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पाकिस्तान की बिहारी बस्ती और बनारस चौक पर बम कौन गिराएगा  

Updated: IST india on pakistan
-पाकिस्तान के कराची मे धड़कता है पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का दिल

आवेश तिवारी
वाराणसी.वह 1985 की गर्मियां थी जब पहली बार पाकिस्तान की औद्योगिक राजधानी कराची में साम्प्रादायिक दंगे भड़के थे। पठानों ने एक साथ बिहारी बस्ती और बनारस चौक पर हमला बोल दिया था पठानों का मानना था कि हम स्थानीय हैं जबकि बिहारी बस्ती और बनारस चौक वाले मोहाजिर , भारत पाकिस्तान के विभाजन के वक्त बनारस और उसके आस पास के जिलों से आकर यहाँ बस गए हैं ,उस दंगे में सैकड़ों लोग मारे गए पूरा कारोबार तहस नहस हो गया लेकिन आज उस घटना के लगभग तीन दशकों के बाद कराची का बनारस और करांची की बिहारी बस्ती फिर से खड़ी हो गई है।

बनारस जैसा कराची

1729 में अस्तित्व में आया कराची शहर आज भी हिंदुस्तान ख़ास तौर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के रंग ढंग के साथ आगे बढ़ रहा है इस रंग ढंग में वहां का बनारस चौक भी बढ़ रहा बिहारी बस्ती भी बढ़ रही।कुछ लोग कहते हैं कि कराची हांगकांग के जैसा है तो कुछ कहते हैं कि बेरुत के जैसा भी है जहाँ बंदूकें बेहद आसानी से मिल जाती हैं लेकिन बनारस के अलावा कराची में भी जरदोरी का काम करने वाले अब्दुल बशीर कहते हैं कराची तो बनारस जैसा है। आज जब हिंदुस्तान में उरी हमले के बाद लगातार पाकिस्तान पर हमला बोलने की आवाज उठ रही है , यह सवाल भी बार बार उठ रहा है कि क्या हम उन मोहल्लों उन गलियों पर भी हमला करेंगे जहाँ के लोग आज भी खुद को हिन्दुस्तानी ज्यादा पाकिस्तानी कम समझते हैं ?

कोई गंगा किनारे वाला कोई ल्यारी किनारे वाले

मदनपुरा के मकबूल अभी पिछले महीने कराची से लौटे हैं ,हाल के दिनों में हुई घटनाओं से बेहद भयभीत मकबूल कहते हैं यहाँ और वहां में अंतर केवल इतना है कि हम गंगा और वरुणाकिनारे वाले हैं वो ल्यारी और म्यारी के किनारे वाले। मकबूल कहते कि पाकिस्तान के बनारस में वही लोग हैं जो विभाजन के वक्त बनारस से पाकिस्तान पलायन कर गए। इन लोगों की न बोली बदली न बनारसियत ही कम हुई, वही खाना पीना वही मौज मस्ती।आज के वक्त में पाकिस्तान के बनारस मोहल्ले में साड़ियो की अकेले 500 से 600 दूकाने हैं।बेहद खूबसूरत कारीगरी का असर यह है कि पाकिस्तान में होने वाली शादियों में खरीददारी का एक बड़ा केंद्र कराची का बनारस बाजार ही होता है। हालांकि समय के साथ-साथ वहां पर भी मंदी का असर नजर आने लगा है, आय के अवसर काम हुए हैं।पाकिस्तान के बनारस में चार मोहल्ले हैं जिनके नाम सुलेमानी, रहमानी, फ्रंटियर और रब्बानी है।लगभग हर दूसरे घर में यहां साड़ियों का काम होता है। वही धागा, वही कारीगरी, वही हाथ के काम होते हैं जो यहाँ हिन्दुस्तान के बनारस में होते।

बिहारी बस्ती के मोहाजिर

जहाँ तक बिहारी बस्ती का सवाल है बिहारी बस्ती के लोग ,कराची बंदरगाह और वहां के अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों में दिहाड़ी मजदूरों के तौर पर काम करते हैं ,निस्संदेह कराची शहर में मानव श्रम का एक बड़ा हिस्सा बिहारी बस्ती के ही लोग हैं। यूँ तो पाकिस्तान में बिहारी बस्तियां लगभग सभी शहरों में हैं लेकिन सबसे मशहूर बिहारी बस्ती कराची की है ,जिसकी आबादी लगभग एक लाख 60 हजार के आस पास मानी जाती है मुहाजिर कौमी मूवमेंट के प्रबल समर्थक कहते जाने वाले इस बिहारी बस्ती के लोगों ने कुछ वक्त पहले बिहारी मुहाजिर मूवमेंट नाम से एक अभियान शुरू किया है। बनारस से 80 किमी दूर सह्साराम में जन्मे विश्व प्रसिद्द एक्टिविस्ट इकबाल अहमद यहीं के हैं ,नितीश कुमार और लालू को लोग यहाँ भी पसंद करते हैं यहाँ भी आपको दुकानों पर बाटी चोखा और बिहारी कबाब खाने को मिल जाएगा।

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