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इंसेफेलाइटिस से बचाव की तैयारी पर भारी पड़ सकती है लापरवाही

Updated: IST Encephalitis
इंसेफेलाइटिस से प्रभावित है जिले के 155 गांव, सुअरों के सैम्पल जांच में हो चुकी है बीमारी की पुष्टि

सिद्धार्थनगर. जिले में इंसेफेलाइटिस से लड़ने का भले ही इंतजाम किया गया है लेकिन लड़ने की तैयारी पर लापरवाही भारी पड़ सकती है। जिले के अधिकांश गांवों में अभी भी सफाई व्यवस्था नदारद है। अभी तक आबादी वाले क्षेत्रों से सुअर बाडों को नहीं हटाया गया है। जबकि जिले के जोगिया क्षेत्र में सुअर बाडे में पाले जा रहे 15 सुअरों में जेई के संवाहकों के होने की पुष्टि भी हो चुकी है। इसके बाद भी लापरवाही इस कदर है कि अभी तक आबादी वाले क्षेत्रों से सुअर बाडों को नहीं हटाया गया है।

प्रतिवर्ष इंसेफेलाइटिस तराई के इलाके में कहर बरपाता है। हर वर्ष बीमारी से बचाव के लिए तमाम उपाय किए जाते हैं। जब बीमारी शुरू होती है तो अभियान के तहत बचाव के लिए हर कार्य किया जाता है लेकिन पूर्व में तैयारी की बात करे तो आधी-अधूरी तैयारी पर लापरवाही भारी पड़ती है। जिले में बीमारी कभी भी दस्तक दे सकती है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से पीएचसी व सीएचसी पर बने इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेन्ट सेन्टरों को सक्रिय कर दिया गया है, लेकिन बीमारी के वाहक माने जाने वाले सुअरों को अभी तक आबादी वाले क्षेत्र से नहीं हटाया गया है। ऐसे में अगर बीमारी दस्तक देती है तो गांव से लेकर शहर तक तेजी से महामारी का प्रकोप फैलेगा। आबादी वाले क्षेत्रों में स्थित सुअरबाड़ों को हटाने के लिए पशुपालन विभाग ने भी केवल जिम्मेदारों को पत्र जारी कर अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री कर ली है। अब तक आबादी वाले क्षेत्रों से सुअरबाड़ा नहीं हटा है, न ही किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है। इससे स्थिति जस की तस बनी हुई है। इंसेफेलाइटिस प्रभावित गांवों के रूप में जिले के 155 गांवों का चिन्हित किया गया है। जहां पर बीमारी से लड़ने का इंतजाम किया जा रहा है, लेकिन सफाई व्यवस्था को लेकर जिम्मेदार गम्भीर नहीं है।

शुद्ध पानी का नहीं है इंतजाम

जापानी इंसेफेलाइटिस के साथ एईएस (एक्यूट एमिनो सिन्ड्रोम) का भी प्रकोप जिले में दो वर्ष से देखने को मिल रहा है। एईएस के सम्बंध में बताया जाता है कि यह दूषित पानी के सेवन से लोग इस बीमारी का शिकार होते है। जिसके लक्षणों के बारे में पता कर पाना मुश्किल होता है लेकिन इंसेफेलाइटिस की तरह ही ट्रीटमेन्ट कर लोगों को बचाया जाता है। एईएस से बचाव के लिए दो वर्ष पूर्व जिले के लोगों को शुद्ध पानी के लिए जागरूक किया गया था, लेकिन इसके बाद शुद्ध पानी को लेकर जागरूकता का मामले को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। इस वर्ष स्वच्छता की बात तो की जा रही है लेकिन साफ पानी को लेकर कोई अभियान नहीं चलाया जा रहा है। कहने को जल निगम की ओर से शुद्ध पानी के लिए जिले में 37 हजार इण्डिया मार्का हैण्डपम्प लगाया गया है पर इसमें से एक तिहाई से अधिक हैण्डपम्प खराब हैं। जिसे अभी तक ठीक नहीं कराया जा सका है। ग्राम पंचायतें जल निगम एक दूसरे की जिम्मेदारी बताकर मामले से पल्ला झाड़ ले रहे हैं।

पीएचसी व सीएचसी पर बना ईटीसी

इंसेफेलाइटिस के मरीजों के इलाज के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेन्ट सेन्टर स्थापित किया गया है। मरीजों के लिए दो बेड आरक्षित करने के साथ ही दवाओं का भी इंतजाम किया जा रहा है। मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा सभी सीएचसी व पीएचसी प्रभारियों को निर्देश भी जारी किया जा चुका है। साथ ही गम्भीर रूप से पीड़ितों को जिला अस्पताल के आईसीयू वार्ड में रेफर करने का निर्देश दिया गया है। इस सम्बंध में सभी सीएचसी व पीएचसी से साप्ताहिक रिपोर्ट भी तलब की जा रही है।

बारिश होने पर जिले में बढ़ेगा बीमारी का दायरा

जानकारों की मानें तो अगर जिले में बारिश हुई तो इंसेफेलाइटिस की बीमारी का दायरा तेजी से बढ़ेगा। अप्रैल माह में ही जिले में इंसेफेलाइटिस के मरीज मिलने को लेकर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में दहशत है। हलाकि अभी तक मरीजों की संख्या शून्य ही है जिला अस्तपाल में भी सम्भावित मरीज भर्ती किए गए लेकिन उनमें इंसेफेलाइटिस की पुष्टि नहीं हुई।

दवा का छिड़काव कराने का दिया गया है निर्देशः सीएमओ

सीएमओ डाॅ. राजेन्द्र कपूर ने बताया कि इंसेफेलाइटिस से बचाव के लिए सभी सीएचसी व पीएचसी प्रभारियों को संवेदनशील गांवों में दवा आदि का छिड़काव कराने का निर्देश दिया गया है। साथ ही पीएचसी व सीएचसी पर स्थापित ईटीसी के माध्यम से तीन दिनों से अधिक बुखार वालों को ट्रैक किया जा रहा है। पांच दिन में बुखार ठीक नहीं होने पर जिला अस्पातल रेफर करने को कहा गया है। इंसेफेलाइटिस प्रभावित गांवों में दवाओं का छिड़काव भी कराया जा चुका है, जिसका सत्यापन जिलाधिकारी द्वारा कराया भी जा चुका है।

सुअर पालकों को दिया गया है निर्देशः डाॅ. फणीस

सिद्धार्थनगर के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डाॅ. फणीस सिंह ने बताया कि सुअर पालकों को आबादी से दूर सुअर पालन का निर्देश दिया गया है। साथ ही उन्हें सुअर पालन वाले क्षेत्र के आसपास नियमित रूप से दवा का छिड़काव कराने व सुअर पालकों के साथ गांव के बच्चों का टीकाकरण अवश्य कराने के लिए प्रेरित किया जाता है। समय-समय पर सुअरों का सिरम सैम्पल भी जांच के लिए भेजा जाता है। बीते वर्ष जिले में एक ही सिरम पॉजिटिव पाया गया था।

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