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अंतर्मन को जाग्रत करता है दु:ख, खुलते हैं ज्ञान चक्षु

Updated: IST Religion, spirituality
ईश्वर का सान्निध्य और उनकी अनुकंपा पाने के लिए सुख की नहीं अपितु दु:ख की याचना ज्यादा कारगर होती है

ओशो ने कहा था, "सुख मुझे सुलाता है और दु:ख जगाता है। सुख में मैं परमात्मा को भूल जाता हूं और दु:ख मुझे उसकी याद दिलाता रहता है। सही कहूं तो दु:ख मुझे उसके करीब लाता है। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूं कि हे प्रभु, इतना कृपालु मत हो जाना कि सुख ही सुख देते रहो। मुझे खुद पर भरोसा नहीं है। तू सुख ही सुख देता रहेगा तो मैं सो ही जाऊंगा। मुझे थोड़ा-थोड़ा दु:ख भी देते रहना, ताकि तुझे मैं स्मरण करता रहूं और जीवन सफल बना पाऊं।"

परमात्मा से दूरी घटाने का माध्यम

अगर जीवन में पीड़ा नहीं होगी तो सही मायने में सुख का भी आनंद लेना मुश्किल हो जाएगा। कांटों के बिना गुलाब के फूल में कोई रस नहीं है, कोई अर्थ नहीं है। अंधेरी रातों के बिना सुबह की ताजगी नहीं है और मौत के अंधेरे के बिना जीवन का प्रकाश कहां? संसार भी परमात्मा के मार्ग पर एक पड़ाव है। संसार परमात्मा का विपरीत नहीं है, विरोध नहीं है, वरन् परमात्मा को पाने की ही चेष्टा का एक अनिवार्य अंग है। यह दूरी पास आने की पुकार है। यह दु:ख जागने की सूचना है। सुख छोड़ो, सुख की आकांक्षा छोड़ो। जब जीवन में दु:ख का पर्दापण होगा तो ही सुख का असली एहसास होगा। तभी हम अंतर्मन और बाहर से सुख को जी सकेंगे।

कर्म के साथ नहीं रखें कोई कामना

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं निष्काम कर्म योग। तो बस इतनी सी बात कहते हैं कि उद्देश्य तो रखो कर्म का, लेकिन यह कामना मत रखो कि फल तुम्हारे उद्देश्य के अनुरूप हो। अगर कृष्ण के अनुसार तुम कर्म करोगे तो तुम्हें पीड़ा नहीं होगी। लेकिन कर्म करते हुए भी तुम दु:खी होते रहते हो तो इसका कारण है तुम्हारा कर्म नहीं, बल्कि कर्म के साथ जुड़ी कामना है। दूसरे शब्दों में कहना चाहो, तो कह सकते हो कि सकाम कर्म पीड़ा का कारण है। निष्काम कर्म दु:ख का कारण नहीं है। दु:ख ही तुम्हें संसार सागर की सच्चाइयों का सामना कराता है।

सुख का अभिमान मिटाने का आधार

दु: खी मनुष्य कल्पना की हवा देकर छोटी-छोटी परेशानियों को भी बड़ा रूप दे देता है। वह स्वयं को संसार का सर्वाधिक परेशान और अभागा समझने लगता है। पर, यह उसका केवल भ्रम होता है। उससे भी अधिक परेशान और समस्याग्रस्त लोगों से संसार भरा पड़ा है। सुखी और दु:खी दोनों के लिए अपनी दृष्टि को विशाल बनाना जरूरी है। इससे जहां सुख का अभिमान मिट जाता है, वहां पीड़ा का भार और तनाव भी खत्म हो जाता है। सुख और दु:ख की कोई सीमा नहीं होती है। ऐसी स्थिति में खुद को घोर अभागा समझना अज्ञान का परिचायक है। जैसे रोगी मनुष्य रोग से भी अधिक उसकी कल्पना और चिंता के भार से रोगी होता है, उसी प्रकार परेशान व्यक्ति उलझनों और समस्याओं की पुन: पुन: स्मृति से अधिक पीड़ा महसूस करता है।

यह चुनौती भी है और अवसर भी

ह मारी हालत वैसी ही है जैसे कोई रेलवे स्टेशन पर रहता है और ट्रेनें निकलती रहती हैं। आती-जाती रहती हैं, शंटिंग होता रहता है। शोरगुल मचता रहता है। मगर हमारी नींद नहीं टूटती। हम इतने सोए हुए हैं कि हमें परेशानी या पीड़ा जगा नहीं पाती। दु:ख का सबसे बड़ा अस्तित्व यही है कि दु:ख हमें मांजता और जगाता है। दु:ख न हो तो हम किसी भी काम के नहीं रहेंगे। यह हमें आत्मा देता है, चुनौती देता है। यह हमारे ऊपर है कि हम पीड़ा और परेशानी को कैसे लेते हैं? विद्वानों के अनुसार दु:ख को चुनौती की तरह लो। यह एक चुनौती और एक अवसर भी है। तुम दु:ख को देखो और जागो। इसके तीर को चुभने दो भीतर, उसी से तुम्हें परमात्मा की याद आनी शुरू होगी। जब तुम्हें परमात्मा का सान्निध्य मिलने लगेगा तो तुम्हें दु:ख के सुख का एहसास होने लगेगा।

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