कोरोना की जंग में सिविल अस्पताल की ब्लड बैंक बनी जीवनडोर

अब तक 500 से ज्यादा मरीजों को थेराप्यूटिक प्लाज्मा देकर बचाई जिंदगी

By: Pushpendra Rajput

Updated: 09 Dec 2020, 08:16 PM IST

गांधीनगर. कोरोना महामारी (corona pandemic) के खिलाफ जंग में अहमदाबाद के सिविल अस्पताल (civil hospital) की ब्लड बैंक (blood bank) मरीजों (patient) के लिए जीवनदायिनी बनी है। अब तक 500 से ज्यादा मरीजों को थेराप्यूटिक प्लाजा फेरेसीस देकर जिन्दगी बचाई जा चुकी है। ब्लड बैंक के जरिए कोरोनाकाल में अब तक 58 हजार से ज्यादा मरीजों को रक्त पहुंचाया जा चुका है।

कोरोना महामारी में अहमदाबाद के सिविल अस्पताल के प्रत्येक विभाग की ओर से अहम भूमिका निभाई जा रही है। चाहे चिकित्सक हों, मेडिकल स्टाफ (medical staff) हो, विशेषज्ञ चिकित्सकों, सफाईकर्मी, टेक्नीशियन, कोरोना संक्रमित मरीजों (corona patient) की सेवा में 24 घंटे तैनात हैं। इस लड़ाई में अहमदाबाद सिविल अस्पताल का ब्लड बैंक (आईएचबीटी) की ओर से बेहतर कार्य किया जा रहा है। इस ब्लड बैंक के जरिए थैराप्यूटिक प्लाजा फेरेसिस की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। इसके जरिए कोरोना संक्रमित या सामान्य मरीज जिनकी स्थिति गंभीर होती है उन्हें बेहतर उपचार मुहैया कराने और स्वस्थ करने में अहम भूमिका निभा रही है।

कोरोनाकाल में सिविल अस्पताल के ब्लड बैंक की ओर से 505 थैराप्यूटिक प्लाजा फेरेसिस की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है, जिसमें 398 प्रक्रिया ब्लड बैंक विभाग में और 93 प्रक्रया आईसीयू जेकर 14 प्रक्रिया कोरोना संक्रमित मरीजों में की गईं। आमतौर पर थेराप्यूटिक प्लाजा फेरेसीस प्रक्रिया में करीब 10 हजार से ज्यादा रुपए खर्च होते हैं, जो सिविल अस्पताल में भर्ती मरीजों को नि: शुल्क उपलब्ध कराई जाती है।
अहमदाबाद सिविल अस्पताल के अधीक्षक डॉ. जे.पी. मोदी ने कहा कि सिविल अस्पताल का ब्लड बैंक कोरोना काल में बेहतर कार्य कर रहा है। कोरोनाकाल में ब्लड बैंक से 58 हजार से ज्यादा ऐसे मरीज जिन्हें रक्त की आवश्यकता थी उन मरीजों को रक्त उपलब्ध कराया गया। 1600 से ज्यादा कोरोना संक्रमितों को रक्त उपलब्ध कराया गया।

ऐसे होती है थेराप्युटिक प्लाज्मा फेरेसिस की प्रक्रिया

इस प्रक्रिया के जरिए मरीजों के रक्त की अशुद्धियों को दूर कर फिर से रक्त चढ़ाया जाता है। यह प्रक्रिया कई रोगों में की जाती है, लेकिन सिविल अस्पताल में मुख्यत: गुलियन बेर सिड्रोम (जीबीएस) रोग में यह प्रक्रिया होती है। इस रोग में मरीज पूर्णत: लकवाग्रस्त हो जाता है। कई मरीजों को सांस लेने में दिक्कत होती है लेकिन यह प्रक्रिया तीन से चार बार करने से बेहतर परिणाम मिलते है। मरीज खुद ही चलकर घर पहुंच सकता है। आईसीयू में भर्ती मरीज भी स्वस्थ होकर स्वस्थ हो सकता है।

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