अजमेर डिस्कॉम का दिव्यांग कर्मचारी बना साहस की मिसाल

शरीर से अशक्तहोने के बावजूद राजस्व रिकवरी में जुटा है मुकेश

2008 में साथी को बचाते हुए हादसे का शिकार हुआ था

अजमेर डिस्कॉम

By: Bhupendra malviya

Published: 06 Mar 2021, 10:05 PM IST

अजमेर. कहते हैं जब जीतने का जज्बा हो तो कोई मुश्किल हौसलों को हरा नहीं पाती। ऐसी ही कहानी है अजमेर डिस्कॉम के टेक्नीकल हेल्पर मुकेश भूरिया की। मुकेश एक हादसे में गंभीर रूप से घायल होकर अक्षम हो गया है। इसके बावजूद उसने हार नहीं मानी। वह डिस्कॉम के राजस्व रिकवरी अभियान में पूरी जी जान से काम कर रहा है। मुकेश भूरिया अजमेर डिस्कॉम में टेक्निकल हेल्पर के पद पर कार्यरत है। साल 2008 में भीलवाड़ा के करेड़ा सब डिवीजन में नियुक्ति दौरान ड्यूटी पर हुए एक गंभीर हादसे में मुकेश ने अपने सहयोगी कर्मचारी की जान बचाते हुए खुद को गंभीर रूप से घायल कर लिया था। रीढ़ की हड्डी टूटने के कारण वह पिछले 13 सालों से बिस्तर पर है। इस दौरान अजमेर डिस्कॉम द्वारा उसे अजमेर ट्रांसफ र कर दिया गया और नियमित रूप से सैलरी का भुगतान भी मिलता रहा।कमर के नीचे का हिस्सा है सुन्नमुकेश के कमर से नीचे का हिस्सा पूरी तरह से सुन्न है। सालों से बिस्तर पर रहने के कारण वह बेड सोल का भी शिकार हो गया। परिजन उसे गोद में लेकर कार्यालय आते थे लेकिन मुकेश ने हिम्मत नही हारी और अपनी कमजोरी को दिमाग पर हावी नही होने दिया। अपनी सैलरी को जस्टिफ ाई करने के लिए उन्होंने एक सोलर बाइक तैयार करवाई और मदार स्थित डिस्कॉम कार्यालय पहुंच 13 साल बाद अपनी जॉइनिंग दी। मुकेश अब डिस्कॉम के राजस्व वसूली अभियान में जुट गया है। उसका कहना है कि जब डिस्कॉम उनके लिए इतना कुछ कर रहा है तो यह उसका कर्तव्य है कि वह भी डिस्कॉम के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाए।बहुत कुछ झेला है मुकेश नेमुकेश के साथ जब यह हादसा हुआ तब उसकी उम्र महज 26 साल थी और हादसे के कुछ दिनों बाद ही उसकी सगाई होने वाली थी। लेकिन उस हादसे ने मुकेश की सारी खुशियां छीन ली और जीवन भर की विकलांगता का दंश भी दे दिया। लेकिन मुकेश ने इस सब विषम हालातो को अपने ऊपर हावी नही होने दिया और मजबूत मानसिक शक्ति का परिचय देते हुए वापस से अपने जीवन को पटरी पर लाने का साहस दिखाया जो समाज मे कई लोगो के लिए मिसाल जरूर बनेगी।

राजस्थान पत्रिका बना मुकेश का संबल

वर्ष 2008 में हादसे के बाद विभाग ने दो साल तक उसकी सुध नहीं ली न ही इलाज और सहायता राशि ही मुहैया करवाई। यहां तक कि उसका प्रोबेशन पूरा नहीं होने के चलते उसे नौकरी से निकालने की भी तैयार हो गई थी। लेकिन राजस्थान पत्रिका ने मुकेश के घर जा कर उसकी पीड़ा देखी और इस मामले को लेकर अभियान शुरु किया। इसके बाद मुकेश को आर्थिक मदद दी गई। उसे नियमित कर तबादला भी भीलवाड़ा से अजमेर उसके घर के निकट के कार्यालय में किया गया। बकाया वेतन व अन्य परिलाभ का चेक भी उसके घर भेजा गया। लापरवाही बरतने वाले कार्मिकों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई। तत्तकालीन सीएमडी भी मुकेश से मिलने पहुंचे।

इनका कहना है

मुकेश को वापस से काम पर लौटने के लिए विभाग की और से कोई दबाव नही था, लेकिन यह उसकी मजबूत मानसिक इच्छाशक्ति और काम के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भाव ही था जिसने उसे वापस दफ्तर की राह दिखाई। मुकेश चल फि र नही सकता, लिहाजा सोलर बाइक पर बैठे-बैठे ही अपनी जिम्मेदारी निभाकर प्रेरणा देने का काम कर रहा है। दिनेश सिंह,अधिशाषी अभियंता, अजमेर डिस्कॉम,खंड मदार

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Bhupendra malviya Reporting
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