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137 साल से एक ही परिधान पहन रही है हमारी गणगौर

Updated: IST jaipur gangaur
सुपारी की काष्ठ से है बनी, जयपुर में बनी है प्योर कॉटन की ड्रेस, तत्कालीन महाराजा माधो सिंह द्वितीय ने बनवाई थी

जयपुर में हर साल निकलने वाली गणगौर की शाही सवारी तो देश-दुनिया में मशहूर है ही लेकिन इससे भी खास बात जयपुर की गणगौर से जुड़ी है वो है गणगौर का लाल परिधान। गुलाबी नगर की गणगौर 137 साल से वही लाल रंग का परिधान पहन रही है जो तत्कालीन महाराजा माधोसिंह द्वितीय ने बनवाया था। लाल रंग के कॉटन से बने परिधान पर सोने-चांदी का भारी वर्क किया हुआ है जो अपने आप में बेहद खास है।

इसलिए खास है गणगौर का परिधान

जानकारी के मुताबिक वर्ष 1880 में तत्कालीन महाराजा ने प्यॉर कॉटन से बनी लाल रंग की ड्रेस तैयार करवाई थी। इस पर गुलाबी नगर शैली में चांदी का गोटा पत्ती वर्क किया गया है। गणगौर के परिधान में लाल रंग की ओढऩी, कुर्ती, कांचली और घाघरा शामिल है। ओढऩी के चारों तरफ गोटा किरन लगी हुई है। किनारों पर केरी की डिजाइन बनी है। साथ ही गणगौर के केसरिया रंग का जामा बनवाया गया, जिस पर गोल्ड वर्क किया गया है।

महाराजा भी पहनते थे लाल वस्त्र

शाही सवारी के दौरान 1880 से ही गणगौर माता को यही लाल पोशाक धारण करवाई जाती है। तब से जयपुर के तत्कालीन महाराजा भी खुद लाल पोशाक पहनकर सवारी में शामिल होते थे। दरबारियों साथ चलने वाले लोग भी लाल वस्त्र पहन कर चलते थे। तत्कालीन महाराजा चौगान की मोती बुर्ज पर अपने सामंतों के साथ बैठ कर उत्सव का आनंद लेते थे। वहीं, बाहर से आए हुए मेहमानों की व्यवस्था चीनी की बुर्ज पर होती थी। देर शाम तक नाच—गाने का कार्यक्रम चलता था।

सुपारी की काष्ठ से बनी प्रतिमा

जयपुर में गणगौर की जो प्रतिमा बनी है वो सुपारी की काष्ठ से बनी है। गणगौर का ये परिधान जयपुर के कारीगरों ने तैयार किया था। गणगौर के आभूषणों की बात करें तो प्राचीन काल से सोने की लड़, हार, कंगन, बोरला, पूंच, बंगड़ी, हथफूल और पायल आदि आभूषण धारण करवाए जाते हैं। गणगौर का तख्ता रवा चांदी से बना है।

एक ही है गणगौर सवारी का रूट

जानकारी के अनुसार वर्ष 1880 से ही गणगौर की सवारी जनानी ढ्योडी से निकल कर त्रिपोलिया गेट, अंजीर का दरवाजा, चौहत्तर दरवाजा, सिंहपोल से निकलकर पाल का बाग पहुंचती थी। गणगौर का मुख तालकटोरे की ओर रखा जाता था। पूर्व राजघराने की तत्कालीन रानियां और राजकुमारियां गणगौर माता को पान का बीड़ा, मिठाई और फल अर्पित करती थीं। आज भी गणगौर की सवारी का यही रूट है। पूर्व राजघराने के सदस्य रियासतकाल से चली आ रही इस परम्परा को निभा रहे हैं।

गणगौर का लाल रंग का परिधान 1880 में बनाया गया था। तब से अब तक गणगौर माता को वही ड्रेस पहनाई जा रही है। अनेक वर्षों में भारतीय त्यौहारों और मेलों में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन सदियों बाद भी गणगौर की सवारी का पारंपरिक आकर्षण बना हुआ है।

- पंकज शर्मा, सिटी पैलेस

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