कोरोना काल में ३० हजार से अधिक मजदूर बेरोजगार

-संघ प्रदेश दादरा नगर हवेली में लॉकडाउन के बाद बंद हुई फैक्ट्रियों में कामकाज पूर्णरूप से अब तक आरम्भ नहीं हुआ, उद्योगों में कर्मचारियों की छंटनी जारी

 

By: Gyan Prakash Sharma

Updated: 03 Jan 2021, 06:53 PM IST

सिलवासा. संघ प्रदेश दादरा नगर हवेली में लॉकडाउन के बाद बंद हुई फैक्ट्रियों में कामकाज पूर्णरूप से अब तक आरम्भ नहीं हुआ है। विदेशी आयात-निर्यात प्रभावित रहने से औद्योगिक इकाइयों के बुरे दिन समाप्त नहीं हुए हैं, जिसका परिणाम उनमें काम करने वाले मजदूर व कर्मचारियों को भी भुगतना पड़ रहा है। उद्योगों में कर्मचारियों की छंटनी जारी है। कोरोनाकाल में जिले के उद्योगों से 30 हजार से अधिक मजदूर बेरोजगार हुए हैं।


लॉकडाउन के दौरान उद्योगों में काम करने वाले मजदूर जो अप्रैल-मई में घर गए थे, वे दीपावली व छठ पूजा के बाद वापस लौट रहे हैं। हालातों के चलते उनमें नसीब वालों को ही नौकरी मिल रही है। श्रम प्रवर्तन विभाग की मानें तो अब ज्यादातर केस उद्योगों में मजदूरों को नौकरी नहीं मिलने के आ रहे हैं। उद्योगपति यह कहकर मजदूरों को नौकरी पर रखने से इंकार कर रहे हैं कि वे समय पर (जुलाई-अगस्त में) काम पर क्यो नहीं लौटे? बिहार छपरा निवासी श्याम बहादुर ने बताया कि मसाट स्थित उनकी कंपनी जुलाई में शुरू तो हो गई, मगर घर से वापस आने को कोई साधन नहीं मिला। अब कंपनी उसे नौकरी पर रखने से इंकार कर दिया है, मजबूरन, बहुत कम मेहनताने पर लेबर कॉट्रेक्टर के पास काम करना पड़ रहा हैं।


श्रम कॉंट्रेक्टरों का बढ़ा जाल


कोरोना संक्रमण के बाद औद्योगिक इकाइयों में श्रम ठेकेदारों का जाल सा बुन गया है। लॉकडाउन के बाद धीरे-धीरे उद्योग संचालित हो रहे हैं, जिससे इनमें काम करने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ी है। कोरोना संक्रमण के बाद उद्योगपति मजदूरों को कॉट्रेक्टर के मार्फत रखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जिससे बहुत से मजदूरों की नौकरी समाप्त हो गई हैं। उद्योगपतियों ने इकाइयों में उत्पादन, मशीनरी संचालन, पैंकिंग आदि काम अलग-अलग ठेके निर्धारित कर दिए हंै। इसका फायदा उठाकर ठेकेदार मजदूरों से 8 घंटे की बजाए 10 से 12 घंटे काम करा रहे हैं एवं न्यूनतम मजदूरी भी नहीं देते हैं। लॉकडाउन के बाद क्षेत्र में तीन हजार से ज्यादा इकाइयों में मशीनें चालू हो गई हैं, जिसमें एक हजार से अधिक कॉट्रेक्टर लेबर सप्लाय में लगे हैं। अधिकांश कॉट्रेक्टर के पास श्रम प्रर्वतन विभाग से प्रदत्त लाइसेंस नहीं हैं। यह कॉट्रेक्टर मजदूरों को परिचय पत्र, आवास, सुरक्षा आदि भी नहीं करते है। दादरा विस्तार की इकाईयों में सौ से अधिक कॉट्रेक्टर लेबर सप्लाय कर रहे हैं। यहां के एक श्रमिक ने बताया कि उद्योगपति मजदूरों का वेतन कॉटे्रक्टर के खाते में क्रेडिट कर देती हैं, मगर कॉट्रेक्टर मजदूरों को पगार रजिस्टर में बिना वेतन खाली कॉलम में हस्ताक्षर करा लेते हैं।

वेतन देने के बाद रजिस्टर में न्यूनतम वेतन के हिसाब से माह का वेतन लिख दिया जाता है। मजदूर अशिक्षित होने से कॉटे्रक्टर के कहने पर काम करते हैं। श्रम प्रवर्तन कार्यालय में आए दिन मजदूरों की यह समस्या आम हैं। बहरहाल विभाग में करीब 600 से अधिक लेबर कॉट्रेक्टर पंजीकृत हैं। यह ठेकेदार 10 से 20 मजदूरों का पंजीयन कराकर लाइसेंस प्राप्त कर लेते हैं, बाद में मजदूरों का जमकर शोषण करते हैं। हैरत की बात यह है कि तीन हजार इकाइयों में दो लाख से अधिक मजदूर कार्य करने के बाद श्रम प्रवर्तन विभाग सिर्फ तीन स्टॉफ के सहारे चलता है। विभाग में निरीक्षकों की कमी है।

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