वह दिन दूर नहीं जब अल्ट्रासाउंड की दुनिया में अजन्मे बच्चे से भी मिला जा सकेगा

वह दिन दूर नहीं जब अल्ट्रासाउंड की दुनिया में अजन्मे बच्चे से भी मिला जा सकेगा
Gynecology Ultrasound

Dhirendra yadav | Updated: 05 May 2019, 08:22:39 PM (IST) Agra, Agra, Uttar Pradesh, India

इंडियन सोसायटी ऑफ अल्ट्रासाउंड इन ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (इनसॉग-2019) का समापन

आगरा। कैसा हो अगर इंसान अपने अजन्मे बच्चे से जन्म से पहले ही मिल पाए। जिस तरह हम हॉल में बैठकर थ्रीडी और 4डी फिल्में देखते हैं, उसी तरह एक ग्लास लगाकर गर्भ में अपने बच्चे को देख पाएं। वर्तमान में विज्ञान और तकनीक का विकास जिस तेजी से हो रहा है उससे यह कोई मुश्किल काम नहीं है, मगर दुरुपयोग का डर है।

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असुरक्षित गर्भपात से आठ प्रतिशत महिलाओं की मौत
03 से 05 मई 2019 तक फतेहाबाद रोड स्थित होटल मेंशन ग्रांड में इंडियन सोसायटी ऑफ अल्ट्रासाउंड इन ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (इनसॉग-2019) रविवार को संपन्न हुआ। 600 चिकित्सकों ने पूरे तीन दिनों तक महिलाओं से जुड़ी तमाम गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं, उनके निराकरण एवं इलाज के साथ ही अल्ट्रासाउंड एवं प्रसूति क्षेत्र के वैश्विक विशेषज्ञों द्वारा केस उदाहरण, पैनल डिस्कशन, क्विज, व्याख्यान, पोस्टर एवं पेपर प्रजेंटेशन और अल्ट्रासाउंड शिक्षण आदि किया गया। अंतिम दिन विशेषज्ञों ने बताया कि अल्ट्रासाउंड की दुनिया ऐसी है कि इस तकनीक के बढ़ने से बहुत कुछ बदल सकता है। इसलिए ऐसी चीजों की ही सिफारिश की जाती है जिनसे दुनिया को फायदा हो और महिलाओं और बच्चों की जान बचाई जा सके। विशेषज्ञों ने बताया कि असुरक्षित गर्भपात से आठ प्रतिशत महिलाओं को जान गंवानी पड़ती है।

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इन परिस्थितियों में हो सकता है गर्भपात
अल्ट्रासाउंड का महत्व और किन परिस्थितियों में वैध तरीके से गर्भपात कराया जा सकता है, इस पर चर्चा हुई। कहा, अगर गर्भ में पल रहा बच्चा ऐसा है जिसका जीवन बहुत मुश्किल होगा या उसके अंग ठीक से विकसित नहीं हैं तो गर्भपात हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में ही गर्भपात कराया जा सकता है। गर्भपात के दौरान होने वाली मौत का सबसे बड़ा कारण बिना चिकित्सक की सलाह के दवा लेना होता है।

एडवांस हुई अल्ट्रासाउंड तकनीक
ऑर्गनाइजिंग चेयरपर्सन डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि अब अल्ट्रासाउंड तकनीक बहुत एडवांस हो चुकी है। फोरडी और फाइवडी अल्ट्रासाउंड आ जाने से अब गर्भस्थ शिशु के विकारों का पता चार महीने में ही किया जा सकता है, जबकि एमटीपी एबॉर्शन अपनी वैधता के हिसाब से पांच महीने पर किया जाता है। ऐसे में अल्ट्रासाउंड तकनीक के विकास से गर्भस्थ शिशु के विकारों का जल्द इलाज या वैध गर्भपात किया जा सकता है। ऑर्गनाइजिंग चेयरपर्सन डॉ. जयदीप मल्होत्रा ने बताया कि यह कॉन्फ्रेंस गर्भावस्था में अल्ट्रासाउंड और गर्भाशय संबंधी रोगों को लेकर अल्ट्रासाउंड के महत्व पर केंद्रित थी। बहुत सारी समस्याओं के समाधान इसमें खोजे गए हैं, जिनकी सिफारिश सरकारों से की जाएगी।

एमआरआई से पता लग सकते हैं गर्भस्थ शिशु के दिमागी विकार
वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डा. भूपेंद्र आहूजा ने बताया कि भ्रूण में मौजूदा रोग का आंकलन करने, ट्यूमर प्रक्रियाओं के निदान, पूर्व निर्धारित निदान, भविष्य में विकृति का संदेह, एक गर्भवती महिला की रीढ़, जोड़ों या आंतरिक अंगों की विकृति, गर्भपात के संकेतों का मूल्यांकन आदि के लिए एमआरआई बेहद मददगार साबित हो सकता है। सबसे ज्यादा मददगार यह तब होता है जब गर्भस्थ शिशु में किसी दिमागी विकार का संदेह हो, लेकिन भारत में अभी कम ही जगह यह संभव होता है। यहां अल्ट्रासाउंड की ही मदद ली जाती है। जबकि अमेरिका समेत विभिन्न देशों में एमआरआई तकनीक का लाभ आसान है। अभी यहां कुछ जटिलताएं भी हैं।

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अब ‘बेटी पढ़ाओ-बेटा समझाओ’
सम्मेलन के अंतिम दिन विशेषज्ञों ने अल्ट्रासाउंड तकनीक के दुरुपयोग पर चिंता जाहिर की। कहा कि गर्भ में कन्या भ्रूण की हत्या एक सामाजिक बुराई है। ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन डा. नरेंद्र मल्होत्रा और डॉ. जयदीप मल्होत्रा ने कहा कि वर्ष 2008 में फोग्सी के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा बुलंद किया था। अब 10 साल बाद इस कॉन्फ्रेंस में इस सोच में कुछ बदलाव किया गया है। यहां नया स्लोगन रिलीज किया गया है कि बेटी बचाओ-बेटा समझाओ। इसके पीछे यही सोच है कि विगत 10 वर्षों में हमने काफी कुछ अंतर देखा है। बेटियां पढ़ भी रही हैं, लेकिन बेटा-बेटी में फर्क करने की सोच पर अंतर नहीं आया है। बेटियां सुरक्षित भी नहीं है। ऐसे में हमें अपने बेटों को समझाना होगा कि हर नारी का सम्मान करें।

अंतिम दिन 35 तकनीकी सत्र, 50 पेपर प्रस्तुत
सम्मेलन के अंतिम दिन अलग-अलग विषयों पर 35 से अधिक तकनीकी सत्र तीन सभागारों में हुए। 50 से अधिक पेपर और पोस्टर प्रजेंटेशन किए गए। डॉ. प्रणव कुमार, डॉ. आराधना अग्रवाल, डॉ. सुमन पोद्दार, डॉ. आरती पाटिल, डॉ. अदिति अग्रवाल, डॉ. देवल शाह, डॉ. मोनिका अनंत, डॉ. दीप्ति सक्सेना, डॉ. साहित तोमर, ड. ज्योत्सना रानी, डॉ. श्रुति जैन, डॉ. प्रेरणा अग्रवाल, डॉ. ज्योति सिंह आदि ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

ये रहे मौजूद
इस दौरान बेल्जियम के प्रो. डर्क टिमरमैन, इजरायल की डॉ. करीना क्रेजडन हजरत, यूएसए के डॉ. अल्फर्ड जेड अबूअहमद, यूनाइटेड किंगडम के प्रो. बक्शी तिलंगनाथन, भारत के डॉ. प्रशांत आचार्य, डॉ. नितिन चैबल, डॉ. अनीता कॉल, डॉ. पीके शाह, डॉ. अशोक खुराना, डॉ. निहारिका मल्होत्रा, डॉ. ऋषभ बोरा, डॉ. केशव मल्होत्रा, डॉ. अनुपम गुप्ता, डॉ. निधि गुप्ता, डॉ. सुरभि गुप्ता, डॉ. भूपेंद्र आहूजा, डॉ. गीता कॉलर, डॉ. चंदर लुल्ला, डॉ. प्रतिमा राधाकृष्णन, डॉ. बीएस रामामूर्ति, डॉ. पीके शाह, डॉ. एस सुरेश, डॉ. सुशीला वविलाला आदि मौजूद थे।

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