नोटबंदी को असवैधानिक बताने वाली याचिका पर HC ने केंद्र, RBI से मांगा जवाब

हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की अगली तिथि पांच दिसंबर तय की

By: जमील खान

Published: 29 Nov 2016, 11:57 PM IST

अहमदाबाद। विमुद्रीकरण को असंवैधानिक बताते हुए इसे चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान गुजरात हाई कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) से इस मामले में उनके लिखित जवाब दाखिल करने को कहा। हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की अगली तिथि पांच दिसंबर तय की। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति वी एम पंचोली की खंडपीठ ने भावनगर जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष नानुभाई वाघाणी की ओर से गत 25 नवंबर को दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान आज कोर्ट में केंद्र की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सालिसिटर जनरल (अतिरिक्त महान्यायवादी) तथा रिजर्व बैंक के अधिवक्ता से इस मामले में उनके जवाब दायर करने को कहा।

उधर याची के वकील का कहना था कि गत आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 500 और 1000 रुपए के नोटों को प्रतिबंधित करने का निर्णय और इसका तरीका कानून सम्मत नहीं है। उन्होंने कहा कि आरबीआई अधिनियम की धारा 26(2) सरकार को इस तरह से किसी मुद्रा को अचानक प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं देती। सरकार के पास विमुद्रीकरण के मामले मे केवल सीमित अधिकार हैं और उसके लिए भी इसे रिजर्व बैंकके निदेशक मंडल की पूर्व अनुमति लेनी जरूरी होती है।

ज्ञातव्य है कि रिजर्व बैंक ने जिला सहकारी बैंकों पर भी विमुद्रीकरण के बाद लेन देने के मामले में कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। याची के वकील ने कहा कि करेंसी नोट एक वैद्यानिक वस्तु है जिस पर यह संप्रभु वचन होता है कि इसके बदले में इसके बराबर धन को लौटाया जाएगा। इसे अवैध ठहराए जाने के बाद सरकार लोगों पर बैंकों से इसके बराबर धन
निकालने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती और यह नहीं कह सकती कि ऐसा तीन माह बाद किया जाएगा।

उन्होंने जिला सहकारी बैंकों पर नये नोटों के वितरण और पुराने प्रतिबंधित नोटों को स्वीकारने पर रोक लगाने के रिजर्व बैंक के फैसले पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब सरकार ने अन्य सभी राष्ट्रीयकृत, निजी और नगरीय सहकारी बैंकों को ऐसा करने से नहीं रोका है तो केवल जिला सहकारी बैकों के साथ भेदभावपूर्ण बर्ताव क्यों किया गया है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के मौलिक अधिकार के विरुद्ध है। उन्होंने इन नोटों को कई मामलों में छूट दिए जाने के सरकारी निर्णय पर भी सवाल खडे करते हुए कहा कि एक ही देश में एक ही समय में एक ही तरह के नोटों को कही प्रतिबंधित करना तथा कही प्रचलन में रखना भी कानूनी दृष्टि से पूरी तरह गलत है।
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