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Photo Icon डिलेवरी व कुछ घंटे पहले मां की कोख में 11 माह में 271 शिशुओं ने तोड़ा दम

Updated: IST rewa news
मॉडर्न लेबर रूम और आईसीयू, स्पेशल केयर यूनिट जैसी सुविधाएं प्रदान की जा रही है। बावजूद इसके शिशु मृत्यु में कोई कमी नहीं आयी है।

रीवाशिशु मृत्यु रोकने के लिए सरकार पानी की तरह पैसा खर्च कर रही है। मॉडर्न लेबर रूम और आईसीयू, स्पेशल केयर यूनिट जैसी सुविधाएं प्रदान की जा रही है। बावजूद इसके शिशु मृत्यु में कोई कमी नहीं आयी है। बात मेडिकल कॉलेज के गांधी स्मारक चिकित्सालय की करें तो यहां 11 महीने में 271 गर्भस्थ शिशुओं की मौत हुईहै।

यह मौतें डिलेवरी के वक्त या डिलेवरी से कुछ घंटे पहले कोख में हुई हैं। संसाधनों की मौजूदगी में भी इनको बचाया नहीं जा सका है। सवाल ये है कि जब मां के गर्भ में सात से नौ माह तक शिशु सुरक्षित रहा तो उसे जीवन के महत्वपूर्ण समय पर बचाने में कहां लापरवाही हो रही है। पहले संसाधन नहीं थे तो डॉक्टर इनका रोना रोते थे अब अस्पताल में अत्याधुनिक सुविधाएं हैं। इसके बावजूद शिशु मृत्यु के आंकड़ों में कोई कमी नहीं आना बड़ा सवाल है।

7,717 प्रसव मॉडर्न लेबर रूम मेें कराए गए

डिलेवरी की संख्या भी विगत वर्षों के बराबर ही है। कुल 7,717 प्रसव मॉडर्न लेबर रूम मेें कराए गए हैं। जीएमएच के पूर्व शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. एचपी सिंह का कहना है कि यह गंभीर विषय है। एसएनसीयू में नवजात की मौत जन्मजात विकृतियों की वजह से होती है। पर डिलेवरी से पहले या ऐन वक्त पर होने मृत्यु के कारणों पर मंथन करने की जरूरत है।

ये हैं कारण

गर्भवती का हिमोग्लोबिन का स्तर कम होना।

गर्भवती का न्यूट्रीशन स्तर संतुलित नहीं होना।

गर्भ के दौरान अनावश्यक दवाओं का सेवन।

गर्भ के दौरान आयरन की कमी।

ये जांचे नहीं हो रही समय से

गर्भवती की सोनोग्राफी जांच लेवल 2 स्तर।

गर्भवती का ब्लड प्रेशर और यूरीन टेस्ट।

तीन-तीन महीने के अंतराल में गर्भवती का वजन ।

हीमोग्लोविन और आयरन जांच हर दो माह पर।

एक नजर में स्थिति

महीना डिलेवरी मृत्यु

अप्रैल 586 19

मई 609 15

जून 539 15

जुलाई 767 32

अगस्त 853 23

सितंबर 786 28

अक्टूबर 811 44

नवंबर 721 34

दिसंबर 716 27

जनवरी 720 14

फरवरी 627 20

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