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शक्ति का स्वरूप

Updated: IST shakti puja
हमारी इस सृष्टि में निर्माण-स्थिति एवं संहार की प्रक्रिया सतत चलती रहती है

- गुलाब कोठारी

हमारी इस सृष्टि में निर्माण-स्थिति एवं संहार की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। और इस प्रक्रिया में कम से कम दो तत्त्व होते हैं- ब्रह्म और माया। विज्ञान कहता है कि सृष्टि में दो तत्त्व मूल में हैं। एक पदार्थ तथा दूसरा ऊर्जा यानी मैटर और एनर्जी। दोनों एक दूसरे में बदलते रहते हैं, किन्तु इनका हृास नहीं होता। वेद भी ब्रह्म और माया को ही इन दो तत्त्वों के रूप में देखता है। आगे जाकर इन्हीं को अग्नि-सोम के नाम से व्यवहार किया जाता है। आकाश में ये ही सूर्य-चंद्रमा है, पर्जन्य और सोम है, पृथ्वी और वर्षा भी यही है, नर-नारी भी इन्हीं का रूपान्तरित अग्नि-सोम रूप है। अर्थात् नर-नारी भी तत्त्व रूप हैं, मात्र देह नहीं हैं। अग्नि-सोम के इस तात्विक स्वरूप को योषा-वृषा कहते हैं।

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समय के साथ नर-नारी के देह में तो कोई परिवर्तन नहीं आया, किन्तु चिंतन और जीवन शैली में बहुत परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन किस सीमा तक हितकर है तथा कहां जाकर विष उगलने लगता हैं, किसी को इसका आकलन करने का समय नहीं मिलता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्त्री अपनी भोग्या रूप को भी नहीं समझा पा रही और भोक्ता रूप में सफल भी नहीं हो पा रही। स्त्री (देह में) पुरुष के साथ स्वतंत्रता एवं समानाधिकार के साथ- जीने को उत्सुक है। उसे शायद स्वतंत्रता के अर्थ भी नहीं मालूम। क्या चंद्रमा सूर्य से स्वतंत्र हो सकता है या पृथ्वी बिना वर्षा के औषधि और वनस्पति पैदा कर सकती है? इनको तो संवत्सर के तंत्र को शिरोधार्य करना ही पड़ेगा। इस सम्बन्ध में कुछ बिन्दु हैं चिन्तन के लिए :-

द्वैत सृष्टि है, अद्वैत ब्रह्म है। दोनों मिलकर ही संस्कृति का निर्माण करते हैं। संस्कृति केवल नाच-गाना नहीं है जैसा कि सरकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दिखाई पड़ता है। मूल में तो साहित्य ही संस्कृति का प्रतिनिधि है। इसमें इतिहास भी है और अध्यात्म भी। जीव भी है और ईश्वर भी। परा विद्या-अपरा विद्या, ज्ञान-विज्ञान, ब्रह्म और माया सब साहित्य का अंग है। विश्व का अव्यक्त भाग ही मानव में भूतात्मा कहलाता है, सूर्य भाग बुद्धि, चन्द्र-भाग मन तथा पार्थिव भाग शरीर कहलाता है। इन चारों का अधिष्ठाता ईश्वर अव्यय है।

ईश्वर अव्यय की तरह ही जीव अव्यय का अभिन्न संस्कृति स्वरूप है। इसके प्रकृति रूपा अव्यक्त से भूतात्म प्रकृति, सूर्य से बुद्धि प्रकृति, चन्द्र मन: प्रकृति एवं पृथ्वी से शरीर प्रकृति है। मूल में मानव का यही सांस्कृतिक स्वरूप है। प्रकृति-पुरुष के इस समष्टि स्वरूप का नाम ही संस्कृति है। अग्नि-सोमात्मक जगत् में पुरुष-प्रकृति का विवर्त रूप ही नर-नारी है। नर केन्द्रगत शक्तिमान है, वहीं मायाभाव, प्रकृति उस ब्रह्म के नित नए विवर्त भाव स्रष्ट करती रहती है। सृष्टि के लिए प्रकृति-पुरुष का युगल भाव अनिवार्य है। अकेले प्रकृति या पुरुष से सृष्टि नहीं होती। प्रकृति कभी प्रकृति से संचालित नहीं होती। पुरुष ही प्रकृति का संचालक बना करता है। ''मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।'' अव्यय पुरुष के नियंत्रण में ही प्रकृति विश्व निर्माण में समर्थ है।

जिस संस्कृति का समाज से, सभ्यता से, राजनीति आदि से सम्बन्ध हो, वह संस्कृति नहीं है। मूल में अधिदैवत-तंत्र ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा अध्यात्म ही परोक्ष रूप से अधिभूत का संचालन करने की क्षमता रखता है। भूत कभी भूत का संचालन नहीं कर सकता। यदि भूत को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, तब अपने तमोगुण से स्वयं ही समय के साथ नष्ट हो जाता है। विज्ञान कभी विज्ञान का नियंत्रण नहीं कर सकता, ज्ञान ही विज्ञान का नियन्ता बनता है। शरीर आत्मा से अलग होकर प्राणवान् नहीं रहता। हमारे अन्तर्जगत् का प्राणरूप अक्षरात्मा ही अपेक्षाकृत सूक्ष्म-स्थूल-स्थूलतर-स्थूलतम बहिर्जगत् रूप क्षर आत्मा का आश्रय स्थल बना हुआ है। इसी आश्रय-आश्रित भाव परम्परा का जब हम मानव के स्वरूप संदर्भ में सोचें, तो हमें प्राकृतिक-आधिदैविक-ईश्वरीय परम्परा का ही यथाक्रम प्राप्त होता है। प्रकृति में पंचभूत-आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, अधिदैवत में-स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी तथा मानव संस्था में-अव्यक्त, महान्, बुद्धि, मन, शरीर नामों से व्यवहृत हुए दिखते हैं। इसी आधार पर भारतीय ज्ञान धारा त्रिसत्यवाद (त्रि: सत्या: वै देवा:) रूप है। भारतीय तत्ववाद को ईश्वर-जीव-जगत् रूप माना है। इसी को पुरुषार्थ चतुष्ट्य का धर्म-अर्थ-काम भी कहा जा सकता है। मोक्ष तो प्रत्येक जीव का लक्ष्य रहता है।

सृष्टि के विस्तार को अथवा अपूर्व की प्राप्ति को यज्ञ कहा है। अत: यज्ञ ही वेद का केन्द्र बिन्दु है। वेद चूंकि प्रजापति ब्रह्मा के मुख से प्रकट हुए हैं, 'एकोहं बहुस्याम्' की व्याख्या करते हैं। बहुस्याम् ही अपूर्व की उत्पत्ति का स्वरूप है, जिसका आधार भी मिथुन भाव (युगल रूप) ही बनता है। वेद भी अग्नि-सोम का युगल ही है। सृष्टि में तो पदार्थ और ऊर्जा, ब्रह्म और माया, नर-नारी आदि युगल रूप में ही व्यवस्थित हैं तथा एक नित्यक्रम में कार्यरत हैं। क्षर सृष्टि में इनको ही प्रकृति-पुरुष कहते हैं। अक्षर सृष्टि में कारण रूप में, इन्हीं को योषा-वृषा के नाम से जाना जाता है। वृषा का अर्थ है- सोम का वर्षण करना तथा योषा का अर्थ है- मिश्रित करने वाला। सोम जब अग्नि में आहुत होता है, तब अग्नि उसे मिश्रित करके निर्माण करने लगता है। चयन प्रक्रिया श्ुारू होती है। यह चिति अग्नि की ही कही जाती है। निर्मित पिण्ड भी अग्नि पिण्ड ही होता है।

सृष्टि प्रक्रिया के संदर्भ में पूर्व के देशों का यिन-यांग का सिद्धांत भी युगल रूप में प्रचलित है तथा पश्चिम का क्रोमोसोम का विवेचन भी ङ्ग तथा ङ्घ रूप में युगल तत्त्व स्वरूप ही है। वहां टेस्ट-ट्यूब-बेबी पैदा होने लगे, किन्तु यह जैविक निर्माण है। शरीर प्रधान है- पदार्थ और ऊर्जा भाव तथा भौतिक वातावरण ही यहां प्रमुख हैं। वेद में प्रत्येक निर्माण के केन्द्र को मन कहते हैं। ब्रह्म के मन में 'एकोहं बहु स्याम्' की इच्छा पैदा हुई थी। जहां मन होता है, वहां पदार्थ की भी दो गतियां होती हैं- ऊध्र्वगति और अधोगति। शरीर में यह संभव नहीं है। वेद शरीर को भिन्न इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करता, वरन्, सम्पूर्ण सृष्टि प्रक्रिया की ही एक कड़ी मानता है। सृष्टि प्रक्रिया में शरीर आवश्यक हो सकता हैं, किन्तु कारण कभी भी नहीं हो सकता। क्षर सृष्टि का कारण तो अक्षर सृष्टि में ही रहेगा। जैसे मानव सृष्टि का योषा-वृषा भी अक्षर रूप है। अक्षर सृष्टि देव प्राणों पर आधारित है। इसके जनक हैं पितृ प्राण व ऋषि प्राण। इनके सहयोग के बिना देव-अक्षर या क्षर पैदा नहीं हो सकते। वेद में जीव की उत्पत्ति में सात पितृ-प्राणों का योग प्रमाणित किया है, जो भौतिक विज्ञान में नहीं है। सात पीढिय़ों के पूर्वजों के अंश इस योषा-वृषा में सम्मिलित रहते हैं तथा हमारे अंश भावी सात पीढिय़ों तक पहुंचते हैं।

दूसरा पक्ष यह भी है कि योषा-वृषा का विवेचन करते समय जब तक हम शरीर के साथ मन-बुद्धि-आत्मा (अध्यात्म) को भी सम्मिलित नहीं करेंगे, तब तक हम शरीरपरक मिथुन भाव तक ही सीमित रह जाएंगे। मानव देह तो पैदा कर सकेंगे, अभिमन्यु की कल्पना नहीं कर सकते। काम पुरुषार्थ की उस उदात्त अवधारणा का स्पर्श नहीं कर पाएंगे, जो सृष्टि का मूल है। ''कामस्तदगे्र समवर्तताधि...'' अभिप्राय यह है कि जीव शरीरों के सर्जन की प्रक्रिया केवल शरीर पर ही निर्भर नहीं है। वह दो मनों का मिलन तो है ही, दो आत्मरूपों का मिलन भी है। इसमें हमारे पिछले जन्मों के कर्मफल भी अपना प्रभाव डालते हैं। दाम्पत्य की भारतीय अवधारणा आत्मिक ही है, शारीरिक नहीं है।

पश्चिम के प्रभाव में दाम्पत्य सम्बन्धों की यह आध्यात्मिक पृष्ठभूमि धुंधली पड़ती जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वी प्रदेश अग्नि प्रधान तथा पश्चिमी देश सोम प्रधान क्षेत्र है। वहां के नर-नारी शरीर पर प्रकृति के प्रभाव एक से नहीं हो सकते। एक-दूसरे की नकल के परिणाम या दुष्परिणाम भी सामने आते जा रहे हैं। विवाह-विच्छेद की बढ़ती घटनाएं, 'लिव-इन-रिलेशन'- जैसी अवधारणाएं तथा समलैंगिकता जैसी मानसिक विकृतियां प्रकृति विरुद्ध आचरण ही तो हैं। इनको कानूनी मान्यता देना मानवता को पाशविक स्वछन्दता की ओर धकेलना ही है। परम्परागत विवाह संस्था तो आज मानो 'आउट-डेटेड्' हो गई। जबकि इस संस्था का वैज्ञानिक आधार सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। मनुष्य जब पशु योनि से विकास की ओर बढ़ता है, तब विवाह का स्वरूप कुछ प्राकृतिक नियमों की वैज्ञानिकता को स्वीकारता है। ऐसी किसी समाज व्यवस्था पर नहीं ठहरता, जिसे हम जब चाहें बदल डालें।

अग्नि सत्य है, सोम ऋत है। स्वयंभू, सूर्य, पृथ्वी सत्यलोक हैं। परमेष्ठी-चन्द्रमा सोम लोक हैं। परमेष्ठी लोक, स्वयंभू तथा सूर्य का आधार है, शक्ति है। चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी की आत्मा है। अग्नि को जब तक सोम उपलब्ध रहता है, वह प्रज्जवलित रहता है। सोम-प्रवाह के ठहरते ही अग्नि भी सोम ही बन जाता है। अग्नि स्वयं भी अपने चरम पर पहुंचकर सोम ही बन जाता है। सोम भी चरम पर पहुंचकर अग्नि का रूप ले लेता है। दोनों यथार्थ में एक ही है। अन्तर इतना ही है कि सोम सदा अग्नि में आहुत होता रहता है। सोम ऋत है- केन्द्र और आकृति विहीन है। अग्नि सत्य रूप है। सृष्टि का निर्माण सोम आधारित ही हैं, किन्तु स्वरूप आग्नेेय है। सोम के जल जाने के बाद जो बचता है, वह अग्नि ही बचता है।

दूसरी बात यह है कि सत्य सदा केन्द्र में ही रहता है। सोम ऋत होने से अग्रि को आवृत्त किए रहता है। सूर्य-अग्रि रूप केन्द्र के चारों ओर परमेष्ठी का सोम है। इसी का एक अन्य स्वरूप है- सूर्य तथा किरणें। किरणें ही सूर्य के सोम का निर्माण करती हैं। सूर्य के कार्य करती हैं। सूर्य स्वयं कुछ नहीं करता। नहीं करते हुए भी 'कर्ता' वही तो है। यह भारतीय दाम्पत्य भाव का श्रेष्ठ उदाहरण कहा जाता है। पति-पत्नी को अलग नहींं किया जा सकता। वे शरीर मात्र नहीं हैं। सन्तान के शरीर में पूरी उम्र बहते हैं।

सूर्य-चन्द्र का भी अग्नि-सोम रूप दाम्पत्य भाव है। इन्हीं के मिथुन भाव से ही 'संवत्सर' का निर्माण होता है। अग्नि-सोम के योग से ही ऋतुओं का निर्माण होता है। अग्नि-सोम के मिथुन भाव का आधार 'योषा-वृषा' का सिद्धांत ही है। पुरुष-प्रकृति को सृष्टि का संचालक कहा गया है। इसमें पुरुष केन्द्रस्थ अग्नि तथा प्रकृति आवरण रूप हैं, जिसके कारण पुरुष के भिन्न-भिन्न स्वरूप दिखाई देते हैं। पार्थिव मैथुनी सृष्टि में पुरुष को आत्मा तथा प्रकृति शरीर रूप होता है। शरीर का निर्माण भी प्रकृति द्वारा होता है तथा यही पुरुष का आवरण बनी रहती है। इस आवरण का नाम ही सृष्टि है।

सृष्टि के भी तीन धरातल हैं- आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक। कार्य प्रणाली समान है। आकाश से वायु, अग्रि, जल, पृथ्वी आदि बनने के सात-सात चरण हैं। जैसे सप्तलोक का तंत्र बना है। भू:, भुव:, स्व:, मह:, जन:, तप:, सत्यं रूप से। जल से फेन, शर्करा, पृथ्वी आदि सप्तचरण का निर्माण होता है। शरीर में अन्न से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्रादि सप्त धातुओं का निर्माण होता है। स्वरूप में सभी धरातल पंचपर्वा हैं- शरीर भी पंचकोश रूप है, तो स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी भी पंचपर्वा विश्व ही हैं। अग्नि-सोम की यज्ञात्मक भूमिका का आधार भी पांच स्तर का ही है। द्युलोक के अग्नि में परमेष्ठी श्रद्धा की आहुति, पर्जन्य में सोम की आहुति, पृथिवी पर वर्षा की आहुति, शरीर में अन्न की आहुति, स्त्री शरीर में शुक्र आहुत होकर गर्भ धारण प्रक्रिया पूर्ण होती है। आगे भी शरीर का निर्माण (कल्क से शरीर तक) सात स्वरूपों में ही बनता है। अर्थ यह है कि निर्माण जो भी हो, होता दो तत्त्वों के योग से ही है। ये तत्त्व विपरीत भाव के होते हैं। इसी को युगल सृष्टि कहते हैं।

शिव के पास अनुग्रह है। अव्यय पुरुष स्वयं कृष्ण हैं। कृष्ण आनन्द घन हैं। शिव का तो अर्थ ही कल्याण कारक है। ब्रह्म बंृहणशील हैं। सबका भरण-पोषण करने वाले हैं। सभी अनुग्रह के पर्याय हैं। सभी सूर्य और रश्मियों की भांति द्वैत भी हैं, अद्वैत भी हैं।

सृष्टि आरंभ में अद्वैत रूप तथा स्थूल धरातल पर द्वैत अधिक हैं। शैव और शाक्त दो सम्प्रदाय एक ही 'अद्वैत शिव' से निकले हैं। क्योंकि जहां शिव का ईश्वर भाव है, वहीं शक्ति का 'जीव' भाव है। व्यवहार में माया अथवा शक्ति ही दिखाई पड़ती है। ब्रह्म या शिव तो अवतरित होकर केन्द्रस्थ रहते हैं। अत: केन्द्र ही नर भाव है, सत्य है। स्वरूप बदलता रहता है।

सोम ही अग्नि की शक्ति है। बिना आधार (अग्नि) के सोम कहां टिक सकेगा? एक ही दूसरे में बदल रहा हैं। शिव ही शक्ति के गर्भ से 'सदाशिव' बनता है। परात्पर ही माया के गर्भ से अव्यय बनता है। इसी तरह नर ही नारी के गर्भ से पुत्र रूप में पैदा होता है।

शिव का विश्व रूप ही अभ्युदय है और विश्व का शिव में लीन हो जाना ही नि:श्रेयस है। पहला निर्माण काल है, दूसरा निर्वाण काल। यही शिव-शक्ति का दाम्पत्य भाव है। यही भारतीय विवाह संस्कार की मूल अवधारणा है। नारी यज्ञ में भागीदार बनकर पत्नी का स्वरूप ग्रहण करती है। यही सृष्टि निर्माण की कामना का प्रथम 'स्पन्द' कहलाता है। शक्ति ही कामना बनकर आहुत होती है। दाम्पत्य रति ही निर्माण की भूमि बनती है। इसी से वानप्रस्थ में देवरति का प्रादुर्भाव होता है, जो निर्वाण का मार्ग प्रशस्त करती है।

नर आग्नेय है- सत्य है, नारी सौम्या है- ऋत है। केन्द्र रहित है। कामनाघन है। अभ्युदय ही इस कामना का लक्ष्य है। नर केन्द्र में जीना चाहता है। अंशी में लीन होने को जीवनभर आतुर रहता है। दाम्पत्य भाव में नर की प्रधानता गृहस्थी को अध्यात्म से जोड़े रखती है। नारी की प्रधानता भौतिक सुखों का जाल फैलाए रखती है। मन की चंचलता, आसक्ति, राग-द्वेष आदि क्लेशों में भी उलझी ही रहती है। भीतर आत्मा उसकी भी नर ही है, किन्तु लक्ष्य भोग ही रहता है, योग नहीं रहता।

यही नारी पत्नी रूप में संकल्पित होकर पति की शक्ति बन जाती है। पति को पूर्णता प्रदान करके स्वयं भी पूर्ण हो जाती है। दोनों का अर्धनारीश्वर स्वरूप पूर्णता को प्राप्त होता है। समय के साथ विरक्ति भी पत्नी ही पैदा करती है। यह कार्य अन्य नारी नहीं कर सकती। इसी विरक्त भाव के कारण पूर्णता प्राप्त 'पति' अपने नि:श्रेयस् मार्ग का चयन कर पाता है। शक्ति ही पुरुष शरीर में सदाशिव को प्रकट कर देती है। शरीर शव, आत्मा सदाशिव।

जीवनभर शिव की चिद्रूपता केवल शक्ति के कारण ही बनी रहती है। शक्ति की कार्यरूपता उसे आवरित किए रहती है। उसकी गृहस्थी का संचालन, सम्बन्धी, स्वजन-परिजन, धर्म, समाज में वही पति का प्रतिनिधित्व करती है। संतान को संस्कारित करती है। ऐसा लगता है मानो वह पति को सांसारिक प्रपंचों से मुक्त रखने के लिए ही अपना सबकुछ त्यागकर आती है। यह आना ही पति (अग्नि) में आहुत हो जाना है। स्वयं के अस्तित्वों को लीन कर देना है। दिखाई दो देते हैं, किन्तु भीतर एक अद्वैत-बनकर शेष जीवन अविनाभाव रहते हैं।

हमारे 3 शरीर हैं- सूक्ष्म-स्थूल-कारण। नर-नारी दोनों के ही तीन-तीन शरीर हैं। तब योषा-वृषा क्या एक ही शरीर तक सीमित है? हमारा शरीर ऋषि, पितृ और देव प्राणों से निर्मित होता है। स्थूल शरीर भी पंचकोश युक्त है, पंच महाभूत निर्मित है, सप्त पितृ-पुरुषों से जुड़ा हुआ है। शुक्र-शोषित स्थूल भाव है, योषा-वृषा सूक्ष्म शरीर का धरातल है। इसमें भी मन नहीं होता। सृष्टि में मन केवल अव्यय पुरुष में ही रहता है- श्वोवसीयस मन। यह आत्मा के साथ, षोडशी पुरुष रूप में प्राप्त होता है। इसी के साथ चेतना का प्रवेश होता है। इसमें प्रारब्ध कर्म का योग भी रहता है।

आत्मा का अंश ही तो यज्ञ का मूल है। यह यज्ञ ही तप है, यही शुक्र (आत्मांश) का दान है। सृष्टि निर्माण क्रम ही धर्म है। स्तुति, सात्विक आत्मा के लिए प्रार्थना एवं देवभाव में यज्ञ करना ही श्रेष्ठ आत्मा (मुक्त विचरण करने वाली) को आकर्षित करते हंै। निर्माण प्रक्रिया मूलत: प्रकृति आधारित होती है। इसमें कार्यब्रह्म के अर्थवाक् तथा शब्दवाक् दोनोंं रूप कार्य करते हैं। सृष्टि की शुरुआत स्वयंभू लोक से ही होती है। यह वेदत्रयी (ऋक्-यजु-साम) का लोक है। इसमें यजु दो धातुओं से (यत्+जू) बनता है। यत् गति सूचक ऋषि प्राण है। जू स्थिति रूप आकाश है। आकाश ही सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करने में उपादान कारण बनता है। आकाश की तन्मात्रा नाद है। अत: हम कहते हैं कि नाद से ही सृष्टि होती है। वायु की अवस्था विशेष का नाम अग्नि है। शुक्र की आहुति से पूर्व योनि के आकाश में मंथन करके अग्नि पैदा की जाती है। अग्नि-सोम से आगे सृष्टि होती है। वायु ही कारक बनता है।

जन:, तप: और सत्यम् लोक आत्मा भाग बनते हैं। यही अव्यय पुरुष है। स्व:, मह: लोक अक्षर सृष्टि है। प्राणमय कोश है। इसी के भीतर आनन्दमय, विज्ञानमय और मनोमय कोष की स्थिति है। पृथिवी और चन्द्रमा से स्थूल शरीर का निर्माण होता है। यह पंच महाभूतों की सृष्टि है। इस प्रकार सातों लोकों की अभिव्यक्ति हमारे इस शरीर में होती है। शब्दवाक् सृष्टि में भी मूलाधार से सहस्रार तक सातों धरातल कार्य करते हैं। मूलाधार से पांच चक्र पांच महाभूतों से जुड़े हैं। आगे अव्यय क्षेत्र है। ब्रह्म और माया का प्रवाह अव्यय से ही शुरू हो जाता है, जो हमारा कारण शरीर बनता है। ब्रह्म हमारा आत्म-पुरुष एवं माया इसके आवरणों का निर्माण करती है। यही अक्षर सृष्टि में अग्नि-सोम हैं, तथा क्षर सृष्टि में अन्नाद-अन्न हैं। अक्षर और क्षर मिलकर ही अव्यय पुरुष की प्रकृति कहलाते हैं।

वैदिक विज्ञान में पुरुष को तत्त्व रूप माना गया है। ब्रह्म के विवर्त के लिए उसी की दो इकाइयां बन जाती हैं- ब्रह्म और माया। प्रजोत्पत्ति की भी यज्ञ संज्ञा है। एक से अधिक विजातीय पदार्थों एवं तत्त्वों के रासायनिक मिश्रण से जो नया भाव पैदा होता है, वही यज्ञ का स्वरूप है। इसी यज्ञ विधान से सम्वत्सर में सृष्टि का विस्तार होता है तथा इसी की प्रतिकृति मानवकृत यज्ञ को माना गया है। जगत् अग्नि सोममय है। इन्हीं के यजन से सृष्टि होती है।

मानव शरीर में योषा-वृषा नामक तत्त्वों को सन्तान का उत्पादक माना गया है। नारी-नर को इन तत्त्वों का वाहक माना गया है। योषा नारी शरीर में काम तत्त्व का सृजन करता है। यही कार्य नर शरीर में वृषा तत्त्व करता है। शोणित स्वरूप से अग्नि है, जिसका स्वामी लाल रंग का मंगल ग्रह है। यह पराक्रमी ग्रह माना जाता है। नारी रुधिर में काम आग्नेय प्राण रूप स्थित रहता है। यही काम नर शरीर में शुक्र में वास करता है। इसका स्वामी और निर्माता शुक्र ग्रह होता है। शुक्र स्वभाव से सोम (नारी) है, अत: नारी के लिए आकर्षण बनता है। नारी शरीर में व्याप्त अग्नि (नर) होने से नर के लिए आकर्षण बनता है।

योषा दृष्टि से नारी अन्त:रूप से नर (शोणित) और शुक्र दृष्टि से नर सौम्य है। शरीर रचना की दृष्टि से नर अग्नि प्रधान और नारी सौम्या है। अर्थात् दोनों शरीर नर भी हैं और नारी भी हैं। शरीर से नर, नर है, सप्तम धातु शुक्र की दृष्टि से नारी है, शुक्र में निहित वृषा प्राण से पुन: नर है। इसी प्रकार नारी भी शरीर से नारी, शोणित से नर भावात्मक तथा भीतर योषा प्राणों से पुन: नारी ही है। इससे यह भी स्पष्ट है कि सन्तान प्राप्ति का कारण नारी-नर का मिथुन कर्म मात्र ही नहीं है, बल्कि योषा-वृषा का सम्बन्ध मूल है। यदि योषा-वृषा का मेल न हो, या दोनों में से एक प्राण का हनन हो जाए तो मात्र शरीर सम्बन्ध से सन्तान पैदा नहीं हो सकती। योषा-वृषा के मेल से बिना शरीर सम्बन्ध के भी सन्तान उत्पन्न हो सकती है। टेस्ट ट्यूब बेबी इसका उदाहरण है। पं. मोतीलाल शास्त्री ने शतपथ ब्राह्मण के विज्ञान भाष्य में योषा-वृषा का विस्तृत विवेचन किया है।

नर का शरीर भूताग्निप्रधान होने से वृषा है, अतएव शरीरदृष्टया नर-नर है। नारी का शरीर भूतसोमप्रधान होने से योषा है, अतएव शरीरदृष्टया नारी-नारी है। नर का शरीर आग्नेय है, अतएव वह नर है। नारी का शरीर सौम्य है, अतएव वह नारी है। एवं इस भूताग्नि, भूतसोम से सम्बद्ध शरीरों की दृष्टि से नर को नर कहना, नारी को नारी कहना यथार्थ है। प्रतिष्ठाग्नि तथा प्रतिष्ठासोम की दृष्टि से जब विचार किया जाता है, तो नर वास्तव में नारी है, एवं नारी वास्तव में नर है। नर के आग्नेय शरीर की प्रतिष्ठा शुक्र माना गया है। शुक्रसत्ता ही नर सत्ता का कारण है। शुक्र सौम्य है। सौम्य नारीतत्त्व शोणितरूप से नर की प्रतिष्ठा है।

नर-नारी का प्रथम युग्म गर्भस्थिति का कारण नहीं है। नर का सौम्य शुक्ररूप नारीतत्त्व, नारी का आग्नेय शोणितरूप नरतत्त्व, नारी-नर का युग्म कहा जाता है, इस द्वितीय युग्म से भी गर्भस्थिति नहीं होती। 'योषा-वृषा' के युग्म से प्रजननकर्म सम्पन्न होता है। सौम्य शुक्र के गर्भ में प्रतिष्ठित रहने वाला 'पुंभ्रूण' आग्नेय वृषाप्राणप्रधान है। यही शुक्र की प्रतिष्ठा है। आग्नेय शोणित के गर्भ में प्रतिष्ठित रहने वाला 'स्त्रीभू्रण' योषाप्राणप्रधान है, यही शोणित की प्रतिष्ठा है। जब तक इन दोनों भू्रणों का दाम्पत्यभाव नहीं हो जाता, तब तक शुक्र-शोणित का मिथुनभाव व्यर्थ है। यह तीसरा मिथुनभाव ही गर्भस्थिति का कारण है। नर-नारी विवाहसूत्र में बद्ध होते हैं, ऋतुकाल में यथा नियम दाम्पत्यभाव का अनुगमन कर ऋण से उऋण होते हैं।

दाम्पत्यभाव में वह नारी नर-शरीर के साथ ऐक्य-भाव में आती हुई शुक्रग्रहणकाल में कम्पित हो जाती है। यही इसका गर्भरसकाल (शुक्रग्रहणकाल) है। इस समय शुक्र शोणित का परस्पर ओत-प्रोत भाव होता है। पुंभ्रूणाधिक्य से नर, नारीभ्रूणाधिक्य से कन्या, दोनों के साम्य से नपुंसक सन्तान, यथापरिस्थिति तीनों में से एक सन्तान गर्भीभूत हो जाती है। गर्भीभूत इन सन्तानों का पोषण मातृभुक्त अन्न द्वारा होता है अतएव गर्भस्थ शिशु की (अन्नवान्) संज्ञा हो जाती है। वही शुक्राहुति मातृगर्भाशय में प्रविष्ट हो अपत्यरूप (सन्तान) में परिणत होती है।

इसमें एक तथ्य स्पष्ट है कि नर शरीर स्थित शुक्र संस्था का स्थायी भाव है। बीजी स्वरूप है, जिसमें सात पीढिय़ों के अंश रहते हैं। यही वृषा तत्त्व है। शुक्र तो मात्र वाहक और संरक्षक का कार्य करता है। स्वयं में बीज नहीं होता। इसी प्रकार शोणित का स्वरूप अस्थायी माना है।

धरती रूप है। सन्तान की पहचान बीजी पिता से होती है, मातृभाव (सौम्या) अग्नि में आहुत रहता हुआ गौण ही रहता है। मूल में तो पुरुष आत्मा का वाचक है। स्त्री-पुरुष दोनों आत्मा के ही रूप हैं। अत: दोनों ही पुरुष हैं।

प्रकृति में चन्द्रमा को सूर्य की पत्नी माना गया है। सूर्य के प्रकाश से ही चन्द्रमा प्रकाशित रहता है। नर-नारी में भी क्रमश: इनकी ही प्रधानता रहती है। सूर्य-चन्द्र के योग से ही सम्वत्सर बनता है, इसी से ऋतुओं का जन्म होता है। सम्वत्सर से ही पृथ्वी के जड़-चेतन पैदा होते हैं। स्थूल सृष्टि का कारण अक्षर सृष्टि होती है, जो सूर्यगत कही गई है। सूर्य ही अक्षर या देव प्राणों का केन्द्र है, इन्द्र है। देवप्राणों का निर्माण स्वयंभू लोक के ऋषि प्राण तथा परमेष्ठी लोक के पितृप्राण के यजन से होता है। अत: हमारा आत्मा इन लोकों के साथ भी जुड़ा रहता है तथा स्वतन्त्र स्थूल सृष्टि का नियामक भी जान पड़ता है। भृगु-अंगिरा ही योषा-वृषा रूप आगे बढ़ते हैं। ऋषि, पितृ और देव प्राणों से ऋण लेकर ही हम प्राणी वर्ग पैदा होते हैं। तीनों ही अग्नि प्राण हैं- सोम की सहायता से सृष्टिकर्ता बनते हैं, किन्तु सोम की चर्चा कहीं नहीं होती। माया सदा ब्रह्म में लीन रहकर निर्माण करती है। सृष्टि ब्रह्म का ही विवर्त कहलाती है। माया अन्त में ब्रह्म में ही लीन हो जाती है। इसी कारण सृष्टि पुरुष प्रधान कहलाती है।

वैसे हमारी विवाह संस्था का लक्ष्य भी मात्र निर्माण ही नहीं है। इसी में निर्वाण की भूमिका भी लक्षित है। दाम्पत्य रति (विवाह का स्वरूप) बहुत विशाल है। नारी का पत्नीस्वरूप वास्तव में 'शक्ति' रूपा ही है और प्रत्येक पत्नी का ही है। नारी मात्र का नहीं है। पति-पत्नी अध्यात्म के चारों धरातलों पर (आत्मा-शरीर-मन-बुद्धि) साथ-साथ जीते हैं। आश्रम व्यवस्था के अनुरूप जीते हैं। इसमें बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। यह रहस्य पूर्वी देशों में, जहां अग्रि अर्थात् पुरुष की प्रधानता है, नि:श्रेयस जीवन का उद्देश्य है। सोम प्रधान पश्चिम में अभ्युदय-भौतिक सुख-प्रधान होने से निर्वाण का चिन्तन ही नहीं है। दाम्पत्य भाव में सृष्टि स्वरूप का चिन्तन ही नहीं है।

पश्चिम में विवाह के बाद भी पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए, अर्थात् एकाकार होकर नहीं जीते। दोनों ही अपनी स्वतंत्र पहचान बनाकर जीना चाहते हैं। आगे चलकर यही चिन्तन उनके विवाह-विच्छेद का कारण बनता है। पूर्व में विवाह-विच्छेद की अवधारणा शास्त्रीय तो कभी नहीं थी। आदिम जातियों में ही रही थी। यहां विवाह का उद्देश्य दोनों- 'अभ्युद और नि:श्रेयस' रहे हैं। जीवन के 25 साल पूर्ण होने पर विवाह के साथ ही 'गृहस्थाश्रम' की शुरुआत होती है। नारी का पत्नी रूप में, नर के जीवन में प्रवेश होता है। वह नर के साथ जीने के लिए आती है। अपना सबकुछ छोड़कर ही आती है (नाम और पहचान भी)। नारी सौम्या है और अग्रि में पूर्ण रूपेण आहुत होने आती है। फिर से माता-पिता के घर में जाकर जीना उसका स्वप्र नहीं होता।

तब जीवन के शेष 75 साल उसको पति के घर में क्या करना है? पहले तो उस घर में अपना स्वामित्व स्थापित करना है। पति को अपने वशीभूत करना है, ताकि वह हर सलाह को स्वीकार कर सके।। इसके लिए पति को रिझाना उसका पहला और अनिवार्य कर्म होता है। वह पति की 'शक्ति' है। उसे दाम्पत्य रति-वात्सल्य, स्नेह, श्रद्धा, प्रेम- का अभ्यास कराती है। उसके अग्रि प्रधान जीवन में इन गुणों का स्थान कहां हो सकता है? वह अपने माधुर्य और लालित्य के सहारे उसमें मिठास घोलने का प्रयास करती है। उसे भी स्त्रैण बनाने का प्रयास करती है। यही तो पुरुष का वह निर्माण है, जो निर्वाण की पृष्ठभूमि है।

विवाह पूर्व जो व्यक्ति स्वछन्द था, नारी साहचर्य से अनभिज्ञ था, कोरा पत्थर था- संवेदनाहीन था, उसे कडुवे-मीठे बोल से पूर्णता देती है। उसके अधूरेपन की पूर्णता उसकी स्वयं की पूर्णता भी बन जाती है। सही अर्थों में वही नर की भोक्ता है। जीवन के 25 वर्षों में पुरुष का निर्माण इस प्रकार करती है कि 50 वर्ष की उम्र में पुरुष के मन में एक विरक्ति का भाव भी पैदा कर देती है। उसके जीवन के निर्माण क्रम से बाहर होकर उसे निर्वाण पथ पर खड़ा कर देती है। यहां से जीवन का तीसरा आश्रम- वानप्रस्थ शुरू हो जाता है। अब दोनों पूर्ण भी हैं और मित्र भी हैं।

वानप्रस्थ गृहस्थ कार्यों से मुक्ति का काल है। धारणा-ध्यान-समाधि-सेवा के अभ्यास का काल है। मन में विरक्ति का भाव यदि नहीं आया, तो व्यक्ति कभी वानप्रस्थ को सही रूप में सार्थक नहीं बना सकता। यह कार्य तो न स्वयं व्यक्ति ही कर सकता है, न कोई अन्य नारी ही कर सकती है। अन्य नारी तो आसक्ति ही पैदा करेगी, चंचलता पैदा करेगी। तब कहां ध्यान और कहां समाधि?

पत्नी वानप्रस्थ आश्रम में पति के मन को प्राण और वाक् (सृष्टि क्रम) से हटाकर आनन्द-विज्ञान (मोक्ष साक्षी क्रम) से जोड़ती है। आध्यात्मिक दाम्पत्य रति को आधिदैविक देवरति में प्रेरित करती है। जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) ही तो है। कामनामुक्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त करता है। नारी या नर दोनों ही अकेले रहकर कामनामुक्त नहीं हो सकते। यही आज पश्चिम की मूल समस्या है। न अकेले रह सकते, न दूसरे का बनकर ही रह सकते। एक साथी से विरक्त होते ही दूसरे की तलाश शुरू हो जाती है। जीवन आहार-निद्रा-भय-मैथुन में बंधकर रह जाता है। अभ्युदय प्राप्त हो जाता है। नि:श्रेयस उनके चिन्तन का विषय ही नहीं होता।

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