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सिंहस्थ फ्लैशबेक... जैसे भोर की किरणें भी इन तपस्वियों का ही इंतजार कर रही थीं

Updated: IST Simhastha flashback, 22 april, how to forget those
एक वर्ष पूर्व इसी दिन सिंहस्थ 2016 केपहले शाही स्नान के साथ शुरु हुआ था धर्म का महामेला, जो साक्ष बना वह आज भी उन पलों को फिर जीना चाहता है।

उज्जैन. एक ओर प्रकृति का घना अंधेरा और दूसरी तरफ मानव निमिज़्त रोशनी से जगमगाता शिप्रा घाट। मध्य रात्रि के 3.30 बजे तक आम श्रद्धालु घाटों पर स्नान कर रहे हैं, कुछ देर बाद अखाड़ों का शाही स्नान शुरू होने वाला है और प्रारंभ होने वाला है आस्था के महासैलाब सिंहस्थ महाकुंभ का। लाखों श्रद्धालु होने के बावजूद तपस्वी नागा साधुओं के पहुंचने से पहले घाट पर एक सन्नाटा-सा छाता है। सूरज की किरणें भी मानो धरती पर आने से पहले इन तपस्वियों की मां शिप्रा की गोद में आने का इंतजार कर रही हों।
यह नजारा था एक वर्ष पूर्व
कुछ ही देर में हर-हर महादेव की गूंज के साथ नागा साधुओं का हुजूम इस सन्नाटे को चीरता हुआ दत्तअखाड़ा घाट पहुंचता है। भगवान का पूजन और सेनापति का इशारा होते ही उत्साह से भरे सैकड़ों साधु मां शिप्रा में कूद पड़ते हैं। यह नजारा था ठीक एक वर्ष पूर्व आज ही के दिन सिंहस्थ 2016 की पहली भोर का।
जैसे इसी के लिए धरती पर आए हों

पहले शाही स्नान में साधु-संतों का उत्साह देखते बनता था। शिप्रा में डुबकी लगाने की जो खुशी और सुकून साधु-संतों के चेहरे पर था, मानो जैसे उन्होंने बस इसी पल के लिए जन्म लिया हो।

आचार्य महामण्डलेश्वर ने भी किया स्नान

जूना अखाड़े के आचार्य महामण्डलेश्वर अवधेशानंद महाराज ने भी शाही स्नान किया था। उनके साथ प्रेमगिरि महाराज, चिदानंद महाराज व अन्य साधु-संत, अनुयायी मौजूद थे।

जुलूस के साथ पहुंचे रामघाट
एक ओर शैव संप्रदाय के अखाड़े शिप्रा में स्नान के लिए पहुंच रहे थे वहीं वैष्णव संप्रदाय के अखाड़े भी मंगलनाथ क्षेत्र से जुलूस निकालते हुए घाट की ओर बढ़ रहे थे।

त्रिकाल संध्या में किन्नर अखाड़े का स्नान
सिंहस्थ 2016 किन्नर अखाड़े के कारण भी याद रखा जाएगा। इसी सिंहस्थ में किन्नरों ने अपने अखाड़े का गठन किया। किन्नर अखाड़े ने 22 अप्रैल को त्रिकाल संध्या में गंधवज़् घाट पर आस्था की डुबकी लगाई थी।

12 वर्ष में ही मिलता है शिप्रा पर यह नजारा
12 वर्ष का इंतजार करने के बाद सिंहस्थ में आस्था का सैलाब आता है। पहले शाही स्नान पर भी शिप्रा के दोनों किनारों पर दूर-दूर तक सिर्फ श्रद्धालु ही नजर आ रहे थे।

संतों और श्रद्धालुओं के लिए संवरी शिप्रा
मां शिप्रा ने भी उनके लिए स्वयं को संवारा था। यह पहला सिंहस्थ था, जिसमें शिप्रा के साथ ही नमर्दा की भी मौजूदगी थी। भरी गर्मी के बावजूद नदी स्वच्छ कल-कल बहते पानी से भरी हुई थी तो घाट रंग-बिरंगी रोशनी से सजे थे।

अव्यवस्था के शिकार हुए श्रद्धालु
कुछ जगह कमजोर प्रबंधन भी सामने आया। पुलिस प्रशासन घाटों को समय पर खाली नहीं करवा पाए। साधु-संत नाराज हुए तो पुलिस ने स्नान करते भक्तों को खदेडऩा शुरू कर दिया था।

सिंहस्थ में कोई वीआईपी नहीं
सिंहस्थ सिर्फ साधु-संत और भक्तों का था। यहां कोई वीआईपी नहीं था। इस बात को सबसे पहले मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने ही चरितार्थ किया था। पहले शाही स्नान के दिन मुख्यमंत्री परिवार के साथ शहर आए और बिना बत्ती लगी कार में ही घूमे।

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