आगरा में 10 अगस्त को हुई थी क्रांति, पढ़िए रोमांचित करने वाली घटना

10 अगस्त, 1942 को आगरा में अगस्त क्रांति हुई। यह क्रांति कथा ऐसी है कि आपकी रग-रग में देशभक्ति का तूफान भर देगी।

By: Bhanu Pratap

Published: 09 Aug 2016, 11:18 AM IST

आगरा। महात्मा गांधी ने नारा दिया अंग्रेजो भारत छोड़ो। अंग्रेजों ने बड़े नेताओ को गिरफ्तार कर लिया था। आगरा के कुछ नेता तो पहले ही पकड़े जा चुके थे, कुछ फरार थे। नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में पूरा शहर बंद हो गया। चारों ओर ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ की गूंज सुनाई दे रही थी। 10 अगस्त, 1942 को आगरा में अगस्त क्रांति हुई। यह क्रांति कथा ऐसी है कि आपकी रग-रग में देशभक्ति का तूफान भर देगी। अगस्त क्रांति के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चन्द्रशेखर आजाद की जन्मस्थली भाबरा (जिला अलीराजपुर, मध्य प्रदेश) से आजादी 70, जरा याद करो कुर्बानी अभियान का शुभारम्भ करने जा रहे हैं।

10 अगस्त के आदोलन ने छुडाए अंग्रेजों के छक्के
नौ अगस्त को आगरा के सभी नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी थी। इस आंदोलन के आगरा प्रमुख बाबूलाल मित्तल भूमिगत होकर वृंदावन चले गए। जब पूरे देश में इस आंदोलन की चिनगारी चरम पर थी, तो बाबूलाल मित्तल को निर्देश मिले कि आगरा में आंदोलन शुरू किया जाए। इसके बाद बाबूलाल मित्तल आगरा आए। फुलट्टी बजार से एक बड़ा जुलूस निकाला गया, जिसमें हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ थी। यह देख अंग्रेजी हकूमत के अफसरों के माथे पर पसीना आ गया। इस जुलूस के बाद मोतीगंज स्थित कचहरी के मैदान में होने वाली सभा कैसे भी न हो सके, इसके लिए अफसरों ने एड़ी- चोटी का जोर लगा दिया। 

August kranti
वो दहशत आज भी है याद
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि शिरोमणि ने बताया कि वो दहशत आज भी याद है। सारे शहर में पुलिस का सख्त पहरा था। अंग्रेज पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाती हुई इधर-उधर दौड़ रहीं थी। जमुना किनारे के आस पास बने बगीचे उस दिन सुनसान पड़े थे। मोतीगंज के मैदान का मुख्य  फाटक बंद था। उसके सामने सशस्त्र सिपाहियों की लंबी कतार मौजूद थी। उनसे आगे कुछ फासले पर इसी तरह की तीन कतार और भी थीं। पास ही डटे हुए थे पुलिस अधिकारी। आभास हो चुका था कि आज पुलिस की गोलियां चलनी  हैं, लेकिन आजादी का जुनून इस कदर छाया हुआ था कि हर एक पुलिस की गोलियां के सामने अपना सीना लाने के लिए तैयार था। 

अंग्रेजी पुलिस को खदेड़ा आंदोलनकारियों ने
मशाल जुलूस चुंगी मैदान के पास पहुंचा। कांग्रेस के बाबूलाल मित्तल को गिरफतार कर लिया। उनकी गिरफ्तारी से तनाव बढ़ गया। कुछ लोग उनकी गिरफ्तारी के विरोध में नारेबाजी करने लगे।  तभी भीड़ में से किसी शरारती तत्व ने एक पत्थर फेंका, जो अंग्रेज पुलिस के एक दरोगा के सिर जाकर लगा। इसके बाद अंग्रेज पुलिस हरकत में आ गई। तीन तीन कतारों ने पोजीशन ले ली। वहां पहले पत्थर की मंडी लगा करती थी, कुछ लोग हाथीघाट जाने वाली सडक पर जमा थे, कुछ पत्थरों की आड़ में छिपे हुए तमाशा देख रहे थे। इस दौरान पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। लोग भयभीत होकर इधर उधर भाग रहे थे। कुछ आजादी के परवाने पुलिस की गोलियों के चीरते हुए उनके सामने दौड़ने लगे। यह देख अंग्रेज पुलिस के छक्के छूट गए। अंग्रेज पुलिस को भीड़ ने चुंगी के फाटक तक खदेड़ दिया।

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और शहीद हो गया एक नौजवान 
हाथीघाट से जो सड़क दरेसी की तरफ जाती है, उस पर अंगेज  पुलिस की कड़ी नाकाबंदी को चीरता हुआ एक नौजवान आगे बढ़ रहा था। हाथ में तिरंगा था, तभी पुलिस की बंदूक गरजी, एक गोली उसकी बांह में लगी वह उठा, चला लेकिन फिर बंदूक की धांय धांय सुनाई दी, जिसमें छीपीटोला के रहने वाले आंदोलनकारी डॉ. सी ललित की टीम के परशुराम की सीने को छलनी कर दिया। परशुराम के जमीन पर गिरते ही पूरा माहौल एकदम शांत हो गया। अंग्रेज पुलिस वाले शहीद परशुराम के शव को मोटर लारी में डालकर जिला अस्पताल ले गए। किसी ने दौड़ कर छीपीटोला स्थित उसके निवास पर उसकी शहादत की सूचना दी। बदहवास मां बाप और रोते बिलखते परिजन भी घटनास्थल पर आ गए। उसकी मां के करुण रुदन से मौजूद लोगों के हृदय फट रहे थे। सभी की आंखों से अश्रुओं की धारा बह रही थी। 

शहादत से मिली आजादी
आजादी का जश्न जो आज मनाते हैं, इसमें परशुराम जैसे न जाने कितने युवक देश पर अपने प्राण न्योछावर करके चले गए। यह आंदोलन परवान चढ़ा और अंग्रेजों को अंत में भारत छोड़ना पडा। शशि शिरोमणि ने बताया कि उस समय आगरा बड़ा केन्द्र हुआ करता था। राजस्थान और एमपी के आंदोलन की रणनीति भी यहीं से तय हुआ करती थी। आगरा में इस आंदोलन के बड़े नेता ताजगंज के भगवती प्रसाद शर्मा, प्रकाश नरायण, गोपाल राम, आदिराम सिंघल, जगन प्रसाद रावत के साथ कई बड़े नाम रहे थे। 

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कैसे हुई शुरुआत
7 अगस्त 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति में महात्मा गांधी बोले थे, कांग्रेस से मैंने यह बाजी लगवाई है कि या तो देश आजाद होगा या कांग्रेस खुद फना हो जाएगी। करो या मरो हमारा मूल मंत्र होगा। 8 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति ने अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकृत किया। 9 अगस्त, 1942 को बंबई में जब इस आंदोलन का बिगुल बजा, तो गांधी जी सहित राष्ट्रीय आन्दोलन के सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। पूरे देश में गिरफ्तारियों का दौर तेजी से शुरू हो गया। 

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