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वो हमेशा के लिए सो गया तब जागी सरकार, तेरहवीं के दिन पहुंची मदद की राशि

Updated: IST Relief Fund process  little easier
पत्रिका के जागो जनमत सर्वे के दौरान पता चला, कैंसर पीड़ित ने इलाज के लिए पीएम से लगाई थी गुहार, तेरहवीं के दिन पहुंची सरकारी राशि.

डॉ. अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. सरकार कोई हो, किसी के नेतृत्व की हो। केंद्र की सरकार हो या राज्य की सरकार। इस लोक कल्याणकारी व्यवस्था में हर सरकार जनहित के लिए तमाम योजनआएं लागू करती हैं। लेकिन योजनाओं का लाभ कितने लोग उठा पाते हैं। उठाएं भी तो कैसे। विधायिका ने तो कानून बना दिया। लेकिन कई ऐसे कानून हैं जिसमें कानून बनाने वाले जनप्रतिनिधियों की रजामंदी के बगैर कोई मदद मिल ही नहीं सकती। और जनप्रतिनिधिन से भेंट करना ही आम जन के लिए दुरूह कार्य है। फिर लालफीताशाही की कार्यप्रणाली से सभी अवगत हैं। जी हां ऐसा ही एक प्रकरण पत्रिका के सम्मुख आया, जागो जनमत के लिए वाराणसी के शिवपुर विधानसभा के दौरे के दौरान। शिवपुर विधानसभा क्षेत्र के तिलिमापुर में एक कैंसर पीड़ित के इलाज के लिए प्रधानमंत्री सहायता कोष से धन तो आया मगर उसकी तेरही के दिन। ऐसी सहायता राशि किस काम की।

क्या है केस

तिलिमापुर में दंत रोग चिकित्सक हैं डॉ विवेक तिवारी। वह सारंग मेडीकेयर नाम से नर्सिंग होम भी संचालित करते हैं। डॉ. तिवारी और उनकी पत्नी डॉ. श्रद्धा तिवारी ने पत्रिका से खास बातचीत में बहुत ही दुःखी स्वर में बताया, यूं तो अक्सर इलाके के गरीब मरीज यहां पहुंचते हैं इलाज के लिए। लेकिन कुछ दिन पहले पड़ोस का ही एक मरीज पहुंचा। उसका परीक्षण कराया गया। कई तरह की जांच हुई। पता चला कि उसे कैंसर है। अब कैंसर का इलाज आसान नहीं। उतना पैसा कहां से आए, महंगी दवाओं के लिए। हालांकि इसके लिए व्यवस्था है। सो उसके परिजनों को सलाह दी गई। बताया गया कि क्षेत्रीय सांसद से स्वीकृत करा कर एक फार्म पीएम को भेज दो। उसने सब कुछ किया, फार्म भर कर भेजा भी गया। सहायता राशि आई भी लेकिन उसके तेरही के दिन। यह जानकर हम सभी को काफी दुःख हुआ कि ये सहायता राशि अगर उसे समय से मिल जाती तो शायद कुछ दिन और वह परिवार संग बिता लेता। परिवार वालों को कुछ और प्यार बांट पाता। कुछ और जिम्मेदारियां पूरी कर लेता। लेकिन नहीं। सवाल यही नहीं, सवाल ये भी है कि जब पैसा आया तब वह किस काम का।

क्या है प्रक्रिया

प्रक्रिया के तहत कलेक्ट्रेट में एक राहत बाबू होते हैं। उनका बाकायदा टेबल है। वहां से ही ऐसे लोगों को एक फार्म मिलता है। फार्म भरने के बाद उसी पर संबंधित डॉक्टर उसे अग्रसारित करता है। स्टीमेट का भी जिक्र होता है कि उसके इलाज पर कितनी धनराशि खर्च होगी। फिर उसे जनप्रतिनिधि से अग्रसारित कराना होता है। फिर उसे उसी राहत बाबू के टेबल पर जमा करना होता और वहीं से वह फार्म पीएमओ या सीएमओ (पीएम या सीएम) कार्यालय को जाता है। बतादें कि पीएम व सीएम कार्यालय ऐसे मामलों में बहुत संजीदा होता है। वहां पूरी तत्परता से काम किया जाता है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या पहले राहत बाबू को तलाशना है। वह मिल गए तो फार्म मिल जाएगा। फार्म भर गया, डॉक्टर ने स्टीमेट दर्ज करते हुए अग्रसारित कर दिया। अब सबसे बड़ी समस्या क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि को तलाशना है जो प्रायः नहीं मिलते। वो तो वोट लेने ही आएंगे क्षेत्र में। संसदीय क्षेत्र या विधानसभा क्षेत्र में वह हैं भी तो क्या आम आदमी उनसे मिल पाएगा आसानी से। जवाब होता है नहीं। इस केस में भी ऐसा ही हुआ। विलंब जनप्रतिनिधि से मिलने, उन्हें खोजने में हुआ। काश कि समय से जनप्रतिनिधि उपलब्ध होते तो समय से सहायता राशि भी आ जाती और उसका इलाज भी हो जाता। कुछ होता या न होता पर घरवालों को इतना संतोष तो होता कि उन्होंने मरीज को बचाने का हर संभव प्रयास किया। उसका इलाज कराया। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

क्या कहते हैं डॉक्टर दंपति

बेहद संजीदा डॉक्टर दंपति का बस इतना ही कहना था कि ये प्रक्रिया थोड़ी सरल हो। जनप्रतिनिधि की अनुपलब्धता पर ऐसी कोई व्यवस्था हो जिससे मरीज को तत्काल कोई रेमडी मिल सके। परिवार वालों को भी सहूलियत हो। अगर संबंधित डॉक्टर या सीएमएस अथवा सीएमओ को ही यह अधिकार दिया जाए कि वह अपने स्तर से ही ऐसे मामलों में निर्धारित प्रपत्र को अग्रसारित कर पीएमओ या सीएमओ तक भिजवा सकें तो शायद यह ज्यादा आसान होगा। इसके अलावा यह जिम्मेदारी जिलाधिकारी को ही सौंपी जा सकती है। वह अपने स्तर से प्रशासनिक मशीनरी से इसका पता लगा सकते हैं कि पीएम या सीएम से सहायता राशि मांगने वाला जरूरतमंद है या नहीं। डॉक्टर दंपति ने बड़े भावुक हो कर पत्रिका से कहा कुछ तो इसका रास्ता निकालना ही होगा। कम से कम इसे जनप्रतिनिधि वाला कालम हटाना जरूरी है। कारण उन्हें खोजना बहुत मुश्किल है।

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