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खुले केदारनाथ धाम के कपाट, गूंजा हर-हर महादेव

Updated: IST kedarnath dham
चार धाम यात्राः केदारनाथ धाम में फिर हर-हर महादेव गूंज उठा

चार धाम यात्रा के प्रमुख केन्द्र केदारनाथ धाम के कपाट आज बुधवार को खुल गए। केदारनाथ धाम के बाद बद्रीनाथ धाम के कपाट भी छह मई को खुल जाएंगे। इससे पहले 28 मई को गंगोत्री तथा यमुनोत्री धाम के कपाट खुले थे जिनके साथ ही चार धाम यात्रा का शुभारंभ हो गया।

केदारनाथ धाम के कपाट खुलने पर फिर एक बार हर-हर महादेव गूंज उठा। केदारनाथ की वादियां फिर जीवंत हो उठी। चहुं ओर की वनस्पति भी सजीव हो उठी। पहाड़ी लोगों के चेहरे खिल उठे और लोगों की आस्था के आगे विनाश की शिव लीला असरहीन हो गई। चार साल पहले केदारनाथ में जब विनाशकारी प्रलय आया था, जब कितने लोगों की जीवन लीला समाप्त हो गई थी, आज तक किसी को पता नहीं। कितनी संपत्ति का नुकसान हुआ था, उसका अब तक सही आंकलन नहीं हुआ। जिनके घरों के चिराग सदा के लिए बुझ गए, उनका दुख तो सदियों तक खत्म नहीं हो सकता, लेकिन हादसे के कारण लोगों के दिल में भय व्याप्त हो चुका था। अब स्थिति कुछ अलग है।

केदारनाथ में फिर गूंजा हर-हर महादेव

चार साल पहले हुए हादसे ने गौरी कुंड तो क्या कहें, उससे पहले सोनप्रयाग तक भारी तबाही मचाई थी। सब कुछ खत्म सा हो गया था। बड़ी संख्या में लोग काल के ग्रास बन चुके थे। बड़ी संख्या में वाहन मंदाकिनी नदी में समा गए थे। लोग इसे धरती पर प्रलय की संज्ञा दे रहे थे और सही भी था। आज भी लोग उस आपदा को लेकर जिज्ञासा लिए हुए थे। हम पहुंच गए गौरी कुंड। यहां की धराशायी इमारतें, होटलें, अपनी बर्बादी की कहानी कह रही थी। पुराने लोगों ने बताया कि मां पार्वती का यहां मंदिर है। आप जिस गौरी कुंड पर हैं, वह सदियों पुराना केदारनाथ धाम का नहीं रहा।

कभी यहां बड़ा बाजार सजा करता था। अब कुछ नहीं है, जो कुछ दिख रहा है वो केदारनाथ की कृपा से बचा हुआ ही नजर आ रहा है। आगे जाओ, खुद देखो, कहानी तबाही के मंजर की। मन में भय था, मगर विश्वास था। इसी विश्वास के सहारे आगे बढ़ चले। जंगल चट्टी, भीम बलि तक तो सब कुछ ठीक था। उसके आगे रामबाड़ा। शायद, यह नाम कोई नहीं भूल सकता। एक गांव, एक बाजार, हजारों तीर्थ यात्रियों का ठहरराव स्थल। केदारनाथ धाम जाने का रास्ता। यहां सब कुछ खत्म हो गया था। आज भी वहां भय की चीख वादियों में सुनाई देती है। इंसान कहें यानि गांव और बाजार नाम की चीज नहीं है। है तो सिर्फ विनाश की दास्तां। दो पहाड़ों के बीच में से बहती मंदाकिनी। एक तरफ का हिस्सा जहां सब कुछ खत्म हो गया, एक तरफ वो जहां प्रशासन ने फिर नया बना दिया।

यहां के कंड़ी, पालकी और खच्चर चलाने वाले पहाड़ी लोग बताते हैं कि उस समय का दृश्य याद करके ही रूह कांप उठती है। अब कुछ नहीं है, परन्तु तीन साल बाद इस साल ही तीर्थ यात्रियों का सैलाब उमड़ा है।

लोग बाबा केदारनाथ की जयकारों के साथ दूरदराज से आ रहे हैं और सच भी है। चारों ओर तीर्थ यात्री ही नजर आ रहे थे। बच्चे से लेकर बूढ़े तक बाबा केदारनाथ धाम जा रहे थे। बड़ी मुश्किलों से केदारनाथ की वादियों में फिर मुस्कुराहट नजर आई है। प्रशासन भी काफी चाक चौबंद है। स्थिति है कि इस जिले का कलेक्टर और एसपी महीने में कभी भी पैदल मार्ग से स्थितियों का जायजा लेने पहुंच जाता है।

प्रशासन ने भले ही पुख्ता व्यवस्था करके हर तीर्थ यात्री का पूरा हिसाब रखा हो, लेकिन बच्चों को साथ लाने से रोक नहीं सका। इतना ही नहीं गौरी कुंड से केदारनाथ धाम जाने वालों पर पूरी तरह पाबंदी नहीं रखी। दोपहर बाद भी तीर्थयात्रियों को केदारनाथ धाम जाने की अनुमति दे रहा है। यात्री को गौरी कुंड से केदारनाथ धाम जाने में औसतन 10 से 12 घंटों लगते हैं, ऐसे में प्रशासन की जरा सी चूक कोई बड़ी घटना को अंजाम दे सकती है।

विनाशकारी प्रलय की यादों के बीच हजारों की तादाद में दूर दराज से आए लोग केदारनाथ धाम पहुंच रहे हैं। गुप्तकाशी तक के होटलों में रहने की जगह नहीं। मुंह मांगे दाम लिए जा रहे हैं, जिन पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं। हालांकि केदारनाथ धाम में जिस तरह से ठहरने के लिए टैंट, कॉटेज आदि की व्यवस्था की है, उसने तीर्थयात्रियों को जीवनदान दिया है। हजारों तीर्थ यात्रियों के रोज केदारनाथ धाम जाने से फिर इस धाम पर हर-हर महादेव गूंज उठा।

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