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जीण माता का चमत्कार देख औरंगजेब ने भी मानी थी हार, हर महीने भेजता था मां के लिए भेंट

Updated: IST jeen mata temple
राजस्थान के सीकर में स्थित जीण माता मंदिर में आकर मुगल शासक औरंगजेब को भी हार माननी पड़ी

हर प्राचीन हिंदू मंदिर अपने आप में एक इतिहास समेटे हुए हैं। राजस्थान के सीकर में स्थित जीण माता मंदिर भी ऐसी ही कई कहानियां अपने में समेटे हुए हैं। इस मंदिर में आकर मुगल शासक औरंगजेब को भी हार माननी पड़ी और देवी के आगे अपनी हार मानते हुए मंदिर में अखंड ज्योत जलाने का वचन दिया। उसने हर महीने सवा मन तेल इस ज्योत के लिए भेंट करने का संकल्प लिया जो उसकी मृत्यु के बाद भी जारी रहा।

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ये है जीण माता की कहानी

किंवदंती है कि चौहान वंश के राजपूत परिवार में जन्मी जयंती अपने भाई हर्ष से बहुत प्रेम करती थी। एक दिन वह अपनी भाभी के साथ तालाब से पानी लेने गई। पानी लेते समय भाभी और ननद में इस बात को लेकर झगड़ा शुरू हो गया कि हर्ष किसे ज्यादा स्नेह करता है। इस बात को लेकर दोनों में यह निश्चय हुआ कि हर्ष जिसके सिर से पानी का मटका पहले उतारेगा वही उसका अधिक प्रिय होगा। दोनों ननद-भौजाई मटका लेकर घर पहुंची जहां हर्ष ने पहले अपनी पत्नी के सिर से पानी का मटका उतारा, जिससे जीण माता नाराज हो गई।

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नाराज जयंती अरावली पर्वत के काजल शिखर पर पहुंच कर तप में लीण हो गई। कड़ी तपस्या के परिणामस्वरूप उनके चमत्कारों की चारों तरफ चर्चा होने लगी और उन्हें जीण माता का नाम दे दिया गया। बाद में भाई हर्ष को जब पूरे विवाद का पता चला तो वह भी बहन को मनाने पहुंचा। लेकिन नाराज जीण माता को देख वह भी वहीं पहाड़ी पर भैंरो की तपस्या करने लगा और भैंरो पद प्राप्त कर लिया। माना जाता है कि मंदिर आठवीं से दसवी सदी के बीच निर्मित हुआ था।

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औरंगजेब ने मानी थी हार

अपनी कट्टरता के लिए कुख्यात मुगल बादशाह औरंगजेब ने जीण माता के मंदिर को तोड़ने के लिए सेना भेजी थी। जब स्थानीय लोगों को यह बात पता चली तो वो बहुत दुखी हुए लेकिन शक्ति के अभाव में कुछ कर नहीं सकते थे। इस पर उन्होंने जीण माता से ही रक्षा का प्रार्थना की। प्रार्थना सुन माता ने अपना चमत्कार दिखाया और मधुमक्खियों के एक बड़े झुंड ने मुगल सेना पर हमला कर दिया।

मधुमक्खियों के हमले से पूरी सेना भाग खड़ी हुई। मुगल शासक औरंगजेब भी बीमार हो गया। इस पर उसने अपनी गलती स्वाकारी और माता के यहां अखंड ज्योत जलाने का वचन दिया और कहा कि वह हर माह सवा मन तेल मंदिर के लिए भेंट करेगा। इसके बाद उसकी तबीयत सही हुई। उसने जीते-जी अपने इस वचन को निभाया, औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात जयपुर राजवंश ने इस परंपरा को जारी रखा।

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