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मंच पर ही नहीं, हाथों में भी कला

Updated: IST surat
सतरंगी रंगों का त्योहार होली का गहरा रंग सूरत में अभी भी फीका नहीं पड़ा है। कई कलाकार मंच पर अभी भी

सूरत।सतरंगी रंगों का त्योहार होली का गहरा रंग सूरत में अभी भी फीका नहीं पड़ा है। कई कलाकार मंच पर अभी भी लोककला का प्रदर्शन कर सैकड़ों-हजारों दर्शकों की तालियां बटोर रहे हैं। इन्हीं में कुछ कलाकार ऐसे भी है जो केवल मंच पर नृत्य के दौरान चेहरे की भाव-भंगिमा, तीखे नैन-नक्श, लचीली कमर और कदमों की लयताल को गीत-संगीत तक ही सीमित नहीं रखते बल्कि खाली समय में वो शृंगार-सज्जा की सामग्री भी बनाते हैं।

बनने-संवरने के दौर में आज किसी एक कार्यक्रम में जाने से पहले काफी वक्त अपने-आपको देना पड़ता है। महिला वर्ग में तो इसकी विशेष तैयारियां पहले से की जाती हैं और उनमें प्रसंग मुताबिक परिधान व ओर्नामेंट (आभूषण) पसंद अहम रहते हैं। ऐसी ही तैयारियां होली के रंगमंच पर लोककला की छटा बिखेरने वाले कलाकार भी करते हैं। इनमें ज्यादा मुश्किल मेहरी (स्त्रीवेष में पुरुष) के लिए होती है।

कार्यक्रम में जाने से पहले वे बगैर ब्यूटीपार्लर गए, स्वयं को आकर्षक रूप में तैयार करते हैं और रंगमंच पर इनके परिधान व आभूषण देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। यूं देखने में काफी महंगे दिखते ये परिधान व आभूषण के पीछे भी एक कहानी है। इस कहानी में कोई दिलचस्पी रखे बगैर कार्यक्रम के दौरान आर्टिस्टों से महिलाएं बरबस ही परिधान व आभूषणों की पूरी जानकारी भी जुटा लेती हैं।

एक हजार में पांच सेट

पाली के जाडन कस्बे के निवासी कलाकार लवली बताते हैं कि बाजार से एक हजार रुपए की सामग्री से वे पांच-सात सदस्य घरों में बैठकर पांच सेट तैयार कर लेते हैं। कच्ची सिलाई के लहंगा-ब्लाउज व ओढ़णी का ड्रेस तैयार होने के बाद वे पाली में जसोदाबेन से सिलवाती हैं। बाजार में यह परिधान 5-6 हजार का मिलता है, जबकि उन्हें थोड़ी मेहनत से एक-डेढ़ हजार में मिल जाता है।

सामग्री की लम्बी सूची

लहंगा व ओढ़णी का कपड़ा ज्यादातर कलाकार सूरत से ले जाते हैं और बाद में इसे बूटे, जरी के बूटे, डायमंड, मोती, कलर स्टोन, लेसपट्टी आदि से सजाते-संवारते हैं। आभूषण में वे घर में कानों के टॉप्स (झुमकी), माथे की दामिनी, गले का हार (दुल्हन सेट), बाजुबंद, कंदोरा, पायल, हथफुल आदि इन्हीं सामग्री से बनाते हैं।

खाली समय में किए जाते हैं तैयार

सूरत में होली के अवसर पर लोककला के प्रदर्शन के लिए आने वाले कलाकार ज्यादातर राजस्थान में मारवाड़ के होते हैं। निर्धारित कार्यक्रम के अभाव वाले दिनों में ये घरों में बैठकर अपने लहंगे-ओढ़णी के परिधान के अलावा तरह-तरह के आभूषण बनाते हैं। इनकी मानें तो एक दिन में एक ड्रेस वे तैयार कर लेते हैं।

दिनेश भारद्वाज

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