भारत को Independent करने का सपना दिखाकर अंग्रेजों ने First World War युद्ध में झोंक दिये थे भारतीय युवा, रोझौली के 31 युवा भी थे शामिल

भारत को Independent करने का सपना दिखाकर अंग्रेजों ने First World War युद्ध में झोंक दिये थे भारतीय युवा, रोझौली के 31 युवा भी थे शामिल
Independence Day

Dhirendra yadav | Updated: 14 Aug 2019, 09:14:22 AM (IST) Agra, Agra, Uttar Pradesh, India

Independence Day पर पढ़िये ऐसे गांव की कहानी, जहां की मिट्टी में जन्म लेते हैं राष्ट्र रक्षक

आगरा। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। इस आजादी के लिए न जाने कितने वीर जवान शहीद हुए। अनगिनत आंदोलन हुए, तब कहीं जाकर आजाद भारत का सपना साकार हो सका। इस आजादी से पहले भी भारत के शूरवीर जवानों ने शहादत दी, हम बात कर रहे हैं प्रथम विश्व युद्ध की। इस युद्ध में अविभाजित भारत भले ही प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं था, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के समय भारतीय जवानों ने अपने शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया था। सन् 1914 से 1919 तक चले इस महायुद्ध में आगरा के रोझौली गांव के 31 वीर सपूतों ने वीरता और पराक्रम का जौहर दिखाया था, जिसमें युद्ध के दौरान रोझौली गांव का एक जवान शहीद हुआ था। जबकि कई जवान ऐसे थे जिनके अंग भंग हुए थे। ब्रिटिश शासकों ने शहीद की याद में गांव रोझौली में शहीद स्मारक का निर्माण कराया था जो अब शहादत के 100 वर्ष पूरे करते हुए जीर्णशीर्ण हालत में है।

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रोझौली के हर घर में जन्म लेता है फौजी
आगरा के रोझौली गांव की मिट्टी में देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी है। यहां ब्रिटिश काल से ही देश सेवा की भावना लोगों के दिल में बसी है। प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध और पाकिस्तान व चीन से हुए अब तक के सभी युद्ध में आगरा के रोझौली की शहादत को भुलाया नहीं जा सकता। यही वजह है कि वर्तमान में भी करीब 100 से अधिक लोग हैं, जो राष्ट्र रक्षा में लगे हुए हैं।

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शहीद स्मारक पर अतिक्रमण से होती है निराशा
प्रथम विश्व युद्ध में शहीद की याद में बनाए गए शहीद स्मारक पर अब कुछ लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। स्मारक के पास एक पुरानी छतरी बनी हुई है। छतरी के ठीक सामने शहीद जवान की स्मृति में बनाए गए स्मारक की पट्टिका लगी है। सेवानिवृत्त शिक्षक रमेश चंद्र ने बताया कि स्मारक बनाए जाने के समय आस-पास कोई मकान नहीं था, लेकिन अब इस पर कुछ लोगों ने पक्का निर्माण कर लिया है। कई बार प्रशासन और शासन को लिखित शिकायत की है, लेकिन कार्रवाई अब तक नहीं हुई है। रमेश चंद्र बताते हैं कि उनके पितामह भी इस युद्ध का हिस्सा रहे थे। उन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने पराक्रम और वीरता के लिए सम्मानित करते हुए दो मेडल दिए थे। ग्राम प्रधान रमेश भी चाहते हैं कि सरकार शहीद स्मारक को संरक्षित करने के लिए कदम उठाए, जिससे इसे अतिक्रमण मुक्त कराया जा सके और इसका विकास हो सके।

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अंग्रेजों ने की थी वादाखिलाफी
अविभाजित भारत की प्रथम विश्व युद्ध में भागीदारी के बारे में जानकारी देते हुए रोझौली निवासी रिटायर्ड शिक्षक रमेश चंद्र ने बताया कि भारतीय जवान इस युद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजों ने भारतीय लोगों से आजादी देने का वादा किया था। इस वादे के भरोसे में ही भारतीयों को रखते हुए शिक्षित-अशिक्षित, ट्रेंड अनट्रेंड सभी लोगों को अंग्रेजों द्वारा युद्ध में झोंक दिया गया। इस युद्ध को महाभारत में हुए नरसंहार की तरह देखा जाता है।

क्यों हुआ था प्रथम विश्व युद्ध ?
प्रथम विश्वयुद्ध क्यों शुरू हुआ इसकी भी पुख्ता जानकारी ग्रामीण नहीं दे पाते हैं। उनके पास इस युद्ध से जुड़ी कुछ यादों के रूप में बचा है तो सिर्फ बस्ती सिंह को मिले दो मेडल और शहीद स्मारक ही बचा है। इन मेडलों पर 'द ग्रेट वर्ल्ड वार फॉर सिविलाइजेशन' 1914-1919 अंकित है।

इतिहास को संजोने की मांग कर रहे हैं युवा
आगरा का चाहरवाटी को फौजियों की फैक्ट्री कहा जाता है। यूं कहें कि इस क्षेत्र में हर मां की कोख से एक राष्ट्र रक्षक का जन्म होता है। देश प्रेम की भावना यहां कूट-कूट कर भरी है। शिक्षित होने के बाद ज्यादातर युवा सेना में जाने की तैयारी करते हैं। बचपन से ही उनके दिलो-दिमाग पर राष्ट्र रक्षा राज करती है। रोझौली गांव के युवा चाहते हैं कि गांव से शहीद हुए जवानों की शहादत को स्मरण रखते हुए शहीद स्मारक का विकास कराया जाए। इससे जुड़ी हर जानकारी को स्मारक में पट्टिकाएं लगाकर प्रदर्शित किया जाए, जिससे आज के युवा को प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आजाद हिन्द फौज और अब तक के गांव के जवानों की शहादत को जानने का मौका मिले। राष्ट्र भावना से युवा ओत प्रोत रहें।

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ग्रामीणों के मन में है सवाल?
प्रथम विश्व युद्ध में रोझौली गांव के 31 जवानों ने हिस्सा लिया था और एक जवान शहीद हुआ था। यह जानकारी भी शहीद स्मारक में लगी पट्टिका से मिलती है, लेकिन 31 जवानों में कौन शहीद हुआ था इसकी पुख्ता जानकारी भी ग्रामीणों के पास नहीं है। सेवानिवृत्त शिक्षक रमेश चंद्र ने पूर्व सैनिक कल्याण बोर्ड से जानकारी जुटाने का प्रयास किया, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है।

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