विश्व डाक दिवस पर विशेष: डाकिए हुए डिजिटल, चिट्ठी ही नहीं पैसे लेकर भी पहुंचते हैं घर

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By: nagendra singh rathore

Updated: 08 Oct 2021, 09:02 PM IST

नगेन्द्र सिंह

अहमदाबाद. मोबाइल क्रांति, डिजिटल तकनीक के दौर में समय के साथ कदम मिलाते हुए डाकिए भी अब डिजिटल हो गए हैं। अब वे चिट्ठी ही नहीं पैसे लेकर भी लोगों के घर पहुंचते हैं। कोरोना काल में उनके जरिए लोगों को घर जाकर आधार सक्षम भुगतान सेवा प्रदान की गई जिसे काफी सराहा गया।
ऐसा इसलिए है क्योंकि डाकियों को मोबाइल और बायोमैट्रिक मशीनों से लैस किया गया है। ये नई सेवाएं डाकियों की कम हो रही लोकप्रियता को पुन:स्थापित करने में मददगार साबित हो रही हैं। डाकियों की आज भी पसंदीदा सवारी तो साइकिल ही है। हालांकि आज कई डाकिए दुपहिया वाहन पर सवार होकर चिट्ठी (डाक) वितरित करने जाते हैं। लेकिन वे भी मानते हैं कि साइकिल और डाकिया आज भी एक दूसरे की सबसे बड़ी पहचान हंै।

आज भी साइकिल से ही जाते हैं डाक देने
पोस्टमैन एच पी चौहान बताते हैं कि वे आज भी साइकिल से ही डाक देने जाते हैं। साइकिल और पोस्टमैन का बेहतर नाता है। साइकिल उनकी पसंदीदा सवारी है। शहरी क्षेत्र में बहुमंजिला इमारतों के बीच गलियों में आने-जाने में इससे आसानी होती है। चौहान भी मानते हैं कि समय के साथ डाकियों की लोकप्रियता थोड़ी कम हुई है लेकिन आज भी डाकियों की अहमियत और मान सम्मान तो लोग करते हैं। चौहान बताते हैं कि डाकियों की अहमियत ऐसी थी कि लोग डाकिए के उनके पहुंचने पर अपनी घड़ी का समय मिलाते थे।

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समय था चिट्ठी पढ़े बिना नहीं जाने देते थे लोग!
सालों तक पाटण जिले के ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले और अब अहमदाबाद शहर में सेवारत पोस्टमैन दशरथ प्रजापति बताते हैं कि आज से कई साल पहले पोस्टकार्ड की कीमत काफी कम थी। गांव के लोग कम पढ़े लिखे थे। मोबाइल सेवाएं ज्यादा उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में लोग अपनों को पोस्टकार्ड या अंतरदेशीय पत्र लिखकर भेजते थे। उस पोस्टकार्ड को लेकर जब किसी के घर पहुंचते थे तो लोग प्रेम से बिठाते थे। तब तक नहीं जाने देते थे, जब तक हम उसे पढकर नहीं सुना देते थे। कई बार पत्र में व्यक्त संवेदनाओं के साथ हमारी आंखों में आंसू भी आ जाते थे। वह आत्मीयता का लगाव ही लोगों को आज भी हमसे बेहतर तरीके से जोड़े हुए है। शहरों में भी आज भी कई ऐसे लोग हैं जो हमारा इंतजार करते हंै।

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ये सेवाएं देते हैं डाकिए

-घर पर जाकर लोगों का इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक का खाता खोलते हैं
-आधार से बैंक नंबर जुड़ा हो तो 10 हजार रुपए तक बिना चार्ज के घर पर पहुंचकर देते हैं
-घर पर बुजुर्गों को जीवन प्रमाण-पत्र देते हैं
-लाइफ इंश्योरेंस की पॉलिसी भी रिन्यू करते हैं
-आधारकार्ड में मोबाइल नंबर भी अपडेट कर देते हैं
-बिजली बिल, गैस बिल का भुगतान करते हैं

गांवों तक बैंकिंग सेवा पहुंचाने का जरिया बने डाकिए
डाकिए आज डाक पहुंचाने तक ही सीमिति नहीं हैं। उन्हें मोबाइल फोन, बायोमैट्रिक मशीनें देकर डिजिटल कर दिया है। इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) के जरिए डाकिए गांवों तक बैंकिंग सेवा पहुंचाने का जरिया बने हैं। बुजुर्गों को पेंशन पाने के लिए जीवन प्रमाण-पत्र देने के अलावा पेंशन की राशि भी घर पर ही निकालकर देते हैं, जिससे डाकियों की अहमियत बरकरार है। समय के साथ बदलाव किया जा रहा है। डाकसेवा को भी डिजिटल किया है, जिससे लोग उनकी डाक को खुद ट्रेक कर सकते हैं।

-अल्पेश शाह, वरिष्ठ डाकपाल, नवरंगपुरा डाकघर, अहमदाबाद

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