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अयोध्या प्रकरण- कांग्रेस और सपा ने मांगा संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का इस्तीफा

Updated: IST Supreme Court
सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा के 13 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने का दिया है निर्देश। जानिये क्या कहा कांग्रेस और सपा नेताओं ने...

वाराणसी. अयोध्या प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश के बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि मामला मर्यादा पुरुषोत्तम राम से जुड़ा है लिहाजा मर्यादा तो यही कहती है कि इन लोगोगं को तत्काल त्याग पत्र दे देना चाहिए। यही नैतिकता का तकाजा भी है। उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी का मसला याद दिलाते हुए कहा हवाला मामले में नाम आने के बाद आडवाणी खुद नैतिकता के नाते पद से हट गए थे। समाजवादी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसला का स्वागत करते हुए कहा कि यह तो बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था।

ये है सर्वोच्च न्यायालय का आदेश

बता दें कि अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाये जाने के मामले में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखे हुए 21 मई 2010 को जब आडवाणी जोशी समेत भाजपा व विहिप के 13 नेताओं को बरी किया था तो एक बार ये लगने लगा था कि विवादित ढांचा ढहाये जाने का मामला शायद शिथिल पड़ जाए। लेकिन ढ़ांचा ढहाये जाने के मामले में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, केंद्रीय मंत्री उमा भारती, यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, विनय कटियार समेत भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद के 13 नेताओं पर आपराधिक षडयंत्र रचने के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि मामले का ट्रायल जल्द पूरा किया जाय और इसकी रोजाना सुनवाई हो।

हाईकोर्ट ने कर दिया था बरी

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में 2010 में अपील की थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में नेताओं को बरी कर दिया था। इसमें लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी समेत दूसरे आरोपियों को क्लीन चिट दी गई थी। इसके बाद 6 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। बुधवार को अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इन 13 नेताओं पर मुकदमा चलाने को आदेश दे दिया।

इन 13 नेताओं पर क्या है आरोप

दरअसल राम मंदिर विवाद काफी पुराना है जहां हिंदू इसे मुगल बादशाह बाबर द्वारा मंदिर ढ़हाकर मस्जिद बनाने की बात करते हैं तो वहीं मुस्लिमों का मानना है कि यहां कभी मंदिर था ही नहीं। इसे लेकर विवाद बढ़ता गया और 6 दिसंबर 1992 विवादित ढांचा गिरा दिया गया। इस दौरान अयोध्या के राम कथा कुंज में मंच पर बीजेपी नेता आडवाणी सहित कई और नेता मौजूद थे। इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने वहां मौजूद रहते हुए मामले को भड़काने का काम किया था जिसे लेकर विवादित ढांचा विध्वंस केस में एक मामला इन नेताओं के खिलाफ जबकि दूसरा मामला उन लाखों कारसेवकों के खिलाफ है, जो घटना के वक्त विवादित ढांचे के आसपास मौजूद थे। सीबीआई ने आडवाणी और 20 अन्य के खिलाफ दो समुदायों के बीच कटुता बढ़ाने, लोगों को भड़काने, अफवाह फैलाने, शांति व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के आरोपों से जुड़ी धाराओं में मामला दर्ज किया था। बाद में आपराधिक साजिश की धारा 120बी को भी जोड़ा गया। हालांकि, स्पेशल कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया और इसके बाद इलाहाबाद हाइकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। जिसके बाद सीबीआइ ने 2010 में मामले को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम में याचिका दायर कर इन नेताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की थी।

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संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इस्तीफा दें

सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्वागत योग्य है। लेकिन अब देश के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को भगवान राम की मर्यादा और नैतिकता के तकाजे के तहत तत्काल अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए। संवैधानिक पदों पर रहते हुए जांच प्रभावित होने की आशंका सदैव बनी रहती है। वैसे भी इन्हें सर्वोच्च न्यायालय के आदेशा का पालन करना चाहिए। वैसे भी तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को पहले भी एक दिन की सजा सुनाई जा चुकी है। शतरुद्र प्रकाश, पूर्व मंत्री एवं एमएलसी

राजनीतिक शुचिता का पालन करें भाजपा नेता

भाजपा नेताओं को अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के दृष्टिगत तत्काल संवैधानिक पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए। चाहिए वो मंत्री हों या राज्यपाल। ऐसी नैतिकता की बात भाजपा हमेशा करती रही हैं कि घटना के वक्त वे लोग मौके पर मौजूद थे। ऐसे में अब और क्या कहा जाए। मनोज राय धूपचंडी,प्रदेश प्रवक्ता समाजवादी पार्टी एवं पूर्व दर्जा प्राप्त मंत्री

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की आड़ में पूरी हुई पीएम मोदी की मंशा

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की आड़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा पूरी हो गई। भाजपा के जिन वरिष्ठ नेताओं से वह दूरी बनाना चाहते थे अब उसके लिए उन्हें मौका मिल गया। अब काहे का मार्ग दर्शक मंडल और काहे की राष्ट्रपति पद की दावेदारी। रास्ता साफ हो गया है। केंद्र सरकार के अधीन जांच एजेंसी ने बड़े समय से पीएम के मन की बात कर दी है। वैसे घटना के वक्त ये सारे लोग मौके पर तो मौजूद थे ही। अब कम से कम संवैधानिक पदों पर विराजमान लोगों को नैतिकता के नाते पद छोड़ देना चाहिए। लाल कृष्ण आडवाणी तो नैतिकता के तहत पूर्व में पद छोड़ कर उदाहरण पेश कर चुके हैं। अब अन्य की बारी है। अजय राय पूर्व मंत्री व पूर्व विधायक

देश के कानून पर सबको विश्वास है

देश के कानून और संविधान पर हर भारतवासी को विश्वास है। कानून हमेशा अपने हिसाब से काम करता है। अयोध्या मामले में भी यही हुआ है। आरोपियों पर मुकदमा चलाने का निर्णय स्वागत योग्य है। हालांकि इससे सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फायदा हुआ है। अब कम से कम एलके आडवाणी का राष्ट्रपति पद का दावा तो खुद ही समाप्त हो गया। लेकिन जो लोग संवैधानिक पदों पर हैं उन्हें नैतिकता और कानून के तहत अपने पद को स्वतः ही छोड़ देना चाहए। डॉ. राजेश मिश्र, उपाध्यक्ष प्रदेश कांग्रेस व पूर्व सांसद वाराणसी

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