों में सरकार की मंशा दम तोड़ रही है। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में खोली गई आंगनबाडिय़ां सिर्फ दिखाबा बनकर रह गई है। आंगनबाडिय़ों के समस्याओं से घिरे होने के कारण बच्चों को पूर्ण रूप से योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। कई जगह तो कागजों में ही आंगनबाडिय़ों का संचालन किया जा रहा है। कहीं दो-चार बच्चों की मौजूदगी को दर्जनों में बताकर कागजी खानापूर्ति की जा रही है। यह हाल ग्रामीण अंचलों में ही नहीं बल्कि शहरी क्षेत्र में भी दिखाई दे रही है।

महिला बाल विकास के अधिकारी कागजी कार्रवाई के भरोसे ही वाहवाही लूटने में लगे हुए हैं। न तो बच्चों का कुपोषण दूर हो रहा है और न ही इसके लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। आंगनबाडिय़ों में सुविधाओं की कमी होने के कारण जहां बच्चों की संख्या प्रतिदिन घटती जा रही है। लेकिन सरकारी रिकार्ड में बच्चों की संख्या शत-प्रतिशत बताते हुए शासन को चूना लगाया जा रहा है। हकीकत जानने के लिए जिले के अधिकारियों के पास समय नहीं है। हर व्यवस्था एक तय शुदा व्यवस्था के तहत फील्ड के अधिकारियों को सौंपी गई है, जो अपने दफ्तरों में बैठकर कागज तैयार कर जिला अधिकारी तक भेजते हैं।

नहीं बने भवन

जिले में कुल स्वीकृत आंगनबाड़ी 1379 हैं, मिनी आंगनबाड़ी 373 हैं। इसमें से 56 1 आंगनबाड़ी किराए के छोटे-छोटे कमरों में जैसे-तैसे सुविधाओं के अभाव में संचालित हो रही हैं। वहीं 770 आंगनबाड़ी विभागीय एवं अन्य शासकीय भवनों में भी बमुश्किल संचालित हो पा रही हैं। वहीं जिले में 48 आंगनबाड़ी ऐसी भी है, जिन्हें न खुद का और न ही किराए का कमरा नसीब हुआ है। इसी तरह 182 मिनी आंगनबाड़ी किराए के कमरों में संचालित हो रही हैं और 174 विभागीय एवं अन्य शासकीय कमरों में संचालित हो रही हैं।


143 आंगनबाड़ी में शौचालय नहीं

विभागीय आंकड़ों को ही देखा जाए तो जिले की 143 आंगनबाडिय़ों में शौचालय उपलब्ध नहीं है। वहीं विद्युत सुविधा की बात की जाए तो 924 आंगनबाड़ी में बिजली नहीं है। इसी तरह 219 आंगनबाड़ी ऐसी हैं जहां बच्चों के अनुकूल शौचालय नहीं है। वहीं जिले की 920 आंगनबाडिय़ों में शिशु गृह नहीं हैं। 810 आंगनबाडिय़ों में चिकित्सा किट तक नहीं है। जबकि यह प्रमुख जरूरत है। इसी तरह 26 3 मिनी आंगनबाडिय़ों में बिजली नहीं है। 276 मिनी आंगनबाडिय़ों में शिशु गृह नहीं है। इन सुविधाओं के अभाव में भी जिले में आंगनवाडिय़ों का संचालन बेहतर बताया जाता है।


जिला मुख्यालय पर ही बदहाली

मुख्यालय सहित जिले भर में संचालित हो रही आंगनबाडिय़ों की दयनीय स्थिति से किसी से छिपी नहीं है। जब जिला मुख्यालय पर ही आंगनबाडियों की पड़ताल की गई तो वार्ड क्रमांक 4 गोपालपुर की आंगनबाड़ी एक छोटे से कमरे में संचालित होती है। यशवंत नगर की एक आंगनवाड़ी निजी भवन की दालान में लगती है, जिसमें कभी बच्चे दिखाई नहीं देते। आंगनवाडिय़ों में भोजन सप्लाई की स्थिति भी बदहाल है। मोटरसाइकल पर प्लास्टिक की कैन में दाल और कपड़े में रोटी बांधकर आंगनबाडिय़ों में वितरण किया जाता है।

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