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Photo Icon ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने में 250 करोड़ रुपए स्वाहा, फिर भी इलाज कोसों दूर

Updated: IST health services
स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा कमजोर, ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज की सुविधाएं नहीं, नर्सों के भरोसे चल रहे सीएचसी-पीएचसी, एनएचएम की स्कीमें चढ़ी भ्रष्टाचार की भेंट।

रीवा। मेडिकल कॉलेज के दोनों अस्पतालों को छोड़कर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदत्तर है। जिन प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को मजबूत करने के दावे बीते दस सालों में किए गए वे अब खोखले साबित हो रहे हैं। जबकि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के 250 करोड़ स्वाहा हो गए। बावजूद कोई परिवर्तन नहीं आया है। गांव का मरीज इलाज के लिए आज भी शहर ही आ रहा है।

वर्ष 2006 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन अस्तित्व में आया। उद्देश्य था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के आबादी के अनुसार हेल्थ सुविधाएं जनमानस को मुहैया कराई जाएंगी। जिसमें पहला लक्ष्य पांच हजार की आबादी के बीच सब सेंटर, बीस हजार की आबादी पर सेक्टर अस्पताल, एक लाख आबादी पर पीएचसी और दो लाख की आबादी सीएचसी बनाने की रूपरेखा तैयार की गई थी।

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सीजेरियन से लेकर बेबी कार्नर तक की सुविधा वाले डिलेवरी सेंटर बनाने थे, लेकिन वर्तमान में 24 लाख की आबादी में एक जिला अस्पताल, 29 पीएचसी, 11 सीएचसी, 289 सब हेल्थ सेंटर और 45 सेक्टर अस्पताल मौजूद हैं।

ये हकीकत डराती है

पावर प्रोजेक्ट, सीमेंट फैक्ट्रियों और क्रशर प्लांटों की धरा पर प्रदूषण मानकों को पार क र चुका है। शहर हो या गांव, शुद्ध पानी नसीब नहीं है। गर्भस्थ शिशु के गुर्दे और ह्दय विकसित नहीं हो रहे हैं। कोख में ही विकलांगता जन्म ले रही है। दूषित पानी से बीमारियां पैदा हो रही हैं। मांग सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं की है लेकिन यहां बुनियादी सुविधाएं ही मौजूद नहीं है।

हजारों रोगी दिल्ली के अस्पतालों पर निर्भर

डेंगू, चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू, एनसेफेलाइटिस का इलाज संभव नहीं है। स्थिति ये है मर्ज रीवा में और जांच जबलपुर-नागपुर में होती है। गुर्दा और हार्ट के हजारों रोगी दिल्ली के अस्पतालों पर निर्भर हैं। प्रसूताओं को 6 0 से 70 किमी. दूरी तय करनी पड़ रही है।

जनप्रतिनिधि नहीं लेते संज्ञान

स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के लिए जनप्रतिनिधि जिम्मेदार हैं। मंत्री, विधायक, यहां तक क्षेत्रीय पार्षदों ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं कि शासन के पैसे का सदुपयोग हो रहा है या नहीं। सीएमएचओ के टेबल पर ज्यादातर जनप्रतिनिधियों के पत्र पहुंचे जिनमें नियुक्तियों में भ्रष्टाचार, तबादलों का जिक्र रहा। आम आदमी के लिए उनके पत्रों में स्थान नहीं रहा।

10 साल बाद भी स्थिति जस की तस

त्योंथर में सौ बेड का सिविल अस्पताल आज तक नहीं बन पाया है। यहां के लोग इलाहाबाद जाते हैं।

31 डिलेवरी सेंटर हैं पर तीन सेंटरों पर ही सीजेरियन और बेबी कार्नर की सुविधाएं मौजूद हैं।

जिला अस्पताल में 100 मरीजों के इलाज की व्यवस्था नहीं है। ट्रामा सेवाएं नदारद हैं।

शिशु रोग, स्त्री रोग, निश्चेतना और सर्जरी के विशेषज्ञों के पद जिलेभर में खाली पड़े हैं।

स्वास्थ्य विभाग का अपना ब्लड बैंक नहीं है। जांच के लिए एक भी स्तरीय लैब नहीं है।

एक भी सीएचसी ऐसी नहीं है जहां पर ऑपरेशन थियेटर की सुविधा मौजूद हो।

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