'आनंद भरी जिंदगी जीएं, अवसाद भरी नहीं'

मुंबई में चातुर्मास कर जोधपुर जाते समय राष्ट्रसंत ललितप्रभ ने पालनपुर के समीप जगाणा में कहा

By: Rajesh Bhatnagar

Published: 19 Jan 2019, 11:33 PM IST

पालनपुर. राष्ट्रसंत ललितप्रभ ने कहा कि चिंता, तनाव और अवसाद भरी सौ साल की जिंदगी जीने की बजाय आनंद भरी दस साल की जिंदगी जीना अति उत्तम है। उन्होंने कहा कि आनंद भरी जिंदगी जीएं, अवसाद भरी नहीं।
वे मुंबई में चातुर्मास पूरा कर सूरत, अहमदाबाद होते हुए जोधपुर जाते समय बनासकांठा जिले में अहमदाबाद-पालनपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर जगाणा गांव के समीप भाग्यभूमि पारसनाथ जैन तीर्थ परिसर में श्रद्धालुओं को शनिवार सवेरे संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही।
राष्ट्रसंत ललितप्रभ व राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ के अलावा दर्शन शास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त मुनि डॉ. शांतिप्रिय सागर का जैन तीर्थ परिसर में पहुंचने पर श्रद्धालुओं ने स्वागत किया। राष्ट्रसंत ललितप्रभ ने कहा कि रोज-रोज न तो मिठाइयां खाई जा सकती है और न ही खिलाई जा सकती है लेकिन जीवन को तो हमेशा के लिए अवश्य मीठा बनाया जा सकता है, यह तो व्यक्ति पर निर्भर है कि वह खटास भरी जिंदगी जीए या मिठास भरी।
उन्होंने कहा कि अगर हम बुरे वक्त को याद करते रहेंगे तो दुखी हो जाएंगे और वक्त का सदुपयोग करना शुरू कर देंगे तो सुखी हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि भगवान रोज धरती से एक लाख लोगों को ऊपर उठाता है पर उसमें हमारा नंबर नहीं लगाता, वह सबको भूखा उठाता है पर किसी को भूखा सुलाता नहीं है और हमें हमारे भाग्य से ज्यादा देता है इसलिए सुबह उठकर उससे शिकायत या याचना करने की बजाय उसे साधुवाद और धन्यवाद दीजिए।


हमारी बातें इसी जन्म में स्वर्ग पैदा करने की
उन्होंने कहा कि हममें और दूसरे संतों में ज्यादा फर्क नहीं है। सभी संत स्वर्ग का रास्ता दिखाते हैं, पर दूसरे संत अगले जन्म में स्वर्ग पाने की बात कहते हैं और हम इसी जन्म को स्वर्ग बनाते हैं। हमारी बातें न तो आसमान में बने स्वर्ग को पाने की है, ना ही पाताल में बने नरक से बचने की है बल्कि इसी जीवन में स्वर्ग को पैदा करने की है।


बदहाल की बजाय खुशहाल बनकर जीएं
उन्होंने कहा कि जीवन परमात्मा की ओर से मिला हुआ हमें बेशकीमती उपहार है, हम इसे विषाद नहीं प्रसाद बनाएं। पूनम का चांद उगने वाले आसमान में भी अमावस्या की कालिमा आ जाती है अर्थात् विपरीत परिस्थितियां सबके जीवन में आती है इसलिए व्यक्ति हर परिस्थिति को प्रभु का प्रसाद मानें और बदहाल बनकर जीने की बजाय खुशहाल बनकर जीएं।

Rajesh Bhatnagar
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