मिर्गी के 70 फीसदी मरीजों को दवाइयों से किया जा सकता है नियंत्रित

उचित उपचार से मिर्गी से पाई जा सकती है मुक्ति

एपिलेप्सी दिवस पर विशेष

By: Omprakash Sharma

Updated: 15 Nov 2020, 07:44 PM IST

अहमदाबाद. मिर्गी अर्थात एपिलेप्सी रोग का समय रहते उचित उपचार किया जाए तो उसे नियंत्रण में किया जा सकता है। जिससे मरीज सामान्य जीवन जी सकता है। हालांकि आज भी मिर्गी से पीडि़त लोगों मे से बहुत कम उपचार कराने पहुंचते हैं। देश में 1.3 करोड़ लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं। अहमदाबाद शहर के जाने माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधारी शाह का यह मत है।
डॉ. सुधीर शाह का कहना है कि विश्व में मिर्गी से हर 100 लोगों में से एक असरग्रस्त है। इस आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग 1.3 करोड़ लोगों को यह बीमारी है। इनमें से सिर्फ 2.7 लाख ही उपचार लेने पहुंचते हैं। इसका कारण उन्होंने रोग के प्रति गलत धारणा, गरीबी, सामाजिक कारण, रोग के बारे में जानकारी का अभाव और कहीं कहीं तो इसे कलंक तक मान लिया जाता है। जबकि इस रोग की सच्चाई अलग ही है। कुछ टेस्ट से इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है जिसमें ईईजी, एमआरआई आदि भी शामिल हैं।
उनका कहना है कि मरीजों में से लगभग 70 फीसदी को पहली बार बाल अवस्था से ही मिर्गी का दौरा शुरू हो जाता है। उचित उपचार के अभाव में इसका दौरा बार-बार आता रहता है। जिससे शारीरिक विकास भी अवरोधित होता है।

मिर्गी का मरीज जी सकता है सामान्य जीवन
डॉ. सुधीर शाह का मानना है कि मिर्गी के साथ जीवन जी रहे लोगों का यदि उचित उपचार कराया जाए तो सामान्य जीवन जीया जा सकता है। एपिलेप्सी मानसिक बीमारी नहीं है बल्कि न्यूरोलॉजिकल (दिमागी) बीमारी है। जिसका उपचार संभव है। लोगों को इस बीमारी के प्रति अपनी सोच बचलने की जरूरत है। 70 फीसदी मामलों में दवाइयों से ही इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि 15 फीसदी मामलों में मरीज को सर्जरी की जरूरत हो सकती है। एपिलेप्सी के उपचार के लिए आने वाले मरीजों में से 50 फीसदी तो ऐसे हैं जो चिकित्सकों की नियमित सलाह और दवाई लेकर दो से तीन वर्ष में रोग मुक्त भी हो जाते हैं।

तीन मिनट से अधिक समय तक दौरा रहने पर करें अस्पताल में भर्ती
डॉ. शाह ने बताया कि मरीज को मिर्गी का दौरान आने पर कुछ प्राथमिक उपाय किए जाने चाहिए। यदि दौरा तीन मिनट से अधिक चले तो मरीज को अस्पताल में भर्ती कि जाना चाहिए। दौरा पडऩे पर मरीज के पास ज्यादा भीड़ नहीं होने दें। साथ ही मरीज की हलनचलन नहीं रोकें। मरीज को स्वच्छ हवा आए ऐसी व्यवस्था की जाए। इसके लिए खिड़की दरवाजे खोले जाने चाहिए। कभी-कभी देखा जाता है कि लोग मिर्गी के दौरान मरीज को मोजे या जूते चप्पल सुंघाते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए।


मुख्य कारण
बच्चे के जन्म के समय दिमाग में किसी तरह की चोट लगना, ऑक्सीजन की कमी, दुर्घटना या फिर अन्य कारणों से सिर में गहरी चोट आना, सिर में ट्यूमर होना, दिमागी बुखार तथा दिमाग में रक्त का संचार ठीक तरह से न हो पाना आदि हैं। इन कारणों से कभी भी मरीज को मिर्गी का दौरा पड़ सकता है। ऐसे में व्यक्ति का शरीर पूरी तरह अकड़ जाता है। बेहोशी और कंपकपी भी आ सकती है।

मिर्गी की जागरूकता के लिए विशेष पुस्तक
डॉ. सुधीर शाह ने मिर्गी की जागरूकता के लिए एक पुस्तक भी तैयार की है। इस पुस्तक में मिर्गी को लेकर पनपी गलत धारणाओं और उचित उपचार के बारे में भी बताया गया है। हिन्दी एवं गुजराती भाषा में भी इसका अनुवाद किया गया है। पुस्तक में गलत मान्यताओं के बारे में भी बताया गया है। मिर्गी आने पर लोग गलत मान्यताओं का सहारा लेते हैं। गलत मान्यताओं में मरीज के हाथ में लोहे का टुकड़ा थमा देना, मोजे सुंघाने, मिर्गी को मानसिक और अनुवांशिक बीमारी मानना, एक बार मिर्गी का दौरा आने पर बार-बार होना आदि गलत धारणाएं हैं।

Omprakash Sharma Reporting
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