ahmedabad : देश-विदेश के श्रद्धालु लेते हैं शक्तिपीठ मां कालिका का आशीर्वाद

नवरात्र विशेष : पावागढ़ पर

By: Rajesh Bhatnagar

Updated: 17 Oct 2020, 11:44 PM IST

फोटो -

- राकेश जैन
हालोल. गुजरात के पंचमहाल जिले की हालोल तहसील में पावागढ़ स्थित शक्तिपीठ मां कालिका (जगतजननी मां कालिका व मां महाकाली के नाम से भी प्रसिद्ध) मंदिर में शीश झुकाकर देश-विदेश के श्रद्धालु आशीर्वाद लेते हैं।
भारत में जैन समुदाय के प्रमुख यात्राधाम एवं पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध पावागढ़ रमणीय पर्वत के उच्चतम शिखर पर जगत जननी मां कालिका साक्षात शक्ति स्वरूप में विराजमान हैं। प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल मां कालिका के मंदिर तक पहुंचने के लिए वडोदरा, पंचमहाल के मुख्य नगर गोधरा एवं छोटा उदेपुर से बस, टैक्सी आदि साधनों से पावागढ़ पहुंचा जा सकता है।
औद्योगिक नगर हालोल से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर पावागढ़ है। पावागढ़ गांव से मांची तक राज्य परिवहन की बस एवं टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। 10 मिनट के समय में फिर वहां से उडऩ खटोला (रोप-वे) के जरिए मात्र 6 मिनट में मां कालिका के मंदिर के समीप सुविधा पूर्ण यात्रा कर पहुंचा जा सकता है। वहां से लगभग 20 मिनट के समय में पदयात्रा करके श्रद्धालु जगत जननी मां कालिका के दरबार में पहुंचते हैं।

सती के दाहिने पैर की अंगुली पावागढ़ पर गिरने के कारण बना शक्तिपीठ

पौराणिक मान्यताओं व कथाओं के अनुसार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ में अपने दामाद भगवान महादेव को निमंत्रण नहीं दिया। सती (पार्वती) को जानकारी मिलने पर भगवान महादेव की ओर से इनकार करने पर भी वह यज्ञ स्थल पर पहुंची। अपमान होने के कारण वह यज्ञकुंड में कूद गई। भगवान महादेव को पता लगने पर उन्होंने वहां पहुंचकर सती की देह को निकालकर कंधे पर रख तांडव शुरू किया। भगवान विष्णु ने सृष्टि के विनाश की आशंका के चलते सुदर्शन चक्र छोड़ा, जिससे सती के शरीर के टुकड़े व शरीर के अंगों पर धारण आभूषण गिरे और उन 51 स्थानों पर शक्तिपीठ का निर्माण हुआ। शक्तिपीठों में पावागढ़ भी मुख्य शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हुआ। महाशक्ति सरीखी सती के नश्वर शरीर की दाहिने पैर की अंगुली पावागढ़ पर गिरने के कारण प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की है।

ऋषि विश्वामित्र ने की थी स्थापना

पावागढ़ पर्वत पर मां कालिका को रामायण के प्राचीन युग में करीब 7 हजार वर्ष पूर्व पुराण काल में स्वयं ऋषि विश्वामित्र ने स्थापित किया था। भारतवर्ष के पश्चिम अंचल में स्थित शंकर वन क्षेत्र में स्थित पावागढ़ महदंशों में हिमालय सरीखी प्रकृति वाला होने के कारण उसे पर्वताधिराज हिमालय का चौथा पुत्र माना है। ऋषि विश्वामित्र ने पावागढ़ की भूमि पर लंबे समय तक उग्र तपस्या, आराधना कर ब्रह्म ऋषि का पद प्राप्त किया था। इस पद की सिद्धि प्राप्त करने के लिए मां कालका देवी के दिए हुए नवार्ण मंत्र अनुष्ठान से ऋषि विश्वामित्र को उच्चतम पद प्राप्त हुआ था। इसकी चिरस्थायी स्मृति के रूप में ऋषि विश्वामित्र ने पावागढ़ की सबसे ऊंची चोटी पर मां कालिका की स्थापना की थी।

प्राकृतिक ढ़ंग से पावागढ़ पहाड़ की रचना ऐसे विशिष्ट प्रकार की है कि कुछ निश्चित दिशाओं से निरीक्षण करने से इस पर्वत के अलौकिक स्वरूप की अनुभूति होने लगती है। विशेषतौर पर अधिक ऊंचाई से देखने पर नवार्ण मंत्र से संबंधित यंत्राकार में पावागढ़ पर्वत की प्रकृतिसृजित अलौकिक आकृति दिखाई देती है। पावागढ़ पर्वत की रचना बिंदु पंच त्रिकोण, अष्टदल वृत्ति और चतुराशत्रात्मक है और ऐसे पंच त्रिकोणात्मक घर के सबसे ऊंचे मध्य बिंदु पर मां कालिका विराजमान हैं।

दक्षिण मुखी कालिका के दैवी स्वरूप में साक्षात विराजमान

पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से पावागढ़ के इतिहास के लेखन में जुटे व हेरीटेज कमेटी के सदस्य इतिहासकार घनश्यामभाई जोशी के अनुसार पावागढ़ पर्वत की सबसे ऊंची जगह पर आद्यशक्ति के रूप में विराजमान मां कालिका के विभिन्न स्वरूपों में दक्षिण मुखी कालिका के दैवी स्वरूप में साक्षात विराजमान हैं। मां भगवती काली के विभिन्न 8 स्वरूपों में दक्षिण मुखी मां कालिका मुख्य हैं। मां कालिका के सभी स्वरूपों में दक्षिण मुखी कालिका का यह अलौकिक स्वरूप उपासकों में सर्वाधिक लोकप्रिय भी है।

इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण मंदिर बंद

पावागढ़ पर मां कालिका की पूजा- अर्चना, आराधना करने अथवा दर्शन करने प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्रि एवं शारदीय नवरात्र के दौरान लाखों श्रद्धालु भक्ति-भावपूर्वक आध्यात्मिक आनंद का लाभ उठाते हैं, लेकिन इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण मंदिर बंद है। हालांकि ऑनलाइन दर्शन की व्यवस्था की गई है।

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