यूं ही नहीं की थी मोदी ने ‘बुआ-बबुआ’ की जोड़ी टूटने की ‘भविष्यवाणी’, भाजपा की इस रणनीति को न भांप सके माया-अखिलेश

यूं ही नहीं की थी मोदी ने ‘बुआ-बबुआ’ की जोड़ी टूटने की ‘भविष्यवाणी’, भाजपा की इस रणनीति को न भांप सके माया-अखिलेश

Amit Sharma | Updated: 04 Jun 2019, 02:14:57 PM (IST) Agra, Agra, Uttar Pradesh, India

सबसे बड़े सियासी दुश्मन एक दूसरे के ‘साथी’ बन कर ‘सामाजिक न्याय से महापरिवर्तन’ का संदेश देने निकले। दोनों को उम्मीद थी देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में अपना-अपना कद बढ़ाने की लेकिन वोटर कुछ और ही मन बना बैठा था।

अमित शर्मा

आगरा। सियासत में मित्रता और दुश्मनी दोनों स्थाई नहीं होते। 2019 के लोकसभा चुनाव में देश ने ये आंखों से देखा। सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सियासी दुश्मन एक दूसरे के ‘साथी’ बन कर ‘सामाजिक न्याय से महापरिवर्तन’ का संदेश देने निकले। दोनों को उम्मीद थी देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में अपना-अपना कद बढ़ाने की लेकिन वोटर कुछ और ही मन बना बैठा था। उसने दो ‘साथियों’ के हालात तो नहीं बदले लेकिन रिश्ते एक बार फिर बदल दिए। दोनों की उम्मीद के मुताबिक परिणाम न देकर एक बार फिर दोराहे पर ला खड़ा कर दिया है। दोस्ती की कसमें खाने वालों के संबंधों की डोर बेहद कमजोर दिख रही है। ‘सियासी मिठास’ एक साथ ऐसी कड़वी हुई कि चुनाव बीते जुमे-जुमे चार दिन भी न हो पाए कि एक-दूसरे को गिरेबां में झांकने की नसीहत देने का दौर भी शुरू हो गया है।

Mayawati Dimple

हाथी और साइकिल के मेल का खेल बिगाड़ने की शुरुआत भले ही बसपा प्रमुख मायावती के बयान से हुई है लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसकी पटकथा पहले ही तैयार कर ली थी। इसीलिए सोची समझी रणनीति के तहत 20 अप्रैल को एटा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रैली के दौरान ‘बुआ-बबुआ’ की दुश्मनी पार्ट-2 की शुरुआत की तारीख बता दी थी। मोदी ने इस रैली में कांग्रेस पर कम अखिलेश यादव और मायावती पर ज्यादा निशाना साधा था। मोदी ने साफ कहा था कि 23 तारीख के बाद बुआ – बबुआ की दुश्मनी पार्टी-2 शुरू हो जाएगी।

Akhilesh Mayda Ajit

सवाल उठता है कि मोदी ने अखिलेश माया पर निशाने के लिए एटा को ही क्यों चुना? दरअसल एटा ऐसी लोकसभा सीट है जिसे सपा का गढ़ माना जाता है। यही कारण है कि 2009 में कल्याण सिंह को भी अपनी जमीन पर जीत सुनिश्चित करने के लिए मुलायम का साथ लेना पड़ा था। इस चुनाव में वह निर्दलीय जीते लेकिन सपा उनके साथ रही। हालांकि इसके बाद से भाजपा की टिकट पर कल्याण के बेटे राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया यहां से सांसद हैं। इस बार गठबंधन के तहत यह सीट सपा के खाते में गई। भाजपा के लिए परीक्षा कड़ी थी। क्योंकि यादव वोट और दलित, मुस्लिम अगर मिल गया तो भाजपा के लिए जीतना मुश्किल था। अखिलेश को इसी समीकरण के सहारे जीत की पूरी उम्मीद थी। राजवीर सिंह के सामने देवेंद्र यादव को टिकट दिया गया।

Dimpale

भाजपा ने इस सीट से यादवों में और दलितों के बीच यह संदेश देने की रणनीति बनाई कि यह गठबंधन आपका नहीं बल्कि बड़े नेताओं (अखिलेश-माया) का है। इसकी कमान संभाली पीएम मोदी ने खुद। 20 अप्रैल को रैली करने पहुंचे पीएम मोदी ने भाषणों में दलितों को जहां यह कह कर बिदकाया कि जो लोग कल तक आप पर अत्याचार करते थे, क्या आप आज उनका साथ देंगे? वहीं यादवों को मुलायम और शिवपाल का अपमान याद दिलाकर अखिलेश को कटघरे में खड़ा किया। मोदी अपने मंसूबे में सफल रहे 1,22,670 वोटों से यहां भाजपा प्रत्याशी ने जीत दर्ज की।

Gathbandhan rally

भाजपा की इसी रणनीति का दूसरा हिस्सा था सैफई परिवार को घर में हराने का। ये सभी सीटें एक कन्नौज को छोड़ कर ब्रज में आती हैं। ब्रज की बदायूं से धर्मेंद्र यादव, फिरोजाबाद से अक्षय यादव, मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव और कानपुर क्षेत्र की कन्नौज से अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव मैदान में थीं। इन दोनों क्षेत्र (कानपुर-ब्रज) की जिम्मेदारी भी भाजपा ने संगठनमंत्री भवानी सिंह को दी जिन्हें इटावा-सैफई क्षेत्र में प्रचारक के तौर कार्य करने का अनुभव है। एक तरफ क्षेत्र में पुराने लोगों को मुलायम का अपना याद दिलाकर उनका सम्मान रखने का वादा किया तो वहीं माया-मुलायम का मेल न चल पाने का यकीन दिलाया गया। इस रणनीति में भाजपा कामयाब रही। सपा-बसपा एक दूसरे का वोट ट्रांसफर नहीं कर सकी बल्कि दोनों का कोर वोटर नाराज हो कर बैठ गया। भाजपा ने इस तरह सैफई परिवार का सफाया करने में कामयाबी हासिल की। सिर्फ मुलायम ही जीत सके वो भी उम्मीद से बेहद कम अंतर से।

Mualyam Maya

इसके साथ ही गठबंधन की 19 अप्रैल की मैनपुरी रैली और 25 अप्रैली की कन्नौज रैली में कुछ ऐसा हुआ जिसका अखिलेश को नुकसान हुआ। मैनपुरी रैली में मुलायम की उपस्थिति में मायावती को बेहद सम्मान दिया गया। यहां से पूर्व सांसद और मुलायम के नाती तेज प्रताप यादव ने मायावती के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। वहीं इससे उलट मायावती के भाई आनंद के भतीजे आकाश आनंद का जब अखिलेश ने मुलायम से परिचय कराया तो आकाश आनंद ने राजीनित के पहलवान कहे जाने वाले सीनियर लीडर मुलायम के पैर छूना मुनासिब नहीं समझा। बल्कि सिर्फ हाथ जोड़कर अभिवादन किया। फिर भी मुलाम ने सिर पर हाथ रख कर आकाश आनंद को आशीर्वाद दिया।

Akhilesh Dimple

इसके बाद 25 अप्रैल को तो कुछ ऐसा हुआ जिसे न सिर्फ भाजपा ने अखिलेश के खिलाफ हथियार बनाया बल्कि यादवों को भी नागवार गुजरा। कन्नौज में डिंपल यादव के समर्थन में रैली करने पहुंची मायावती के डिंपल ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया। भाजपा के सोशल वॉलंटियर्स ने इन तस्वीरों को जमकर शेयर किया और प्रचारित किया कि नेता जी का अपमान करने वाली मायावती के पैर छुए जा रहे हैं औऱ परिवार के सदस्य (शिवपाल) का अपमान किया जा रहा है।

Modi Shah

भाजपा ने यह सब सिर्फ इसलिए नहीं किया कि वह यहां सीट जीत जाए बल्कि भाजपा के लिए यह दूर की रणनीति थी। भाजपा इन सीटों पर हराकर यह संदेश देना चाहती कि अखिलेश और मायावती दोनों एक दूसरे का वोट ट्रांसफर करने में कामयाब नहीं हैं, जिससे कि चुनाव बाद दोनों एक दूसरे पर अंगुली उठाएं। हुआ भी वही, मायावती ने अखिलेश की यादवों पर पकड़ न होने का ठप्पा लगा दिया है। मायावती ने साफ कहा है कि यदि यादवों का वोट ट्रांसफर होता तो कम से कम सैफई परिवार के सदस्य तो न हारते। डिंपल को भी अखिलेश न जिता सके। यानि कि मायावती का मानना है कि गठबंधन ने उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ है। कुल मिलाकर भाजपा की रणनीति काम कर गई और बिना फायदे के रिश्ते का अंजाम भी दिखने लगा है।

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