लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत का गणित बिगाड़ सकते हैं सवर्ण

लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत का गणित बिगाड़ सकते हैं सवर्ण

suchita mishra | Publish: Sep, 04 2018 05:28:40 PM (IST) Agra, Uttar Pradesh, India

एससी/एसटी एक्ट को मूल स्वरूप में बहाल करने के बाद सवर्णों में भाजपा को लेकर खासी नाराजगी देखने को मिल रही है।

आगरा। लोकसभा चुनाव 2019 में अपनी जीत के लिए भारतीय जनता पार्टी बेशक आत्मविश्वास से लबरेज दिख रही है, लेकिन जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार द्वारा एससी/एसटी एक्ट को मूल स्वरूप में बहाल करने का फैसला उनके लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी/एसटी एक्ट में संशोधन कर दोबारा मूलरूप में वापसी का फैसला मोदी सरकार ने दलितों को लुभाने के लिए लिया है, लेकिन ये फैसला सरकार की जीत का गणित बिगाड़ सकता है। इस फैसले के कारण दलित कितना प्रभावित होगा, इसको लेकर फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन बीजेपी सवर्णों का बना बनाया तय वोट जरूर खो सकती है।

उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय वैश्य एकता परिषद और सर्व समाज संघर्ष समिति एससी/एसटी एक्ट के विरोध में उतर आए हैं। इसको लेकर उनमें काफी नाराजगी है। इन संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि सवर्ण हमेशा से भारतीय जनता पार्टी का वोट बैंक रहे हैं। लेकिन पार्टी ने सवर्णों के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। इस एक्ट को वापस मूलरूप में लाकर सरकार लोगों को आपस में लड़ाने का काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग किया जा रहा है, लेकिन भाजपा सरकार दलितों के वोट के कारण सवर्णों की अनदेखी कर रही है। यदि भारतीय जनता पार्टी ने इसके बारे में नहीं सोचा तो आने वाले लोकसभा चुनावों में उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इस मामले में जब पत्रिका ने कुछ सवर्ण युवाओं से बात की तो उनके अंदर भी काफी नाराजगी दिखी। आयुष गुप्ता का कहना है कि मेरे परिवार में आज तक सभी लोग भाजपा को वोट देते आ रहे हैं। लेकिन ये सरकार हमारे लिए आखिर क्या कर रही है? यदि सभी सरकारें दलितों और पिछड़े लोगों को लुभाने में लग जाएंगी तो हम किसी को भी वोट क्यों दें। इससे बेहतर है कि हम इस बार नोटा का इस्तेमाल करें।

वहीं श्वेता दीक्षित कहती हैं यदि किसी कानून का गलत इस्तेमाल हो तो जनहित में सोचना सरकार का दायित्व है। इस बार तो सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट के गलत इस्तेमाल की बात को स्वीकार किया था, लेकिन सरकार ने दलित वोट के लालच में उसे वापस पहले जैसा कर दिया। सरकार के इस फैसले ने सवर्णों का मनोबल तोड़ा है और लोगों को लड़ाने का काम किया है।

 

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