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लोगों में संयुक्त परिवार संस्कृति में घट रही है रुचि

Updated: IST Joint Family
महानगरीय संस्कृति में संयुक्त परिवार न के बराबर बचे है, और अगर वो नजर आते भी है तो टीवी या फिल्म जगत में

भारत हमेशा से पूरे विश्व में अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। ऐसे ही अतुल्य भारत की छवि दिखाती है यहाँ की संयुक्त परिवार की प्रथा। दो दो तीन तीन पीढ़िया एक साथ एक घर में रहना यहाँ आम बात है, परन्तु समय के साथ धीरे धीरे ये संस्कृति लुप्त हो रही है। महानगरीय संस्कृति में संयुक्त परिवार न के बराबर बचे है, और अगर वो नजर आते भी है तो टीवी या फिल्म जगत में। यही आज की वास्तविकता है। धीरे धीरे छोटे शहरों और कस्बो में भी संयुक्त परिवार परंपरा का पतन सा हो रहा है।

सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है, जो परंपरा भारतीय सभ्यता की एक पहचान थी इतनी तेजी से बिखर क्यों रही है। इसके पीछे एक नहीं बल्कि बहुत सारी वजह है। इन्ही में से एक है दोनों पीढ़ियों में बढ़ती दुरी, जिसे हम आज की भाषा में जनरेशन गैप कहते है। पुराने समय में दादा दादी नाना नानी अपने नाती पोतो के साथ अपना बहुत सा समय बिताते थे, उनमें संस्कारो का रोपण वही किया करते थे।

बच्चे उन्ही के पास खेलते खाते पीते और सोते थे। समय बदल गया है और आज बच्चो के पालन पोषण का तरीका भी बदल गया है। बच्चो को अपना बचपन भरपूर जीने का मौका नहीं मिल पा रहा है। बच्चो और बड़ो दोनों की जीवन शैली बदल गयी। इसी वजह से दोनों पीढ़ियों में टकराव आम हो गया है।

जब भी चर्चा होती है तो आज की पीढ़ी को ही इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, पर क्या ये दोषारोपण सही है। कतई नहीं, सिर्फ एक पक्ष को दोषी सुना देना पर्याप्त नहीं है। समय बदला है, उसी के साथ जीवन शैली भी बदली है। जिम्मेदारियां

पहले के मुकाबले ज्यादा बढ़ी है, उसी तरह अपेक्षाएं भी बढ़ी है। पुराने समय में सबकी जिम्मेदारिया बंटी होती थी, किसी भी प्रकार की समस्या होने पर पूरा परिवार उसका समाधान करता था। आज की नयी पीढ़ी पर ज़िम्मेदारिया और बढ़ी है, व जरुरी है कि पुरानी पीढ़ी इस बात को समझे व तारतम्य बैठाये।

कई बार ऐसे होता है कि पुरानी पीढ़ी परिवर्तनों को नहीं समझती और समय के साथ अपने आप को परिवर्तित नहीं करती, जबकि परिवर्तन संसार का नियम है।ये कहना की हमने ये किया है, ऐसा ही होता है, परिवार में एक स्वाभाविक दुरी ले आता है, बंदिश एक सीमा तक सही है,उससे ज्यादा नहीं। यही एक मुख्य वजह है कि परिवारों में दूरियां आ रही है। मेहनत एक पक्ष को नही करनी, दोनों के लिए आवश्यक है कि दोनों अपने में बदलाव लाये। अपने अहम को छोड़ बदले हुए समय

के साथ बदलाव लाये।

सिर्फ ये कह देना कि आजकल की नयी पीढ़ी गलत है, सही नहीं होगा। साथ तभी होगा जब आपस में विश्वास हो प्यार हो, तभी दोनों पीढ़िया कदमताल के साथ चल पायेगी। शायद ये छोटी सी बात लोगो को समझ में आ जाये तो हमारी ये परम्परा भविष्य में भी अपना वर्चस्व बरक़रार रख पाए।

डॉ शिल्पा जैन सुराणा

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