केवल चंबल सेंक्चुरी में मिलते हैं दुर्लभ 'साल कछुए', बढ़ रही इनकी संख्या, जानें खासियत

यूपी में कछुओं की 15 प्रजातियां हैं, इनमें सबसे दुर्लभ है 'साल कछुआ' (Sal Tortoise), जो सिर्फ चंबल नदी (Chambal River) में पाया जाता है।

By: Abhishek Gupta

Published: 11 Jun 2021, 06:18 PM IST

आगरा. नदियों में बढ़ते प्रदूषण (Pollution) के स्तर से कई जलीय जीव विलुप्त होते जा रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं कछुए (Tortoise), जिनके संरक्षण के लिए तमाम कोशिशें की जा रही हैं। यूपी में कछुओं की 15 प्रजातियां हैं, इनमें सबसे दुर्लभ है 'साल कछुआ' (Sal Tortoise), जो सिर्फ चंबल नदी (Chambal River) में पाया जाता है। राष्ट्रीय चंबल सेंक्चुरी (National Chambal Sanctury) में ऐसे दुर्लभ प्रजातियों के जलीय जीवों का संरक्षण साल 1979 से किया जा रहा है। सबसे अच्छी बात यह है कि प्रदूषण से बढ़ते खतरे की बीच यहां दुर्लभ कछुओं, घड़ियाल, मगरमच्छ, गांगेय डाल्फिन का कुनबा बढ़ रहा है। लेकिन साल कछुआ सबसे अनोखा है, क्योंकि यह कहीं और नहीं मिलता। चंबल सेंक्चुरी के रेंजर आरके सिंह राठौर का कहना है कि बाह से इटावा तक करीब 6000 कछुए चंबल में हैं, जिनमें केवल बाह में ही 3500 कछुए हैं। हैचिंग होने के बाद इनकी संख्या में और बढ़ जाएगी।

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क्या है खास-
साल कछुए के बनावट की बात करें, तो उसका बाहरी कवच कठोर होता है व पूरी तरह से अस्थियों से बना होता है। इनमें नर कछुए आकार में मादा से छोटे व आकर्षक होते हैं। स्वभाव से यह बेहद शर्मीले और सरल होते हैं। यह शाकाहारी होते हैं और नदी व तालाब की सड़ी-गली वनस्पति को खाकर पानी को साफ करते हैं। यह कछुए केवल चंबल नदी में मिलते हैं। चंबल नदी राजस्थान, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश से होकर बहती है। आगरा में बाह में चंबल सेंक्चुरी है, जहां साल कछुए समेत विलुप्त कछुओं की आठ प्रजातियों का संरक्षण किया जा रहा है। साल कछुए केवल चंबल नदी में ही सिमटकर रह गये हैं। प्रदूषण के चलते अन्य नदियों से इनका अस्तित्व खत्म हो चुका है।

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सरयू नदी में भी हैं कछुओं की प्रजातियां-
11 प्रजातियां सरयू किनारे पाई जाती है। यहां की आबोहवा इनके अनुकूल हैं। तीन साल से इनपरशोध कर रही अरुणिमा का कहना है कि बहराइच में सरयू का किनारा कछुओं के सर्वाइवल के लिए काफी उपयुक्त जगब है। यूपी में पाई जाने वाली 15 प्रजातियों में से 11 का सरयू के किनारे मिलना सौभाग्य की बात है। इससे प्रतीत होता है यह इलाका कछुओं की उत्पत्ति के लिए अनुकूल है। इसीलिए 2008 से इनके संरक्षण के लिए यहां एक प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट से अरुणिमा 2018 से जुड़ी हुई हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत हम लोग स्कूली बच्चों, मछुआरों और नदी के किनारे रहने वाले लोंगो को कछुओं के बारे में जागरूक किया जाता है।

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