Webinar: 'निष्पक्ष सुनवाई के लिए प्रमाणिकता जरूरी'

Webinar, GNLU, univeristy, judge, advocates, law reforms, consultation: जीएनएलयू में 'वच्र्युल कंसल्टेशन ऑन क्रिमिनल लॉ रिफॉम्र्स' वेबिनार

By: Pushpendra Rajput

Published: 27 Jul 2020, 10:20 PM IST

गांधीनगर. निष्पक्ष सुनवाई के लिए जांच अधिकारी, सरकारी वकील ) और न्यायाधीश (judge) का प्रमाणिक होना जरूरी है। अफसोस हैं कि कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़कर हमारे देश में सरकारी वकीलों मानकों में पूरा नहीं कर रहे हैं। सामान्यत: देखा जा रहा है सरकारी वकीलों की नियुक्तियां राजनीतिक हो रही हैं। हालांकि सरकारी वकीलों की नियुक्तियों से पहले सभी राज्यों को उच्च न्यायालय और जिला अदालतों से सुझाव लेने का प्रावधान है। कर्नाटक के पूर्व एडवोकेट जनरल और वरिष्ठ वकील बी.वी. आचार्य ने सोमवार को गांधीनगर स्थित गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (जीएनएलयू) में 'वच्र्युल कंसल्टेशन ओन क्रिमिनल लॉ रिफोम्र्सÓ पर आयोजित वेबीनार में संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि सरकारी वकीलों की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए उच्च न्यायालय की निगरानी मेंं उचित और पारदर्शी प्रक्रिया से सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए कानून बनाना चाहिए।
आचार्य ने कहा कि अपराध संहिता की धारा (सीआरपीसी) के अनुच्छेद 239 के तहत मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि यदि आरोपी के खिलाफ कोई भी ठोस साक्ष्य नहीं है तो बगैर ही सुनवाई के आरोपी को आरोपमुक्त किया जा सकता है। हालांकि अदालतों में बगैर सुनवाई के ऐसे आदेश जारी नहीं किए जाते। अदालतों को उचित मामलों में इस अधिकार का उपयोग करना चाहिए।
इस मौके पर वरिष्ठ वकील शेखर नफाडे ने कहा कि जमानत से संबंधित कानूनों काफी जटिलता हैं। हालांकि यह कहना भी गलत नहीं है कि ऐसा कोई कानून नहीं है। जमानत याचिकाओं के साथ समझौता करने के कोई स्पष्ट कानून भी नहीं हैं। ऐसे में अस्थायी तौर पर न्यायाधीश अपने विवेक का उपयोग करते हैं। इसके चलते ही हम देखते हैं कि गंभीर मामलों में जमानत हो जाती है। जबकि छोटे-छोटे मामलों में लंबे समय तक आरोपी जेल में रहते हैं। इस दौरान एडवोकेट ऑन रिकार्ड, सुप्रीम कोर्ट जोसेफ एरिस्टोटल ने भी कानून में सुधार पर जोर दिया।
इससे पूर्व जीएनएलयू के निदेशक डॉ. शांताकुमार ने स्वागत भाषण में कहा कि आपराधिक कानून मुख्यतौर पर औपनिवेशिक युग (कोलोनिकल एरा) के कानून बना है। हालांकि समय-समय पर कानून में बदलाव होते रहैं, लेकिन ये बदलाव सामाजिक-आर्थिक और तकनीकी बदलाव के साथ बराबरी नहीं कर पाए। सहायक प्रोफेसर डॉ. सैरा गोरी ने आभार जताया।

Pushpendra Rajput Reporting
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