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मुख्यमंत्री की हत्या को इस माफिया डॉन ने ली थी सुपारी

Updated: IST mafia don shripraksh shukla shootout
पूर्वांचल के रंगीनमिजाज माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला के चलते हुआ था एसटीएफ का गठन

वाराणसी.
पूर्वांचल में नब्बे के दशक में अपराधियों का बोलबाला था। तब के माफिया डॉन बृजेश सिंह को लेकर तरह तरह के कयास थे, मुन्ना बजरंगी भी पुलिस की फाइल में तेजी से नाम चढ़वा रहा था। मोख्तार अंसारी का एकछत्र राज चल रहा था कि पूर्वांचल की धरती पर एक ऐसे माफिया डॉन का आगाज हुआ जिसने यूपी पुलिस को अपनी कार्यप्रणाली तक बदलने को मजबूर कर दिया। जरायम की दुनिया का पहला ऐसा रंगीनमिजाज माफिया डॉन जिससे पुलिस भी कांपती थी। मनबढ़ माफिया ने एक ऐसी गलती की जिससे पुलिस उसके पीछे हाथ धोकर पड़ गयी। 1998 में आज ही के दिन 23 सितंबर को इस दुर्दान्त का अंत हुआ। इस माफिया के किस्से फ़िल्मी दुनिया तक पहुंचे और इस माफिया को लेकर बॉलीवुड ने फिल्म भी बनाई जिसका नाम था सहर।

श्रीप्रकाश शुक्‍ला यूपी में 90 के दशक का सबसे खतरनाक और तकनीक का इस्तेमाल करने वाला पहला माफिया डॉन था। अखबारों के पन्ने रोज उसके कारनामों से रंगे होते। पूर्वांचल से लेकर राजधानी लखनऊ तक के युवाओं में उसका खासा क्रेज था। हाथों में कॉपी की जगह पूर्वाचल के छात्र असलहा लेकर घूमते। यूपी पुलिस हैरान-परेशान थी, नाम पता था लेकिन उसकी कोई तस्‍वीर पुलिस के पास नहीं थी।

बिजनेसमैन से उगाही, किडनैपिंग, कत्ल, डकैती, पूरब से लेकर पश्चिम तक रेलवे के ठेके पर एकछत्र राज चलने लगा। श्रीप्रकाश के बीच जो भी आया उसने उसे बेरहमी से मारने में जरा भी देरी नहीं की, लिहाजा लोग तो लोग पुलिस तक उससे डरती थी।

महंगी कारों को तूफानी रफ़्तार से चलाने, विदेशी शराब और शबाब का शौक़ीन श्रीप्रकाश शुक्ला का उत्तर प्रदेश में खौफ बढ़ता जा रहा था। अन्य माफिया गिरोह भी उससे टकराने से बचने लगे और अपना वजूद बचाये रखने के लिए मुखबिरी का काम शुरू कर दिया। महंगे कपड़ों, ब्रांडेड जूतों के शौक़ीन माफिया श्रीप्रकाश के साथ पुलिस का पहला सामना 9 सितंबर 1997 को हुआ। पुलिस को खबर मिली कि श्रीप्रकाश अपने तीन साथियों के साथ सैलून में बाल कटवाने लखनऊ के जनपथ मार्केट में आने वाला था। पुलिस ने चारों तरफ घेराबंदी कर दी। लेकिन यह ऑपरेशन फेल हो गया। माफिया तो निकल गया
पुलिस का एक जवान भी शहीद हो गया। इस एनकाउंटर के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला की दहशत पूरे यूपी में और ज्यादा बढ़ गई और पुलिस को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।

एसटीएफ का गठन
कहना गलत नहीं होगा कि माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला के चलते ही उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग स्पेशल टास्क फोर्स का गठन करने को मजबूर हुई। श्रीप्रकाश के बढ़ते खौफ को खत्म करने के लिए
लखनऊ स्थित सचिवालय में यूपी के मुख्‍यमंत्री, गृहमंत्री और डीजीपी की एक बैठक हुई। इसमें अपराधियों से निपटने के लिए स्‍पेशल फोर्स बनाने की योजना तैयार हुई।
शासन से हरी झंडी मिलने के बाद 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्‍कालीन एडीजी अजय शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई। इस फोर्स का पहला टास्क था- श्रीप्रकाश शुक्ला और उसके गुर्गो का सफाया।

इस बीच माफिया ने मोबाइल का इस्तेमाल करके अपने अपराध की दुनिया का दायरा बढ़ाया। पुलिस ने भी मोबाइल का उपयोग शुरू किया। सादी वर्दी में तैनात एके 47 से लैस एसटीएफ के जवानों ने लखनऊ से गाजियाबाद, गाजियाबाद से बिहार, कलकत्ता, जयपुर तक छापेमारी तब जाकर श्रीप्रकाश शुक्‍ला की तस्‍वीर पुलिस के हाथ लगी। इधर, एसटीएफ श्रीप्रकाश की खाक छान रही थी और उधर श्रीप्रकाश शुक्ला दुस्साहसिक वारदात को अंजाम देने यूपी से निकल कर पटना पहुंच चुका था।

13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के बाहर बिहार सरकार के तत्‍कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की श्रीप्रकाश ने फ़िल्मी अंदाज में गोली मारकर हत्‍या कर दी। मंत्री की हत्‍या उस वक्‍त की गई जब उनके साथ सिक्‍योरिटी गार्ड मौजूद थे।
इस सनसनीखेज हत्या ने यूपी-बिहार को हिलाकर रख दिया। बिहार के मंत्री के कत्ल का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि तभी यूपी पुलिस को एक ऐसी खबर मिली जिससे उनके हाथ-पांव फूल गए।

श्रीप्रकाश शुक्ला ने यूपी के तत्‍कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी ले ली थी। 6 करोड़ रुपये में सीएम की सुपारी लेने की खबर एसटीएफ के लिए बम गिरने जैसी थी। श्रीप्रकाश की लिस्ट में वर्तमान गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी थे। एसटीएफ हरकत में आई और उसने तय भी कर लिया कि अब किसी भी हालत में श्रीप्रकाश शुक्‍ला का पकड़ा जाना जरूरी है।

एसटीएफ को पता चला कि श्रीप्रकाश दिल्‍ली में अपनी किसी गर्लफ्रेंड से मोबाइल पर बातें करता है। एसटीएफ ने उसके मोबाइल को सर्विलांस पर ले लिया लेकिन श्रीप्रकाश को शक हो गया। उसने मोबाइल की जगह पीसीओ से बात करना शुरू कर दिया लेकिन उसे यह नहीं पता था कि पुलिस ने उसकी गर्लफ्रेंड के नंबर को भी सर्विलांस पर रखा है। सर्विलांस से पता चला कि जिस पीसीओ से श्रीप्रकाश कॉल कर रहा है वो गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में है। खबर मिलते ही यूपी एसटीएफ की टीम फौरन दिल्ली के लिए रवाना हुई।

23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को खबर मिलती है कि श्रीप्रकाश शुक्‍ला दिल्‍ली से गाजियाबाद की तरफ सीएलो कार से आ रहा है।श्रीप्रकाश शुक्‍ला की कार जैसे ही वसुंधरा इन्क्लेव पार करती है, अरुण कुमार सहित एसटीएफ की टीम उसका पीछा शुरू कर देती है। श्रीप्रकाश शुक्ला को जरा भी शक नहीं हुआ कि एसटीएफ उसका पीछा कर रही है। उसकी कार जैसे ही इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, मौका मिलते ही एसटीएफ ने श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक दिया। पुलिस ने पहले श्रीप्रकाश को सरेंडर करने को कहा लेकिन वो नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश मारा गया, इसी के साथ यूपी में उस समय के सबसे बड़े आतंक का अंत हो गया।

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