ना प्रचार, ना खर्च, फिर भी चुनते हैं लोग

Mukesh Sharma

Publish: Dec, 07 2017 09:58:39 (IST)

Ahmedabad, Gujarat, India
ना प्रचार, ना खर्च, फिर भी चुनते हैं लोग

जहां चुनाव प्रचार में जीत के लिए प्रत्याशी हर तरीके के हथकंडे अपनाते हैं। शोर-शराबा, चकाचौंध और रैली-जूलूस के साथ लाखों खर्च करते हैं, लेकिन जूनागढ़

अहमदाबाद/जूनागढ़।जहां चुनाव प्रचार में जीत के लिए प्रत्याशी हर तरीके के हथकंडे अपनाते हैं। शोर-शराबा, चकाचौंध और रैली-जूलूस के साथ लाखों खर्च करते हैं, लेकिन जूनागढ़ से छह बार विधायक रह चुके और सातवीं बार फिर से चुनाव मैदान में उतरे महेन्द्र मशरू ऐसे प्रत्याशी हैं, जिन्हें प्रचार के लिए किसी खास खर्च की जरूरत नहीं है, ना ही किसी हथकंडे क ी। वे अधिकांश अकेले ही पैदल घूमकर लोगों से मिलते हैं। उनकी सादगी के कारण लोग खुद ही इतना प्रेम करते हंै कि जिता देते हैं।

निर्दलीय ही सबकी जमानत जप्त करवाई थी :

मशरू वर्ष १९९० से चुनाव लड़ रहे। १९९५ में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ते हुए उन्होंने भाजपा ही नहीं बल्कि कांग्रेस समेत अन्य सभी प्रत्याशियों को इतने भारी अंतर से हराया कि सभी की जमानत जप्त हो गई थी। ऐसा शायद पहली बार हुआ था। बाद में भाजपा ने मशरू को अपने साथ ले लिया और वर्ष १९९८ से लेकर २०१२ तक सभी चुनाव उन्होंने भाजपा के बैनर तले जीते।

ना सैलरी, ना गाड़ी, बस! बस में सफर..

उनकी सादगी को देख हर कोई दंग रह जाता है। ये ऐसे विधायक हैं जो न तो सैलरी लेते हैं और ना ही पेंशन लेंगे। ना ही उन्होंने विधायक को दिया जाने वाला गांधीनगर में प्लॉट स्वीकार किया। खुद का वाहन भी नहीं, गांधीनगर में विधायक निवास से विधानसभा तक राज्य सरकार विधायकों को लाने-ले जाने के लिए जो बस चलाती है, उसी में मशरू सफर करते हैं। विधानसभा सत्र पूरा होने के बाद गांधीनगर से बस में ही बैठकर वे जूनागढ़ चले जाते हैं।

अब सवाल उठता है कि जब वे सैलरी नहीं लेते तो क्या काम-धंधा करते हैं? बता दें कि उन्होंने तीन दशक बैंक में नौकरी की, जो भी फंड और ग्रेच्युटी मिली, वही उनके लिए पर्याप्त है। सादगी पसंद मशरू ने शादी भी नहीं की है। वे एक कमरे में ही मशरूफ रहते हैं। उन्होंने जनसेवा भी इस कदर कि कोई भी उनके पास समस्या लेकर पहुंच जाए वे उसी के साथ हो लिए होते हैं।

थैला उठाकर जुट जाते हैं सफाई में :

हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा तक जूनागढ़ में गिरनार पहाड़ी की परिक्रमा होती है। उस वक्त लोग रास्ते में पानी की बोतल, प्लास्टिक और कूड़ा-करकट फेंक देते हैं। मशरू हाथों में थैला लेकर परिक्रमा मार्ग से कचरा बीनते हैंैं। उनके चेहरे पर कोई झिझक नहीं दिखाई देती कि वे एक विधायक हैं।

‘मां ने कहा था कि सरकारी सुविधा नहीं लेना’

उन्होंने पत्रिका को बताया कि जब पहली बार चुनाव जीतकर आया तब मां ने कहा कि यदि जनता की सेवा करना है तो कोई सरकारी सुविधा नहीं लेना है। बस, मां के वे शब्द अभी भी याद हैं। उनका यह भी मानना था कि यदि शादी की तो जनसेवा से भटकाव आ जाएगा।

पुष्पेंद्र सिंह/ हरेश दवे

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