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सरकारी स्कूलों में मैन्यू के हिसाब से नहीं बन रहा मध्याह्न भोजन

Updated: IST sehore
तकीपुर मिडिल स्कूल के बच्चों ने तीन माह से नहीं खाए चावल और खीर, कड़ी-चावल की जगह बच्चों को खिलाई जा रही सब्जी-रोटी

सीहोर। सरकारी स्कूल में बच्चों को मध्याह्न भोजन मैन्यू के हिसाब से नहीं दिया जा रहा है। बच्चों की सेहत सुधारने के लिए शुरू की गई मध्याह्न भोजन योजना में बच्चों को खाना देने के नाम पर सिर्फ औपचारिकता की जा रही है और समूह संचालक मौज कर रहे हैं। शिक्षक भी इसकी मॉनीटरिंग में रुचि नहीं ले रहे हैं। शिक्षकों के मॉनीटरिंग में रूचि नहीं लेने के पीछे मुख्य कारण यह है कि समूह पर दबंग, प्रभावशाली और नेताओं का कब्जा है। सीहोर में अधिकांश समूह प्रभावशाली और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों के हैं।

छात्रों के भोजन के लिए मिलने वाली राशि में से ज्यादा बचत करने के चक्कर में स्वसहायता समूह अपनी सुविधा अनुसार मध्याह्न भोजन के मैन्यू बना लेते हैं। शासन से निर्धारित मैन्यू के हिसाब से बच्चों को भोजन मिलता नहीं है। जिला मुख्यालय से मात्र पांच किलोमीटर दूर स्थित तकीपुर मिडिल स्कूल के बच्चों के लिए आम दिन की भांति गुरुवार को भी मध्याह्न भोजन में गिलकी की सब्जी और रोटी दी गई, जबकि मैन्यू के हिसाब से तय डाइट चार्ट के अनुसार गुरुवार को बच्चों को मध्याह्न में भोजन में कड़ी-चावल दिए जाने थे। यहां बच्चों ने बताया कि तीन माह से चावल, खीर नहीं मिली है। जब इस संबंध में रसोइया महिला से पूछा तो उन्होंने बताया कि चावल मिला ही नहीं है। तकीपुर स्कूल के अलावा पत्रिका की टीम ने गुरुवार को ग्राम सैकड़ाखेड़ी मिडिल स्कूल में भी मध्याह्न भोजन की स्थिति देखी। यहां पर रसोई मेंं सीलन और गंदगी पसरी थी। तकीपुर में तो चूल्हे पर खाना बनाने के कारण पूरे रसोई घर में राख, धुआं और कचरा बिखरा था। इसी स्थान पर बच्चों को बैठाकर भोजन भी कराया जाता है।


ग्रामीणों ने कलेक्टर को दिखाया था आटा

मध्याह्न भोजन को लेकर आए दिन गड़बड़ी और मिलावट की सूचनाएं आती रहती है। छह अगस्त को जिला मुख्यालय से दो किलोमीटर दूर सैकड़ाखेड़ी प्राथमिक शाला में मध्याह्न भोजन बनाने के लिए गूथे गए खराब आटे को लेकर हंगामा हुआ था। पालकों ने काले रंग के आटे को लेकर मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे। ग्रामीण इस आटे के सैंपल लेकर कलेक्टर और जिला खाद्य अधिकारी के पास भी पहुंचे थे। अधिकारियों ने मामले की जांच का आश्वासन दिया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई थी।

इधर, चार माह से नहीं मिला मानदेय

जिलेभर के शासकीय स्कूलों में मध्याह्न भोजन बनाने वाली महिलाओं को मानदेय के रूप में एक हजार रुपए प्रतिमाह दिया जाता है, लेकिन यह एक हजार रुपए भी जिलेभर के 466 रसोइयों को चार माह से नहीं मिल सके है। मध्याह्न भोजन बनाने वाली कृष्णा बाई, गोकल बाई, नर्मदी बाई ने बताया कि कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। बिना मानदेय के काम करना मुश्किल हो रहा है।

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