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स्वतंत्र प्रभार की आस में अस्तित्व खोती जा रही उपमंडी

Updated: IST ratlam
3 वर्षों के बाद भी अधूरी मांग कब पूरी होगी। इस पर अब भी संशय बना हुआ है। प्रदेश की उपमंडियों में प्रथम श्रेणी का दर्जा प्राप्त नगर की मंडी की लंबे समय से अनदेखी के कारण यहां न तो व्यापार बढ़ा और न हीं किसान के आने का क्रम बढ़ा है।

रतलाम/जावरा. जावरा शहर की मंडी की में शामिल बड़ावदा नगर की उपमंडी को 33 वर्षों से स्वतंत्र मंडी में तब्दील होने का इंतजार है। स्वतंत्र प्रभार की आस में उपमंडी अपना अस्तित्व ही खोती जा रह ीहै। 33 वर्षों के बाद भी अधूरी मांग कब पूरी होगी। इस पर अब भी संशय बना हुआ है। प्रदेश की उपमंडियों में प्रथम श्रेणी का दर्जा प्राप्त नगर की मंडी की लंबे समय से अनदेखी के कारण यहां न तो व्यापार बढ़ा और न हीं किसान के आने का क्रम बढ़ा है। यहां स्वतंत्र प्रभार की मंडी का संचालन शुरु हो तो इस क्षेत्र के साथ ही नागदा, खाचरौद तक के सैकड़ों किसानों को इसका सीधा लाभ होगा, लेकिन लंबे समय से इसके लिए आवाज नहीं उठी है।

33 वर्षो के उपरांत भी स्वत्रंत मंडी का दर्जा प्राप्त नही कर पाई

मध्यप्रदेश की उपमंडियों में से बड़ावदा की उपमंडी भी अच्छी उपमंडी की गिनी जानेें लगी थी। वर्ष 1983 से अपने अस्तित्व में आई कृषि मंडी 33 वर्षो के उपरांत भी स्वत्रंत मंडी का दर्जा प्राप्त नही कर पाई है। इस दौरान यहां मैथी, गेंहू, मक्का, सोयाबीन, चना आदि जिंसों की बंपर आवक होने से प्रदेश की उपमंडी में प्रदेश की प्रथम मंडी का दर्जा प्राप्त होने लगा था, लेकिन जावरा मंडी प्रशासन की अनदेखी के कारण यह मंडी अपना स्वत्रंत प्रभार के बजाए ख़ुद अस्तित्व खोती जा रही है। विगत 5 वर्षो से मंडी के हाल बेहाल हो गए है। दिनोंदिन किसानों का रुख मंडी से हटने गला है। जहां हजारों की बोरी की आवक होती थी वहां अब पांच-सात सौ बोरी तक ही आकर सिमट गई। जिम्मेदार समय रहते हुए अब भी ध्यान दे दे तो निश्चत ही नगर की यह उपमंडी जो विरान होने लगी है अपनी पुरानी स्थिति आ सकती है। नगर का व्यापार पूरा इस पर केंद्रित है। जिससे लोगो को रोजगार में पर्याप्त सहायक है। मंडी में आवक कम होने से लोग बहार की और रुख कर पलायन कर रहे है।

गेट पर नाम तक नहीं

पूरी मंडी विरान सी दिखती है

कृषि उप मंडी के मुख्य प्रवेश द्वार पर रंगीन प्लेन कलर कर रखा है, लेकिन इस पर नाम नहीं अंकित कर रखा है। इस रोड से निकल ने वाले को पता ही नही चलता है कि यहां पर मंडी है। जब अंदर की और नजऱ डाले तो पूरी मंडी विरान सी दिखती है और तो और यहां पर कोई भूले भटके माल लेकर आ जाता तो उसको शौचालय व बाथरूम तक की सुविधा यहां नहीं मिलती है। व्यापारियों की दृष्टि से देखा जाए तो उनके लिए भी सुविधा के नाम पर कुछ नही है। हाल ही में मानमल सकलेचा की मंडी प्रांगण से 40 हजार रूपए की सरसों चोरी हो गई है। एक मात्र चोकीदार है। ऐसे में इतने बड़े प्रांगण में निगरानी रखना संभव नहंी हो पाता है। यहां पर सीसी टीवी कैमरे तक उपलब्ध नही है। जिससे उनके माल की सुरक्षा नही हो पा रही है। कृषि उपमंडी द्वारा व्यापारियों से शुल्क वसूलने पर भी सुविधा न के बराबर यहां दी जा रही है। मंडी शुल्क वर्ष 2016 अप्रैल से जनवरी 2017 तक कुल प्रवेश शुल्क 8 लाख चार हजार 61 आय प्राप्त हुई है। इन्हीं कारणों से जावरा-उज्जैन टूलेन के समीप होने के बाद भी उपमंडी विरान सी हर समय रहती है।

यहां लेवाल ही नहीं मिलते
नगर की कृषि उपमंडी में माल लेकर आने के घंटो खड़े होने के बाद लेवाल नही मिलते है। किसान के लिए कोई सुविधा भी नहीं है। -मोहनलाल गामी, कृषक बड़ावदा

परिवार चलाने में होने लगी दिक्कत
नगर की उपमंडी में आवक दिन बे दिन कम होने से अब परिवार चलाने में भी दिक्कत होने लगी है। यहां पर्याप्त रुप से हम्माली भी नहीं हो पाती है। मंडी बोर्ड को यहां के हम्मालों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कर जावरा मंडी में हम्मालों की उचित व्यवस्था करना चाहिए-मोमिन खान, हम्माल बड़ावदा

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