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जब 55 लाख आदिवासियों के नाथ बन गए रामनाथ 

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जब 55 लाख आदिवासियों के नाथ बन गए रामनाथ

आवेश तिवारी
वाराणसी। वह केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का वक्त था। भाजपा द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और वर्तमान में बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद तत्कालीन अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष थे और उत्तर प्रदेश में सोनभद्र की सुरक्षित संसदीय सीट से रामशकल सांसद चुने गए थे। उस वक्त संसद में एक मामले की बेहद चर्चा हुई थी जब रामशकल ने अपनी ही सरकार में संसद के भीतर यूपी के 55 लाख आदिवासियों के साथ आरक्षण के मुद्दे पर भेदभाव बरते जाने को लेकर सवाल खड़ा कर दिया था। रामशकल बताते हैं इस सवाल के मूल में दरअसल रामनाथ कोविंद की जनजातियों के प्रति प्रतिबद्धता जुडी हुई थी,अटल सरकार द्वारा एक ऐतिहासिक निर्णय किये जाने की जमीं तैयार हो चुकी थी।

बड़े अन्याय के खिलाफ कोविंद की बड़ी लड़ाई
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजाति के आदिवासी गिरिजन प्रदेश के सोनभद्र,चंदौली और मिर्जापुर जिले में फैले हुए हैं । आजादी के बाद से ही यह आदिवासी जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ लेने से वंचित थे, या तो उनको अनूसूचित जाति की तरह समझा जाता या फिर अन्य पिछड़े वर्ग के तौर पर। लेकिन जब कोविंद अनूसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष बने तो उन्हें लगा कि यह अन्याय बड़ा है और फिर रामनाथ कोविंद ने आयोग के अध्यक्ष के तौर पर सरकार के भीतर आदिवासी हितों को लेकर एक लाबी तैयार की। उन्होंने अपनी मुहीम में स्थानीय सांसदों, विधायकों को शामिल किया और केंद्र सरकार से प्रदेश की नौ जातियों को जनजाति का दर्जा देने की सिफारिश कर डाली और अटल सरकार ने भी इसे गंभीर मुद्दा मानते हुए आजादी के लगभग 57 साल बाद गोड़, खरवार, बैगा, चेरो, पनिका, अगरिया, मांझी, पठारी और पहरिया जाति को अनूसूचित जनजाति का दर्जा दे दिया।

कैसे मिलता जनजातियों को आरक्षण गर न होते रामनाथ
प्रदेश में जनजातियों के आरक्षण को मुद्ददा बनाने वाले विचार मंच के संयोजक नरेन्द्र नीरव जो कि रामनाथ कोविंद के मित्र भी है कहते हैं कि अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष के तौर पर रामनाथ कोविंद ने जो किया है उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। अगर वो न होते तो जनजातियों को आरक्षण मिलने का काम अधूरा रहा जाता काबिलेगौर है कि भाजपा सरकार में ही प्रदेश के आदिवासियों को आरक्षण का सही लाभ मिल सका है ,अटल सरकार में जहाँ रामनाथ की वजह से 9 जातियों को जनजाति की मान्यता मिली वही इस वर्ष उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अनूसूचित जनजातियों के लिए प्रदेश में दो सीटें आरक्षित कर दी गई। पहली बार अपने लिए आरक्षित सीटों पर आदिवासी चुनाव लड़ेजबकि पहले यही आदिवासी अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ा करते थे नीरव कहते हैं कि रामनाथ कोविंद ने अटल सरकार के दौरान अपने कार्यकाल में प्रदेश भर में संघ के वनवासी सेवा प्रकल्पों की ख़ाक छानी है। वो बताते हैं कि सोनभद्र ,चंदौली और मिर्जापुर जिले के आदिवासियों के साथ उनके मन के तार जुड़े हुए हैं बिहार में भी राज्यपाल के तौर पर उनके कार्यकाल में आदिवासी जनजातियों के साथ उनका यह जुड़ाव देखा जा सकता है।

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