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देश के सभी धर्मों के लोग में है आपसी भाईचारा

Updated: IST politics and religion
धर्म-निरपेक्षता राष्ट्र भारत में धर्म-निरपेक्षता अब एक हौव्वा का रूप ले चुकी है

- चन्द्रकांता शर्मा

धर्म-निरपेक्षता राष्ट्र भारत में धर्म-निरपेक्षता अब एक हौव्वा का रूप ले चुकी है। नए-नए कोणों से इसको परिभाषित किया जा रहा है। हालात यहाँ तक आ पहुँचे हैं कि स्वयं "धर्म-निरपेक्षता" में से साम्प्रदायिकता की बू आने लगी है और साम्प्रदायिकता की ही भाँति यह भी दूषित और प्रदूषित होने लगी है। भारत में धर्म-निरपेक्षता का स्वरूप अब से पहले ज्यादा स्पष्ट और साफ-सुथरा था, लेकिन अयोध्या की घटनाओं के बाद धर्म-निरपेक्षता को जाँचने-परखने का नजरिया बदला है तथा राजनैतिक हृास हुआ यह है कि जो लोग वाकई भारतीय संविधान की छाया में अपने आपको स्पष्ट और तटस्थ बनाये हुये थे, वे भी स्वत: ही साम्प्रदायिकमता की चिन्गारी की चपेट में आने लगे हैं तथा उनकी विचारधारा भी अनभिज्ञता में नया मोड़ ले रही है। यह स्थिति अत्यन्त भयावह तथा राष्ट्र के लिए नुकसानदायक है, इसलिए साम्प्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता से हमें जल्दी ही मुँह मोड़ लेना होगा, वरना वह दिन दूर नहीं है जब राष्ट्र संकीर्णता के दलदल में अलगाव के रास्ते की ओर बढऩे लगेगा तथा हमारे आपसी विवाद राष्ट्रीय फलक पर व्यापकता के साथ स्थायी रूप धारण कर लेंगे।

भारतीय राजनीति पर सूक्ष्मता से विचार किया जाए तो उसका क्रमश: अवमूल्यन हुआ है और उसने ही हमारी सांस्कृतिक, सामाजिक व राजनीतिक स्थिरता को चौपट भी किया है। राजनीति का यह अध:पतन सभी क्षेत्रों में धड़ल्ले से आया है और नैतिक मूल्यों तथा जीवन मूल्यों की शाश्वतता को ठेस लगती चली गई है। हमारी विकृत लोकतांत्रिक धारणाएं तथा चुनाव हुआ है और इस तरह से जातियता, क्षेत्रीयता, भाषावाद और अलगाववाद जन समाज में कट्टरता को पल्लवित करता रहा है। यही कट्टरता धार्मिक उन्माद का कारण भी बनी है। यह धार्मिक उन्माद अब धीरे-धीरे हर वर्ग में बन रहा है तथा वे सभी अपने-अपने ढंग से अपनी किलेबन्दी के उपायों में संलग्न हैं एवं एक-दूसरे से आतंकित होकर हर वर्ग अपनी सुरक्षा व्यवस्था के प्रति चौकस हुए हैं।

यही चौकसी कट्टरता का पर्याय बनी है और आज जो दंगे पूरे देश में भड़के, वह व्यक्ति की इसी मनोवैज्ञानिकता का परिणाम हैं, जब वे अपने को एक-दूसरे से सुरक्षित कर लेना चाहते हैं। इससे जहाँ धर्म-निरपेक्षता नये अर्थो में व्याख्यायित हो रही है, वहीं इससे वह अपना मूल स्वरूप भी खो रही है। वैसे मोटे तौर पर धर्म-निरेपेक्षता को धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में स्वीकार किया गया है। हमें किसी के धर्म में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की स्वतंत्रता नहीं है तो हमें अपने मनचाहे धर्म को मानने-स्वीकारने की पूर्ण स्वतंत्रता मिला हुई है। इसमें किसी भी प्रकार का सामाजिक या सरकार हस्तक्षेप नहीं है अपितु इस अधिकार को संवैधानिक रूप से मान्यता देकर नागरिकों को नियमानुसार संरक्षण प्रदान किया गया है। हमारी यही स्थूल समझ ही धर्म-निरपेक्षता को सम्पुष्ट करती है तथा सभी विवादों से भी बचाये रखती है। भारतीय धर्म-निरपेक्षता का सांस्कृतिक और पारम्परिक स्वरूप देखा जाये तो वह और भी अधिक आल्हादित करने वाला रहा है। हमारे यहाँ एक-दूसरे वर्ग के पर्व त्योहारों पर बधाई देने, मिष्ठान्न खिलाने तथा गले लगने की अनादि परम्परा रही है।

हिन्दु-मुसलमान एक-दूसरे के धर्म-स्थलों व आस्था-केन्द्रों पर बेरोक-टोक आते जाते रहे हैं। अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में रोज हजारों हिन्दू धर्मावलम्बी जा रहे हैं तो रामदेव पीर के यहाँ हजारों मुसलमान मनौती मनाते हैं। ऐसे एक नहीं हजारों स्थान हैं। जहाँ दोनों वर्गों के लोग बेहिचक आ-जा रहे हैं। यही हमारी भारतीयता तथा उस पर आधारित धर्म-निरपेक्षता है। यह धर्म-निरपेक्षता कोई बनाई नहीं गयी थी, अपितु हमें परम्पराओं के अनुसार विरासत में मिली थी। पचासों पीर-पैगम्बरों की मजारों पर आज लाखों दूसरे सम्प्रदाय के लोग अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यह एक परम्परा रही है, जिससे साम्प्रदायिक सद्भाव और धर्म-निरपेक्षता का पावन निर्वाह होता रहा है। आज स्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं और इक्कीसवीं सदी की ओर लपकते भारत राष्ट्र को कमजोर करने की घिनौनी चालें चली जा रही हैं।

यह विदेशी शक्तियों के हाथों हो रहा है तो सत्ता की ओर लपलपाती लालसा ने भी इसे अपना शिकार बनाया है। पूरा देश मूक दर्शक बन गया है या इन फासिस्ट ताकतों के सामने समर्पण भावना से घुटने टेक चुका है। हमारी यह चुप्पी और समर्पण कितना घातक होगा, इसे भविष्य तो बतायेगा ही लेकिन दूरदर्शिता से आज भी देखा जा सकता है। भारत के बुद्धिजीवी वर्ग का आज भी जनमानस को गुमराह करने में बड़ा हाथ है। वह अपने उल्लू सीधा करने या फिर अपनी अधकचरी मानसिकता से राष्ट्रवादियों को धर्म-निरपेक्षता की सापेक्ष समझ विकसित नहीं कर पाया है। अपितु यों कहें कि इससे जनमानस में निराशा और कट्टरता का मिला-जुला भाव बढ़ा है तो अतिश्योक्ति नहीं है। हमारे जन संचार माध्यम बस इन्हीं के एकालाप को गाते रहे, उसके परिणामस्वरूप जनसामान्य में धर्म-निरपेक्षता का अर्थ अपने धर्म के लिए सब कुछ न्यौछावर करने तथा दूसरे धर्मावलम्बी को अपना आक्रामक मानकर चलने की भावना विकसित हुयी है और वास्तविक धर्म-निरपेक्षता आहत हुयी है।

धर्म-निरपेक्षता को नयी रोशनी, नये मूल्यों, नये युग के मापदण्डों तथा वैज्ञानिक विकास के प्रकाश में ही देखने से कल्याण का मार्ग है वरना हमारे अब तक प्राप्त वैज्ञानिक विकास के सभी लक्ष्यों पर पानी फेरने में तो कमी नहीं रही है। एक आदिम व्यवस्था परोक्ष रूप से पनप रही है तथा धार्मिक रूप से मनुष्य और अधिक हिंसक व बर्बर हुआ है। ऐसे-ऐसे नृशंस काण्ड हो रहे रहे हैं, जिन्हें सुनकर अचरज के साथ-साथ मनुष्य के पशु बन जाने की बात की पुष्टि होने लगी है।

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