स्वनियंत्रण के साथ हो मीडिया को पूरी आजादी : जस्टिस ललित

स्वनियंत्रण के साथ हो मीडिया को पूरी आजादी : जस्टिस ललित

Uday Kumar Patel | Publish: Sep, 08 2018 10:03:09 PM (IST) Ahmedabad, Gujarat, India


-जजों को भी अपने फैसले को लेकर आलोचना स्वीकारने को तैयार चाहिए

 

अहमदाबाद. सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उदय उमेश ललित ने कहा कि मीडिया को पूरी आजादी मिलनी चाहिए हालांकि कुछ मामलों में मीडिया को स्वनियंत्रण व नियमन की जरूरत है।
शहर के गुजरात लॉ सोसाइटी सभागार में शनिवार को प्रलीन पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित जस्टिस पी. डी. देसाई स्मारक व्याख्यानमाला के तहत उन्होंने अपनी यह राय दी। मामले की जांच के आरंभिक चरण और मुकदमे (ट्रायल) के दौरान मीडिया की रिपोर्टिंग मुकदमे की निष्पक्षता पर प्रभाव डालती है?-विषय पर अपनी राय व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि हमें मीडिया की भूमिका को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि मीडिया समाज के प्रति जिम्मेदार है।
उन्होंने यह भी कहा कि जजों को भी फैसले को लेकर आलोचना स्वीकारने के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने जजों से अपील की कि क्या हम उतने मजबूत नहीं हैं कि हम फैसले को लेकर अपनी आलोचना सह सकें, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि फैसले को लेकर जज पर टिप्पणी उचित नहीं है।
बार से सुप्रीम कोर्ट के जज बनने वाले जस्टिस ललित ने कहा कि जजों के फैसले को लेकर किसी भी राय को अदालत की अवमानना नहीं माना जा सकता। किसी फैसले को लेकर यदि लोगों और समाज के बीच चर्चा होती है तो उसे न्याय में हस्तक्षेप नहीं माना जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम मीडिया को चौथे स्तंभ मानते हैं तो मीडिया को काफी मजबूत, निडर होना चाहिए। मीडिया को समाज के रचनात्मक तथा समाज का लगातार रक्षक की भूमिका वाला होना चाहिए। इसके मीडिया के इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग का हवाला देते हुए पत्रकार अरुण शौरी के लिखे हुए लेखों को लेकर एक मुख्यमंत्री को इस्तीफा देने तथा तहलका टेप को लेकर रक्षा सौदा मामले को उजागर किए जाने की बात कही। मीडिया को मजबूत बताते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है और यह समाज को एक दिशा देने वाला हो सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत में किसी भी मामले में जांच के दौरान मीडिया रिपोर्टिग को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं है हालांकि इसे गवाहों या पीडि़तों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। बच्चों से दुष्कर्म जैसे मामलों में किसी पीडि़त या पीडि़ता की पहचान सार्वजनिक करना सही नहीं है। इसमें मीडिया के स्व नियंत्रण व नियमन की जरूरत होती है। साथ ही गवाहों को असुरक्षित बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और गवाहों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। गवाहों पर यदि दवाब डाला गया तो मामले पर असर पड़ सकता है। जांच के बाद ट्रायल के दौरान रिपोर्टिंग में मीडिया को स्व नियंत्रण रखना चाहिए। इसके लिए प्रेस काउंंसिल ऑफ इंडिया ने भी कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की धारा 19(1) ए के तहत प्रेस को आजादी है। जांच को लेकर पुलिस की लाइन को भी सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। इस तरह जांच में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

अदालत की अवमानना अधिनियम में हुआ संशोधन


उन्होंने जांच और मुकदमे के दौरान अदालत की अवमानना को उन्होंने दो भागों-1971 से पहले और 1971 के बाद- में देखने को कहा। अदालत की अवमानना अधिनियम, 1958 के तहत किसी भी मामले की जांच शुरु होने के बाद से मीडिया के खिलाफ अवमानना का मामला बनता है। इसके लिए उन्होंने 1961 के साहिवाल व 1969 के गोपालन से जुड़े आपराधिक मामले और 1970 के पश्चिम बंगाल से जुडे एक सिविल मामले का हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि इसके बाद वर्ष 1971 में इस अधिनियम को संशोधित किया गया। इसके तहत आरोपपत्र पेश किए जाने तक जांच को लेकर मीडिया मामला प्रकाशित कर सकता है। इस तरह संसद का 1958 के अधिनियम को संशोधित कर 1971 मे संसोधित किया गया।
उधर भारतीय विधि आयोग (लॉ कमिशन) की 200वीं रिपोर्ट की सिफारिश में यह कहा गया कि लंबित मामला किसी भी प्रकरण में आरोपपत्र की बजाय गिरफ्तारी से माना जाना चाहिए, लेकिन अब जबकि इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए हमें अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के आधार पर चलना होगा।

अमरीका में प्रेस पर कोई प्रतिबंध नहीं

उन्होंने कहा कि अमरीका में अदालतों व मामलों की जांच को लेकर प्रेस पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं है। मीडिया रिपोर्टिंग में किसी तरह का प्रतिबंध नहंीं है। हालांकि वहां पर फिर से ट्रायल या फिर मामले के ट्रांसफर का प्रावधान है। वहीं इंग्लैण्ड की अदालतों में मीडिया रिपोर्टिग पर कुछ हद तक प्रतिबंध का प्रावधान है। कनाडा में भी कुछ हद तक मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में देखा जाए तो पता चलेगा कि सभी मुकदमे को आम लोगों के लिए सार्वजनिक होना चाहिए। मदरी कन्वेंशन में भी यह कहा गया कि प्रेस की स्वतंत्रता काफी अहम है।
इस अवसर पर गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी, ओडिशा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के. एस. झवेरी, गुजरात उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश अनंत एस. दवे, अन्य न्यायाधीशगण, सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज सी. के. ठक्कर, महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी, प्रलीन पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष सुरेश एन. शेलत, ट्रस्ट के सदस्यगण भास्कर तन्ना व निरूपम नानावटी, अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रकाश के. जानी, लोक अभियोजक मनीषा लव कुमार, वरिष्ठ अधिवक्ता, वैभवी नानावटी, हृदय बुच, मितुल शेलत, दीपेन देसाई, छोटू भाई गोगदा व अन्य उपस्थित थे।

Ad Block is Banned