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जीवित पुत्रिका व्रतः संतान के दीर्घायु उम्र के लिए महिलाएं रखतीं हैं निर्जला व्रत

Updated: IST Jitiya Vrat
जानिए क्यों करते जीवित पुत्रिका व्रत

वाराणसी. भारतीय संस्कृति में पर्व-व्रत त्योहार की भरमार है। हर त्योहार का अपना एक महत्व होता है। कई ऐसे पर्व भी हैं जो हमारी सामाजिक और पारिवारिक संरचना को मजबूती देते हैं। उसी में से एक व्रत है जीवितपुत्रिका। जीवितपुत्रिका व्रत यानी जीवित पुत्र के लिए रखा जाने वाला व्रत। यह व्रत वह सभी सौभाग्यवती स्त्रियां रखती हैं जिनको पुत्र होते हैं। साथ ही जिनके पुत्र नहीं होते वह भी पुत्र कामना और बेटी की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं।

आश्विन मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषकाल-व्यापिनी अष्टमी के दिन माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सम्पन्नता के लिए यह व्रत करती हैं। इसे ग्रामीण इलाकों में 'जीउतिया' के नाम से जाना जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में इस व्रत की बडी मान्यता है माताएं इस व्रत को बडी श्रद्धा के साथ करती हैं।

वाराणसी के लक्ष्मीकुंड पर जीवित पुत्रिका पूजा
वाराणसी में गोदउलिया स्थित लक्ष्मीकुंड पर व्रतियों का जमावड़ा लगने लगता है। लोग अपनी पुत्र की दीर्घायु आयु के लिए कुण्ड पर पूजा अर्चना करती हैं। महिलाएं स्वयं स्नान करके भगवान सूर्य नारायण की प्रतिमा को स्नान कराती हैं धूप, दीप आदि से आरती करने के बाद जीवित पुत्रिका व्रत कथा सुनती हैं। ऐसी मान्यता है कि बिना कथा सुने उनका व्रत पूरा नहीं माना जाता है। इस दिन बाजरा से मिश्रित पदार्थ भोग में लगाये जाता है।

ऐसे करें पूजा
अगर आप किसी मंदिर में नहीं जा पा रहीं हैं तो व्रती प्रदोष काल में गाय के गोबर से आंगन को लीपने के बाद परिष्कृत करके छोटा सा तालाब भी जमीन खोदकर बनाने चाहिए। तालाब के निकट एक पाकड़ की डाल लाकर खड़ा कर शालिवाहन राजा के पुत्र धर्मात्मा जीमूतवाहन की कुश निर्मित मूर्ति जल या मिट्टी के पात्र में स्थापित कर पीली और लाल रूई से उसे अलंकृत कर धूप, दीप, अक्षत, फूल, माला एवं विविध प्रकार के नैवेद्यों के साथ पूजन करना चाहिए।

जीवितपुत्रिका व्रत का महत्व
जीवितपुत्रिका व्रत की ऐसी मान्यता है कि व्रत रखने वाली माताओं के पुत्र दीर्घजीवी होते हैं और उनके जीवन में आने वाली सारी विपत्तियां अपने आप टल जाती है। शाहपुर में निर्जला उपवास के बाद महिलाएं सामूहिक रूप से जीवितपुत्रिका व्रत कथा सुनती हैं।

जीवितपुत्रिका व्रत कथा
महाभारत युद्ध के पश्चात् पाण्डवों की अनुपस्थिति में कृतवर्मा और कृपाचार्य को साथ लेकर अश्वथामा ने पाण्डावो के शिविर मे प्रवेश किया । अश्वथामा ने द्रोपदी के पुत्रो को पाण्डव समझकर उनके सिर काट दिये । दूसरे दिन अर्जून कृष्ण भगवान को साथ लेकर अश्वथामा की खोज में निकल पडा और उसे बन्दी बना लिया । धर्मराज युधिष्ठर और श्रीकृष्ण के परामर्श पर उसके सिर की मणि लेकर तथा केश मूंडकर उसे बन्धन से मुक्त कर दिया । अश्वथामा ने अपमान का बदला लेने के लिये अमोघ अस्त्र का प्रयोग पाण्डवो के वशंधर उत्तरा के गर्भ पर कर दिया । पाण्डव का उस अस्त्र का प्रतिकार नही जाते थे । उन्होने श्रीकृष्ण से उत्तरा के गर्भ की रक्षा की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप से उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके उसकी रक्षा की । किन्तु उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न हुआ बालक मृत प्रायः था । भगवान ने उसे प्राण दान दिया । वही पुत्र पाण्डव वंश का भावी कर्णाधार परीक्षित हुआ । परीक्षित को इस प्रकार जीवनदान मिलने के कारण इस व्रत का नाम ”जीवित्पुत्रिका“ पड़ा ।
आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित पुत्रिका के रूप में मनाते है इस व्रत को करने से पुत्र शोक नही नही होता है इस व्रत का स्त्री समाज में बहुत ही महत्व है इस व्रत में सूर्य नारायण की पूजा की जाती है ।

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