- भावना सोनी/राजेन्द्र धारीवाल
जामनगर/पालनपुर. गुजराती श्रावण मास के दौरान गुजरात के शिव मंदिरों में प्रति वर्ष उमडऩे वाले श्रद्धालुओं की संख्या इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण काफी कम है। शिव मंदिरों में दर्शन के समय में कमी, आरती में श्रद्धालुओं की उपस्थिति पर रोक के कारण मंदिरों में हर वर्ष की भांति इस वर्ष रौनक नहीं है।
जामनगर के हवाई चौक क्षेत्र में 300 वर्ष पुराने वैजनाथ महादेव मंदिर की स्थापना मोढवाणी जाति के बुजुर्गों ने की थी। मंदिर में वैजनाथ महादेव, हाडकेश्वर महादेव, भावेश्वर महादेव व नीलकंठ महादेव सहित चार शिवलिंगों की पूजा होती है। मंदिर में दर्शन के लिए प्रतिदिन श्रद्धालुओं का और श्रावण मास में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आवागमन होता था।
इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण मंदिर में दर्शन समय सवेरे मात्र 6 से 10 बजे तक का ही निर्धारित किया गया है। श्रावण मास में प्रत्येक सोमवार के दिन अलग-अलग श्रृंगार किए जाने हैं। श्रावण मास में मंदिर में पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। मंदिर में पीपल व बड़ के पेड़ भी हैं।
मंदिर के संचालन के लिए गठित ट्रस्ट में किरीट महेता, दीपक महेता, दीपक शेठ, जितु अडारिया के अलावा श्रावण मास में कुपेश आर. छापिया, विनु गांधी सेवा कर रह हैं। मंदिर में राजस्थान के नाथद्वारा से एक भक्त रामचंद्र दौलतराम पिछले 60 वर्षों से प्रतिवर्ष श्रावण मास में शिवजी की पूजा व आराधना के लिए आते रहे। उनसे पहले उनके पिता व दादा भी मंदिर में आते थे, यानी तीन पीढिय़ां इस मंदिर में आती रही हैं। इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण नहीं आ सके।
जामनगर शहर के पंचेश्वर टावर के समीप स्थित ऊँ कारेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना करीब 100 वर्ष पहले की गई। यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। यहां श्रावण मास के दौरान शिवलिंग का फूलों व सब्जियों आदि से श्रृृंगार किया जाता है और अखंड ज्योत भी जलाई जाती है। शाम को ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ महा आरती की जाती है। मंदिर के पुजारी महेश सुमनभाई रावल के अनुसार अन्य वर्षों में श्रावण मास के मुकाबले इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या मात्र 10 प्रतिशत ही है। मंदिर में एक साथ मात्र दो श्रद्धालुओं को ही प्रवेश दिया जा रहा है, मास्क व सोशल डिस्टेन्स के नियम का पालन भी किया जा रहा है। नियमों के पालन के साथ मंदिर में मात्र जलाभिषेक की छूट दी गई है। सवेरे 6.30 से दोपहर 12.30 व शाम 4.30 से रात 10 बजे तक दर्शन का समय निर्धारित किया है।
इसी प्रकार बनासकांठा जिले की पालनपुर तहसील में अरावली पर्वत श्रृंखला व प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बनास नदी के किनारे स्थित पौराणिक शिवालय बालाराम महादेव मंदिर भी भक्तों की आस्था का केन्द्र है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर स्वयंभू जलाभिषेक होता रहता है। मंदिर में गोमुख से स्वत: जलधारा प्रवाहित होती रहती है और शिवलिंग का जलाभिषेक निरंतर होता रहता है।
मान्यता व प्राचीन वार्ताओं के अनुसार प्राचीन समय में अकाल की स्थिति में पानी नहीं मिलने के कारण लोग सिंध की ओर पलायन करने लगे। उस समय एक व्यक्ति अपने परिवार के सदस्यों के साथ पानी की तलाश में इस क्षेत्र में पहुंचा। घने जंगल के बीच बच्चों को छोड़कर पानी की तलाश में भटकते हुए रास्ता भूल गया। प्यासे बच्चे भी पानी की तलाश में वन में भटकने लगा, तभी स्वयं भोलेनाथ ने बच्चे के रूप में पहुंचकर प्यासे बच्चों को पानी पिलाकर जीवनदान दिया। उसी दिन से क्षेत्र में स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ और पानी की धारा शिवलिंग को निरंतर स्पर्श कर बहने लगी। यह पानी आना आज भी एक रहस्य है। बाल स्वरूप में भोलेनाथ के आगमन के कारण स्थान का नाम बालाराम पड़ा। शिवलिंग पर निरंतर चौबीसों घंटे स्वयंभू जलाभिषेक होता है। श्रावण मास में और अवकाश के दिन दूर-दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन व अभिषेक करने आते थे।
यह भी मान्यता है कि ऐसे दंपती जिनके संतान नहीं होती, वे भी संतान की कामना लेकर मंदिर में भगवान शिवजी के बाल रूप के दर्शन करने के कारण संतान सुख प्राप्त करते हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान शिव के वाहन स्वरूप पोढिय़ा के कान में इच्छा प्रकट करने पर मनोकामना भी पूर्ण होती है। एक श्रद्धालु ने मंदिर में 255 किलो वजन का घंट अर्पित किया, उसकी आवाज से आस-पास का वातावरण मंत्रमुग्ध करने वाला होता है। प्रतिवर्ष श्रावण मास में श्रद्धालुओं से भरा रहने वाला बालाराम मंदिर भी इस वर्ष कोरोना महामारी के प्रतिबंधों से अछूता नहीं रहा और इस वर्ष श्रावण मास में यह मंदिर भी श्रद्धालुओं के बिना सूना है।

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