बस में नहीं मिलती सीट, होना पड़ता है अपमानित

बस में नहीं मिलती सीट, होना पड़ता है अपमानित

Gopal Bajpai | Publish: Jan, 14 2018 07:35:00 AM (IST) Agar, Madhya Pradesh, India

आगर मालवा. ग्रामीण क्षेत्र से आगर में पढऩे के लिए आने वाले विद्यार्थियों को गांव से लेकर शहर तक आने के लिए खासी मशक्कत करना पड़ती है। प्रतिदिन आने-जान

आगर मालवा. ग्रामीण क्षेत्र से आगर में पढऩे के लिए आने वाले विद्यार्थियों को गांव से लेकर शहर तक आने के लिए खासी मशक्कत करना पड़ती है। प्रतिदिन आने-जाने के लिए विद्यार्थियों का एक मात्र साधन यात्री बस ही रहती है। इन बसों में सफर करना अब विद्यार्थियों के लिए मुश्किल हो चुका है। सफर के नाम पर विद्यार्थियों को आए दिन बदसलूकी एवं अपमान का शिकार होना पड़ रहा है। कुछ इसी प्रकार की स्थिति छावनी नाका एवं बड़ोद रोड चौराहे पर प्रतिदिन दिखाई दे रही है। यात्री बसों में सवारी अधिक होने पर या तो विद्यार्थियों को बिठाया ही नहीं जाता है ।
आगर-कानड़ मार्ग, आगर-बड़ोद मार्ग एवं आगर-सुसनेर मार्ग से प्रतिदिन सैंकड़ों विद्यार्थी कॉलेज अन्य संस्थानों में पढऩे आते हैं। गांव से ही जो भी बस मिल जाती है उस बस में सवार होकर विद्यार्थी शहर तक आ जाते हैं। कोई विद्यार्थी बस में पूरा किराया देता है तो कोई छूट का सहारा ले लेता है। इन सबके बीच विद्यार्थियों की एक अहम परेशानी अब सतह पर दिखाई देने लगी है। छावनी नाके से कानड़ तथा कानड़ के बीच आने वाले दर्जनों गांवों की ओर तथा सुसनेर मार्ग के गांवो की ओर जाने-आने वाले विद्यार्थियों के लिए बस में सफर करना बेहद टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
सुरक्षा पर सवाल
स्कूल, कॉलेज, कोचिंग सेंटर ईत्यादी स्थलों पर तो छात्राओं की सुरक्षा पर कोई खतरा नही रहता है लेकिन अंधेरा होने के बाद जब छात्राएं अपने गांव की ओर बस में सवार होकर जाती है तो मुख्य सड़क से अपने गांव तक के रास्ते पर हमेशा छात्राओं पर खतरा मंडराता रहता है।
छात्राओं को नहीं मिलती है सीट
जैसे ही छात्राएं बस में सवार होने लगती है तो बस पर तैनात कर्मचारी उन्हे सबसे पहले चढऩे से रोकता है और बोलता है कि पहले सवारी बैठ जाए उसके बाद तुम लोग पीछे के दरवाजे से बैठ जाओ। अधिकांश बसों में छात्राओं के बैठने के लिए भी जगह नहीं बचती है। बस में पीछे सवार होने के बाद छात्राओं की सुरक्षा पर भी खतरा मंडराता रहता है और वहां बैड टच की स्थिति निर्मित होने लगती है। जब इस संबंध में कानड़ की ओर जाने वाली कुछ छात्राओं से चर्चा की गई तो उन्होने बताया कि बसों में सफर करना हमारे लिए खासा मुश्किल हो चुका है। यदि हमें पढऩा है तो इतना संघर्ष तो करना ही होगा। प्रतिदिन किसी न किसी से कहा-सुनी होती है। बस वालों का रवैया भी हमारे प्रति सहानुभूति पूर्वक नही रहता है।

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