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ये टेक्नोलॉजीज आपकी ज्यादातर समस्याओं को कर सकती हैं दूर

Updated: IST Technology
जानते हैं आने वाली ऐसे टेक्नोलॉजीज के बारे में, जो आपकी ज्यादातर समस्याओं को दूर कर सकती हैं

कभी-कभी टेक्नोलॉजी में इतनी तेजी से बदलाव होता है कि आप इसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त ही नहीं कर पाते हैं। जानते हैं आने वाली ऐसे टेक्नोलॉजीज के बारे में, जो आपकी ज्यादातर समस्याओं को दूर कर सकती हैं।

अंडरस्क्रीन फिंगरप्रिंट स्कैनर

हालांकि बाजार में काफी अफवाह उड़ है कि एप्पल अंडरस्क्रीन फिंगरप्रिंट स्कैनर पर काम कर रहा है, पर क्वालकॉम पहले से ही इसकी आधिकारिक घोषणा कर चुका है। यह अल्ट्रासोनिक वेबलेंथ का इस्तेमाल करके एक्यूरेट डिटेक्शन के लिए 3डी स्कैन कैप्चर कर सकता है। यह सिर्फ ओएलईडी पैनल्स के साथ कॉम्पिटिबल है और इसमें भी एक खास थिकनेस जरूरी है। यह पानी के नीचे भी काम करता है। इससे डिवाइस आसानी से वाटरप्रूफ हो जाता है। अल्ट्रासोनिक स्कैनर की मदद से हार्ट रेट और ब्लड फ्लो भी आसानी से पता किया जा सकता है। विवो ने एमडब्ल्यूसी शंघाई में एक प्रोटोटाइप पेश किया था। यह आशा की जा रही है कि इस टेक्नोलॉजी से लैस फोन साल के अंत तक बाजार में आ सकता है। यह टेक्नोलॉजी आने के बाद मोबाइल फोन का बाजार काफी तेजी से बदल सकता है।

सैमसंग आईएसओसेल इमेज सेंसर

ज्यादातर स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियां सोनी का इमेज सेंसर काम में लेती हैं, क्योंकि बाजार में विकल्प काफी सीमित हैं। सैमसंग ने अब आईएसओसेल ब्रांड के तहत अपना खुद का सीएमओएस इमेज सेंसर लॉन्च किया है। इन्हें सैमसंग ने शुरू में इस्तेमाल किया था। इसमें चार वेरिएंट्स हैं- ब्राइट, फास्ट, स्लिम और ड्यूल। ब्राइट कम लाइट में भी अलग-अलग रंगों के साथ बेहतर फोटोज डिलीवर करता है। फास्ट तेज ऑटो फोकस और ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग करता है। स्लिम अल्ट्रा स्लिम डिवाइसेज के लिए सेंसर होगा। आईएसओसेल ड्यूल कंपनी के ड्यूल कैमरा सेटअप की ऑफङ्क्षरग है। इसमें एक आरजीबी और एक मोनोक्रोम सेंसर है। इन खूबियों को आने वाले सैमसंग गैलेक्सी नोट 8 में देखा जा सकता है। इससे इमेज की क्वालिटी मेें भी सुधार आएगा और आने वाले समय में इमेज सेंसर को लेकर कई तरह के प्रयोग बाजार में हो सकते हैं।

बिना लेंस के कैमरा

कैमरों की क्षमता सीमित होती है। ऐसा उनकी बनावट के कारण होता है। उनमें इमेज सेंसर, शटर, लेंस आदि होते हैं। कैलटेक के इंजीनियर्स ने ऐसा कैमरा बनाया है, जो कुछ माइक्रोन पतला है। इंसान का बाल 100 माइक्रोन्स के लगभग होता है। यह इतना पतला है कि इसे किसी भी चीज के ऊपर कोटेड किया जा सकता है। कल्पना करें कि आपके स्मार्टफोन की पूरी बैक एक कैमरा है। यह कपड़े का एक टुकड़ा, ग्लास का टुकड़ा या डिस्प्ले में एम्बेडेड या आईग्लास हो सकता है। इसमें रेज्योल्यूशन और सेंसर के आकार की कोई थ्योरिटिकल सीमा नहीं है। इसे जूम, वाइड एंगल, फिश आई आदि के बीच में स्विच किया जा सकता है।

सॉलिड स्टेट लिथियम आयन व ग्रेफीन बैटरी

आधुनिक इलेक्ट्रोनिक्स में बैटरीज एक बड़ा दर्द बनकर उभरी हैं। टोयोटा सल्फाइड सुपरियोनिक कंडक्टर का इस्तेमाल करके बैटरीज बनाने पर काम कर रहा है। शुरुआती तौर पर कहा जा सकता है कि यदि ये बैटरीज सुपर कैपिसिटर की तरह काम करें तो कम समय में ज्यादा एनर्जी स्टोर कर सकती हैं। स्पैनिश कंपनी ग्रैफिनेनो ग्रैफीन पॉलीमर बैटरीज विकसित कर रही है। इनमें 1000 वाट आवर प्रति किलोग्राम की एनर्जी डेनसिटी हो सकती है। आमतौर पर लिथियम बैटरीज में 200 वाट आवर प्रति किलोग्राम होता है।

मोबाइल 3डी फेशियल रिकॉग्निेशन

3डी फेशियल रिकॉग्निेशन को स्मार्टफोन में सही तरह से लागू किया जाए तो यह प्राइवेसी और सिक्योरिटी के मामले में मील का पत्थर साबित हो सकता है। अभी जो फेस अनलॉक सोल्यूशन्स मौजूद हैं, उन्हें फोटोग्राफ से धोखा दिया जा सकता है। ऐसे में 3 डी फेशियल रिकॉग्निेशन काफी सुरक्षित विकल्प हो सकता है। डेप्थ सेंसर (एक्सबॉक्स नेक्ट की तरह) फेशियल कर्व और कॉन्टूर को स्कैन करेंगे। आपका फोन अपने आप आपको पहचान लेगा। यह आपको वॉइस असिस्टेंट्स के कॉम्बिनेशन के साथ हैंड्स फ्री ऑपरेशन की सुविधा भी देगा। इस वर्ष सॉफ्टनेटिक ने एमडब्ल्यूसी शंघाई में इसका डेमो दिया था। सुना जा रहा है कि एप्पल इस साल के आईफोन में फिंगरप्रिंट स्कैनर के बजाय 3डी फेशियल रिकॉग्निेशन जोडऩे जा रही है।

स्क्रीन करेगी फोन को चार्ज

हम ग्लास स्क्रीन इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि ये अच्छी नजर आती हैं, अच्छा महसूस करवाती हैं और इन्हें कोटेड किया जा सकता है (एंटी रिफलेक्शन, ओलियोफोबिक), साथ ही ये पूरी तरह से ट्रांसपेरेंट होती हैं। क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया बर्केले, कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी और द नेशनल इंस्टीट्यूट फोर मैटीरियल्स साइंस जापान के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च के मुताबिक अब स्क्रीन्स को कई तरह के मैटेरियल्स से तैयार किया जा सकता है। ग्रेफीन, हैक्सागोनल बोरोन नाइट्राइड (एच-बीएन) और सी 60 जैसे पदार्थों का इस्तेमाल करके स्क्रीन्स तैयार की जा सकती हैं। मैटेरियल ट्रांसपैरेंट, फ्लेक्सिबल और सुपर कंडक्टिव है। सी 60 सोलर सेल्स में भी इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए इस टेक्नोलॉजी का विकास ऐसी डिस्प्ले विकसित कर सकता है, जो फोन को लंबे समय तक चार्ज रखेगी।

हाईब्रिड फ्यूल सेल

फ्यूल सेल्स की चर्चा बाजार में तेजी से हो रही है, हालांकि इस टेक्नोलॉजी का वाणिज्यिक इस्तेमाल नहीं हुआ है। माई एफसी नामक कंपनी ने दुनिया के सबसे छोटे फ्यूल सेल का इस्तेमाल करके हाईब्रिड पावर बैंक्स लॉन्च किए हैं। इन्हें साधारण इलेक्ट्रिकल आउटलेट का इस्तेमाल करके चार्ज किया जा सकता है या आप हाइड्रोजन पैदा करने के लिए नमक और पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं। 4000 एमएएच चार्जर का वजन 200 ग्राम होता है, जो कि भारी प्रतीत होता है, पर वजन कम करने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन, टैबलेट, कैमरा और लैपटॉप जैसे डिवाइस में काम में आ सकती है।

रोल होने वाले और साथ में रहने वाले स्पीकर्स

कुछ लोगों का मानना है कि स्पीकर्स के फिजिकल साइज का कोई रिप्लेस नहीं हो सकता। मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इस बात को झूठा साबित किया है। ये शोधकर्ता फेरोइलेक्टरेट नैनोजनरेटर्स या एफईएनजी पर काम कर रहे हैं। इससे पेपर जैसा पतला मैटेरियल तैयार किया जा सकता है। इससे स्पीकर और माइक्रोफोन बनाए जा सकते हैं। वैज्ञानिक रूप से बात करें तो यह हवा में वाइब्रेशन्स पिकअप कर सकता है और उन्हें इलेक्ट्रिक एनर्जी में बदल सकता है। यह इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को वाइब्रेशन के रूप में भेज सकता है, जिसे लोग साउंड के रूप में सुन सकते हैं। इसे आप पोर्टेबिलिटी के लिए आसानी से रोल या फोल्ड भी कर सकते हैं।

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