scriptDynasty takes blow to Many Political parties in India | वंशवाद में बिखरे दल! | Patrika News

वंशवाद में बिखरे दल!

Dynasty, Many Political parties, India

अहमदाबाद

Published: June 24, 2022 10:42:48 pm

टिप्पणी


उदय पटेल


राजनीति में निष्ठा की उम्मीद बेमानी है। इन दिनों महाराष्ट्र में जो चल रहा है उससे यही बात ज्यादा मुफीद लगती है। उद्धव ठाकरे के भरोसमंद एकनाथ शिंदे ने बगावत कर जो हालात पैदा कर दिए हैं वो वंशवाद की राह चली रही पार्टियों के लिए सबक है। भले ही शिंदे सीधे उद्धव पर वार नहीं कर रहे हैं लेकिन उनके आजू बाजू-वाले आदित्य ठाकरे के बढ़ते हस्तक्षेप को बड़ी वजह मान रहे हैं। परिवार के इर्द-गिर्द केन्द्रित राजनीतिक दलों को ऐसे हालातों का सामना करना पड़ता है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी की शीर्ष भूमिका में रहने के चलते कांग्रेस के कई नेताओं ने कांग्रेस से किनारा कर लिया। समाजवादी पार्टी में अखिलेश को आगे करने के बाद चाचा शिवपाल ने अलग पार्टी बना ली। तमिलनाडु में डीएमके में दिवंगत करुणानिधि, एम के स्टालिन, झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन-हेमंत सोरेन, बंगाल में ममता बनर्जी व उनके भतीजे का वर्चस्व भी वंशवाद की तरफ इशारा करता है। ऐसे कई क्षेत्रीय दलों में दूसरे नेता उभर नहीं पाते। इसी झुंझलाहट के चलते वे बागी बन जाते हैं।
महाराष्ट्र की सियासत में हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। थोड़ा पीछे झांकें तो वर्ष 1995 के बाद से लगातार महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार रही है। वह चाहे भाजपा और शिवसेना की हो या फिर कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन। पहले जहां शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में थी वहीं, हालिया वर्षों में भाजपा इस भूमिका में है।
मराठी अस्मिता को केन्द्र में रखकर शिवसेना सुप्रीमो बालासाहेब ठाकरे की ओर से 56 वर्ष पूर्व स्थापित इस पार्टी को अब तक के सबसे बड़े संकट का सामना करना पड़ रहा है। मराठी अस्मिता के साथ-साथ शिवसेना ने हिन्दुत्व विचारधाारा को भी जोड़ लिया। हालांकि यह भाजपा के हिन्दुत्व के मुकाबले उतना प्रभावी नहीं रहा।
वर्ष 2019 में शिवसेना के अलग तरह के गठबंधन के बाद ही स्थिति लगातार डावांडोल ही लग ही रही थी। पार्टी में विद्रोह का कारण उद्धव ठाकरे के प्रशासनिक पकड़ के चक्कर में संगठन में उनका वह वर्चस्व नहीं रहना बताया जा सकता है जो कभी शिवसेना सुप्रीमो बालासाहेब ठाकरे के पास रहता था। कहते हैं कि उद्धव ठाकरे ने अन्य मंत्रियों और विधायकों के मुकाबले अपने पुत्र आदित्य ठाकरे को ज्यादा तवज्जो दी। वैसे भी शिवसेना में ठाकरे परिवार के अलावा अन्य किसी नेता का वर्चस्व नहीं रह सका। मतलब पार्टी में दूसरी पंक्ति के मजबूत नेता नहीं उभर सके।
छगन भुजबल, नारायण राणे, राज ठाकरे और अब एकनाथ शिंदे जैसे नेताओं ने शिवसेना से अलग अपनी राह बनाई। इससे पहले कभी मनोहर जोशी ने भी चुनौती दी थी। काफी स्वच्छ छवि के काबिल केन्द्रीय मंत्री रहे सुरेश प्रभु को भी पार्टी छोडऩी पड़ी। वर्ष 1990 में पार्टी के कद्दावर ओबीसी चेहरे व मुंबई के दो बार मेयर रह चुके छगन भुजबल ने बगावत की। 15 वर्ष बाद 2005 में नारायण राणे ने पार्टी में बगावत का बिगुल बचाया। अगले ही वर्ष उद्धव के चचेरे भाई राज ठाकरे ने भी पार्टी छोड़ दी। परिवार केन्द्रित राजनीतिक दलों के साथ अक्सर ऐसा ही होता रहा है। हालांकि राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है। इसमें निष्ठा जैसी कोई चीज नहीं रह गई है।
वंशवाद में बिखरे दल!
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