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1971 इंडो-पाक वॉर: इन कारणों से हुई थी भारत की जीत और पाक की हार

Updated: IST 1971 war pakistans defeat and the victory of india
ठीक चालीस साल पहले 1971 में भारत की सेना ने 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युध्द में पराजित कर आत्मसमर्पण पर मजबूर कर दिया था

ठीक चालीस साल पहले 1971 में भारत की सेना ने 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युध्द में पराजित कर आत्मसमर्पण पर मजबूर कर दिया था। ये दुनिया के सैन्य इतिहास में आत्मसमर्पण की सबसे बड़ी घटना थी, जिसे अंजाम दिया था दुनिया की सबसे जाँबाज सेनाओं में गिनी जाने वाली भारत की शैन्य शक्ति ने।

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पाकिस्तान के साथ हुए इस युद्ध में पाकिस्तान के सैनिक अधिकारी पाक की सीमा लाहौर से दिल्ली तक कर देन के नापाक इरादे लिए उतरे थे लेकिन उनके इन मंसूबों पर पानी फेरते हुए भारत की सेना ने न सिर्फ पाकिस्तान के सपने को चूर-चूर किया बल्कि पाक भी इस युद्द के बाद दो चुकड़ों में बंट गया। उस वक्त तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्ला देश) में तैनात सेना प्रमुख जनरल नियाजी को उनके 90,000 पाकिस्तानी/सिपाहियों सहित भारतीय सेने ने आत्मसमर्पण को मजबूर कर दिया था ।

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वर्ष 1971 के भारत-पाक युध्द में भारतीय सेना के कुशल नेतृत्व ने देश को जीत दिलाई और उनकी रणकौशलता की बदौलत बांग्लादेश का गठन हुआ। भारत-पाक युध्द में भारतीय सेना के सही समय पर लिये गये फैसले के कारण जंग में हस्तक्षेप करने के अमरीका के मंसूबों पर भी पानी फिर गया।

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आज हम आपके साथ 1971 भारत पाक युद्ध के कुछ अहम् हिस्सों को आपके सामने रख रहे हैं। जिसमें हम आपको बताएंगे कि तत्कालीन हालात क्या रहे जिनके कारण भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी!

-उस वक्त भारत की लीडरशिप इंदिरा गांधी के नेतृत्व में मजबूत थी, जबकि पाकिस्तान में सैनिक तानाशाह याहया खान बेहतर फैसले लेने में उतना सक्षम नहीं था।

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-राजनीतिक डिप्लोमेसी, ब्‍यूरोक्रेसी और मिलिट्री में सामंजस्य बेहतर था, जबकि पाकिस्तान में सैनिक शासन होने की वजह से सब बिखरा-बिखरा था।

-भारत ने युद्ध से पहले रूस के साथ समझौता किया था, इंटरनेशनल लेवल पर बांग्लादेश की रिफ्यूजी समस्या को जोरदार ढंग से उठाया था। पाकिस्तान इस भुलावे में था कि अमेरिका और चीन उसकी मदद करेंगे।

-पाकिस्तान की मदद के लिए अमेरिका ने सेवंथ फ्लीट बेड़े को हिंद महासागर में डियेगो गार्सिया तक भेज दिया था, लेकिन भारत ने रूस से जो समझौता किया था, उसकी वजह से भारत की मदद के लिए रूस ने अपनी न्यूक्लियर सब मैरिन भेज दी। ये भारत के हक़ में रहा।

-भारत ने ईस्ट पाकिस्तान में तेजी से वॉर कर तीन दिन में ही एयर फोर्स और नेवल विंग को तबाह कर दिया। इस वजह से ईस्ट पाकिस्तान की राजधानी ढाका में पैराट्रूपर्स आसानी से उतर गए, जिसका पता जनरल एएके नियाजी को 48 घंटे बाद लगा।

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-पाकिस्तान में डिसीजन टेकिंग पावर सिर्फ हायर लेवल पर सेंट्रलाइज थी। इस वजह से कोई फैसला नीचे तक आने में वक्त लगता था। इस वजह से पाकिस्तान तेजी से कोई स्ट्रेटजी नहीं बना पाया। भारत में चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ मानेकशाॅ ने फैसले लेने का पावर दोनों कोर कमांडरों को दिया था। भारतीय सेना तेजी से निर्णय लेकर हमले कर सकी।

-वेस्ट पाकिस्तान ने ईस्ट पाकिस्तान में 'क्रेक डाउन' शुरू कर दिया था। इस वजह से ईस्ट पाकिस्तान की सेना रेप, मर्डर और लोगों को प्रताड़ित करने लगी। इससे आर्मी का डिसिप्लीन भंग हो गया। ऐसे में जब उनका सामना भारत की अनुशासित सेना से हुआ तो उन्हें हारकर सरेंडर करना पड़ना।

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-पाकिस्तान को अंत तक भारत की स्ट्रैटजी का पता नहीं चल पाया। उसने सोचा था कि भारत की सेना ईस्ट पाकिस्तान में नदियों को पार कर ढाका तक नहीं पहुंच पाएगी और वह बॉर्डर पर ही उलझे रहेंगे। यह उसकी भूल साबित हुई। भारतीय सेना ने पैराट्रूपर्स की मदद से ढाका को ही घेर लिया। वहीं मुक्ति वाहिनी की मदद से भारतीय सेना, ईस्ट पाकिस्तान के बार्डर से अंदर तक घुस गई।

-पाकिस्तान में आर्मी, नेवी और एयरफोर्स में कोआर्डिनेशन नहीं था। यही कारण है कि तीनों संयुक्त रूप से कार्रवाई नहीं कर पाए, जबकि भारतीय सेना फील्ड मार्शल मानेकशॉ के नेतृत्व में तीनों विंग एकजुट होकर काम कर रही थी।

-ईस्ट पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी के रूप में जो सेना गठित हुई, वह पाकिस्तान की सेना से लड़ी और भारतीय सेना को रास्ता बताया। यही कारण है कि ईस्ट पाकिस्तान के नदियों के जाल को पार करके भारतीय सेना ढाका तक पहुंच सकी।

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