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ये अब तक ले चुके हैं 23 अवतार

Updated: IST lord krishna 16108 wives
जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं।

सिवनी. केवलारी विकासखण्ड के ग्राम ढुटेरा में जारी श्रीमदभागवत कथा के पंचम दिवस बुधवार को शंकराचार्य महाराज के शिष्य दण्डी स्वामी सदानंद सरस्वती कथास्थल पर पहुंचे। उन्होंने उपस्थितजनों को जीवन उपयोगी ज्ञान देते हुए ज्ञान-अज्ञान, विवेक-अविवेक के विषय पर विस्तार से समझाए व भगवान के अवतार के रहस्यों को बताया। इसके उपरांत श्रीकृष्ण जन्म एवं बाललीलाओं का भावपूर्ण वर्णन जीवंत झांकियों के बीच किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने कृष्ण जन्म उत्सव की खुशियां मनाई, नृत्य कर जयघोष लगाए।

शिवराजपुर सतना से आए कथावाचक पंडित घनश्याम प्रसाद शास्त्री ने कृष्णजन्म के प्रसंग की कथा का वाचन करते कहा कि कृष्ण विष्णु के अवतार हैं। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों को धारण किया। इन अवतारों में उनके सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण के ही माने जाते हैं। श्री कृष्ण का जन्म क्षत्रिय कुल में राजा यदुकुल के वंश में हुआ था।

शास्त्री ने बताया कि श्रीविष्णु ने कृष्ण का यह अवतार वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में लिया था। वास्तविकता तो यह थी इस समय चारों ओर पाप कृत्य हो रहे थे। धर्म नाम की कोई भी चीज नहीं रह गई थी। अत: धर्म को स्थापित करने के लिए श्रीकृष्ण अवतरित हुए थे। ब्रह्मा तथा शिव प्रभृत्ति देवता जिनके चरणकमलों का ध्यान करते थे, ऐसे श्रीकृष्ण का गुणानुवाद अत्यंत पवित्र है। श्रीकृष्ण से ही प्रकृति उत्पन्न हुई। सम्पूर्ण प्राकृतिक पदार्थ, संपूर्ण प्रकृति का सृजन किया और उसे अपना महत्वपूर्ण कर्म समझाए अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि उनके अवतीर्ण होने का मात्र एक उद्देश्य था कि इस पृथ्वी को पापियों से मुक्त किया जाए। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए धर्मानुसार एवं कर्मानुसार, उन्होंने जो भी उचित समझा वही किया। उन्होंने कर्मव्यवस्था को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को कर्मोज्ञान का उपदेश देते हुए उन्होंने गीता की रचना की जो कलिकाल में धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।

शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुजनों से कृष्ण जन्म का उद्देश्य बताते हुए कहा कि जब संपूर्ण पृथ्वी दुष्टों एवं पतितों के भार से पीडि़त थी। उस भार को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने एक प्रमुख अवतार ग्रहण किया जो कृष्णावतार के नाम से संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध हुआ। उस समय धर्म, यज्ञ, दया पर राक्षसों एवं दानवों द्वारा आघात पहुंचाया जा रहा था। पृथ्वी पापियों के बोझ से पूर्णत: दब चुकी थी। समस्त देवताओं द्वारा बारम्बार भगवान विष्णु की प्रार्थना की जा रही थी। विष्णु ही ऐसे देवता थे, जो समय-समय पर विभिन्न अवतारों को ग्रहण कर पृथ्वी के भार को दूर करने में सक्षम थे क्योंकि प्रत्येक युग में भगवान विष्णु ने ही महत्वपूर्ण अवतार ग्रहण कर दुष्ट राक्षसों का संहार किया।

कृष्ण लीलाओं में छिपा संदेश -

शास्त्री ने कहा कि श्रीकृष्ण लीलाओं का जो विस्तृत वर्णन भागवत ग्रंथ में किया गया है, उसका उद्देश्य क्या केवल कृष्ण भक्तों की श्रद्धा बढ़ाना है या मनुष्य मात्र के लिए इसका कुछ संदेश है। तार्किक मन को विचित्र सी लगने वाली इन घटनाओं के वर्णन का उद्देश्य क्या ऐसे मन को अतिमानवीय पराशक्ति की रहस्यमयता से विमूढ़वत बना देना है अथवा उसे उसके तार्किक स्तर पर ही कुछ गहरा संदेश देना है, इस पर हमें विचार करना चाहिए। महाराज ने कहा कि वस्तुत: भागवत में सृष्टि की संपूर्ण विकास प्रक्रिया का और उस प्रक्रिया को गति देने वाली परमात्म शक्ति का दर्शन कराया गया है। ग्रंथ के पूर्वार्ध में सृष्टि के क्रमिक विकास, जड़, जीव, मानव निर्माण का और उत्तरार्ध दशम स्कंध में श्रीकृष्ण की लीलाओं के द्वारा व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का वर्णन प्रतीक शैली में किया गया है।

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