Ahmedabad News जमीन से निकलने वाले गर्म पानी से शहद प्रसंस्करण हुआ आसान

Geothermal water, honey processing, Ahmedabad dholera, PDPU, CEGE, research, innovation, hot water, farmer, Gujarat, rajasthan पीडीपीयू जियोथर्मल एनर्जी उत्कृष्टता केन्द्र (सीईजीई) के प्रोफेसर अनिरबिद सिरकार के मार्गदर्शन में कीर्ति यादव ने की शोध व इनोवेशन, गुजरात व राजस्थान के किसानों को हो सकता है फायदा

By: nagendra singh rathore

Published: 23 Dec 2019, 08:19 PM IST

नगेन्द्र सिंह

अहमदाबाद. धोलेरा में जमीन से निकलने वाला Geothermal water भूतापीय गर्म जल धोलेरा स्वामीनारायण मंदिर के सभागार को ठंडा रखने के साथ अब honey processing शहद प्रसंस्करण प्रक्रिया को भी आसान बना रहा है। जमीन से निकलने वाले गर्म पानी की मदद से शहद को उसके छत्ते से निकालने और फिर उसे शुद्ध करने में पंडित दीन दयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी (पीडीपीयू) के जियोथर्मल एनर्जी उत्कृष्टता केन्द्र (सीईजीई) के प्रोफेसर अनिरबिद सिरकार व उनकी शोधार्थी छात्रा कीर्ति यादव ने सफलता पाई है। जानकारी के अनुसार Rajasthan राजस्थान के जयपुर, अलवर, दौसा, भरतपुर जिलों के कुछ किसान भी इस शोध से लाभान्वित हो सकते हैं, क्योंकि राजस्थान के इन जिलों के किसान जमीन में नलकूपों से निकलने वाले गर्म पानी की समस्या से परेशान हैं। ऐसे में उनके लिए यह शोध व तकनीक समस्या को सुलझाने में मददगार हो सकती है।
जमीन से निकलने वाले गर्म जल से शहद को शुद्ध करने और उसका प्रसंस्करण करने के लिए अभी अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में तीन चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। पहले चरण में मधुमक्खी के छत्ते (मोम) से शहद को अलग पात्र में निकाला जाता है, दूसरे चरण में उस निकाले हुए शहद को अलग पात्र में गर्म करके शुद्ध किया जाता है और तीसरे चरण में उसका प्रसंस्करण किया जाता है।
इस नई शोध और इनोवेशन के तहत एक ऐसा नया समावेशी उपकरण डिजाइन किया गया है, जिसमें शहद को मधुमक्खी के छत्ते से निकालने की जरूरत नहीं होती है। जमीन से निकलने वाले गर्म पानी उसमें सप्लाय किया जाता है। उपकरण में अंदरूनी और बाहरी दो वैसल हैं। अंदरूनी वैसल में एक ऐसा फ्रेम बना गया है, जिसमें एक साथ कई छत्तों को फिट किया जा सकता है। फिर उसे उससे बड़े आकार के बाहरी वैसल के अंदर डाल दिया जाता है। बाहरी वैसल में जमीन से निकलने वाले ४५ डिग्री सेल्सियस तक के गर्म पानी को डालते हैं। फिर उसे २४ घंटे के लिए छोड़ देते हैं। इतने तापमान और समय में अंदरूनी वैसल के फ्रेम में लगे मधुमक्खी के छत्ते गर्म पानी के तापमान और भाप से पिघल जाते हैं और शहद नीचे उस वैसल के निचले हिस्से में इकट्ठा हो जाता है। उसके बाद गर्म पानी को निकालकर फिर ८० डिग्री सेल्सियस तापमान वाला जमीन से निकला गर्म पानी बाहरी वैसल में डालते हैं और फिर 12 घंटे छोड़ते हैं। ताकि शहद को प्रोसेस किया जा सके। इतने तापमान में अंदरूनी वैसल के शहद में रहने वाले यीस्ट और एंजाइम तथा मोम भी पूरी तरह से पिघल जाता है। फिर उसे नीचे लगे चलनी से छानकर पैक कर लेते हैं। इसमें मिलने वाला शहद पूरी तरह से शुद्ध होता है।
शोधार्थी कीर्ति यादव बताती हैं कि जियोथर्मल हॉट वाटर से शहद प्रसंस्करण की यह शोध न सिर्फ प्रक्रिया को आसान बनाती है बल्कि किफायती भी बनाती है, क्योंकि शहद को शुद्ध करने के लिए जरूरी पानी को गर्म करने की जरूरत नहीं होती। जमीन से ही गर्म पानी निकलता है।

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धोलेरा के मधुमक्खी पालन करने वालों लिए खुला विकल्प
पीडीपीयू सीईजीई के अध्यक्ष प्रो. अनिरबिद सिरकार बताते हैं कि इस शोध और इनोवेशन से जमीन से निकलने वाले गर्म जल से शहद को शुद्ध रूप से प्राप्त करने का भी विकल्प खुला है। जिसका गुजरात के धोलेरा इलाके व देश के अन्य ऐसे इलाकों के किसान लाभ उठा सकते हैं, जहां जमीन से गर्म पानी निकलता है। अहमदाबाद जिले के धोलेरा के स्वामीनारायण मंदिर के पास कुए से निकलनेवाले गर्म पानी का उपयोग मंदिर के सभागार को ठंडा करने में होता है, उसी प्रक्रिया के बचे गर्म पानी की मदद से शहद शुद्धिकरण किया, जिसमें सफलता हाथ लगी है।

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