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करवा चौथ : अर्जुन की सलामती के लिए द्रोपदी ने किया था यह व्रत

Updated: IST For Arjun, Draupadi was the Karva Chauth vrat
सारा दिन भूखी-प्यासी रहकर पत्नियां अपने पति की लंबी आयु के लिए आसमां के चांद से वरदान मांगेंगी। सोलह शृंगार में सजी हुई महिलाएं अपने पति के हाथ से ही पानी पीकर ही इस व्रत को खोलेंगी।

उज्जैन. सारा दिन भूखी-प्यासी रहकर पत्नियां अपने पति की लंबी आयु के लिए आसमां के चांद से वरदान मांगेंगी। सोलह शृंगार में सजी हुई महिलाएं अपने पति के हाथ से ही पानी पीकर ही इस व्रत को खोलेंगी। चलनी के माध्यम से पहले आसमां के चांद को और बाद में अपने चंदा (अर्थात पति) को निहारेंगी। पूजन विधि के इस अनूठे आयोजन में शहर की कई महिलाएं शामिल होंगी।

महिलाएं करवा चौथ का पूजन करती हैं
कार्तिक मास की चतुर्थी बुधवार 19 अक्टूबर को है। इस दिन विवाहित महिलाएं करवा चौथ का पूजन करती हैं, दिनभर निर्जल व्रत कर वे चांद से पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। चंद्र उदय होते ही करवा अर्थात मिट्टी के जल पात्र की पूजा कर चंद्रमा को अघ्र्य दिया जाएगा। महिलाएं पूरे दिन व्रत रखने के बाद रात में चंद्रोदय होने पर पूजन के बाद ही जलग्रहण कर व्रत खोलेंगी।

चंद्रमा मन के कारक देवता हैं
ज्योतिर्विद पं. आनंदशंकर व्यास ने बताया चंद्रमा मन के कारक देवता हैं। चंद्रमा की पूजा करने से मन की चंचलता पर नियंत्रण रहता है। चंद्रमा के शुभ होने से मन प्रसन्न रहता है और मन से अशुद्ध विचार दूर होकर शुभ विचार उत्पन्न होते हैं। शुभ विचार ही मनुष्य को अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।

यह है मान्यता
भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को इस व्रत का महत्व बताया था। पांडवों के वनवास काल के दौरान अर्जुन तप करने के लिए इंद्रनील पर्वत पर चले गए। बहुत दिन बीत जाने के बाद भी जब अर्जुन नहीं लौटे तो द्रोपदी को चिंता होने लगी। श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को चिंतित देख करवाचौथ व्रत करने का विधान बतलाया। द्रोपदी ने यह व्रत किया और उसे व्रत का फल मिला। अर्जुन पर्वत से सकुशल तपस्या पूरी कर लौट आए।

 Draupadi was the Karva Chauth vrat

इनके दर्शन से होती है योग्य वर की प्राप्ति
विश्व प्रसिद्ध भगवान महाकाल के दरबार में स्थित रिद्धि-सिद्धि गणेश का यह मंदिर अनूठा है। बताया जाता है कि इनके दर्शन करने मात्र से अविवाहित युवतियों को योग्य वर की प्राप्ति होती है। अतिप्राचीन व सुंदर प्रतिमा रिद्धि-सिद्धि के रूप में विराजित है। यहां भक्तों की हर कामना पूरी होती है। पं. भरत गुरु ने बताया कि पुजारी बालकृष्ण जोशी व मंदिर प्रबंध समिति द्वारा इनकी स्थापना की गई थी। नित्य रूप से गणपति अथर्वशीष व गणेश स्तोत्र पाठ होते हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्व में ऐसी व्यवस्था थी कि महाकाल आने वाले श्रद्धालु पहले इनके दर्शन करते थे, बाद में महाकाल के।

कब निकलेगा आसमां का चांद
उज्जैन में रात 9.01 मिनट पर चंद्रोदय होगा। शाजापुर में रात 8.58 पर।

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