क्रिकेट के दिव्य खिलाड़ी ही नहीं बेहतरीन जेहन वाले इंसान भी हैं एलिस्ट कुक , पढ़ें कुक का क्रिकेट सफर

क्रिकेट के दिव्य खिलाड़ी ही नहीं बेहतरीन जेहन वाले इंसान भी हैं एलिस्ट कुक , पढ़ें कुक का क्रिकेट सफर

Sonam Ranawat | Publish: Sep, 07 2018 08:38:35 PM (IST) Ajmer, Rajasthan, India

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उपेन्द्र शर्मा/अजमेर .जो क्रिकेट को प्रेम करते हैं। जानते हैं। समझते हैं। उनको मालूम है एलिस्टर कुक के संन्यास लेने का मतलब। कुक न सिर्फ टेस्ट क्रिकेट के दिव्य खिलाड़ी हैं, बल्कि बेहतरीन जेहन वालेइंसान भी हैं। एक नजर डालिए इन आंकड़ों पर कि उन्होंने टेस्ट मैचों में 12254 रन बनाए हैं और उनकी उम्र सिर्फ 33 साल है। उनका कॅरियर महज 12 साल पुराना है। वे सचिन तेन्दुल्कर (जिन्होंने 39 साल की उम्र तक क्रिकेट खेला) के 15,900 रनों से करीब 2600 रन दूर हैं। और कुक ने संन्यास लेने का फैसला कर लिया है। शुक्रवार को वे भारत के खिलाफ अपना आखिरी टेस्ट मैच खेलें

 

क्या यह भारत या किसी एशियाई मुल्क (क्रिकेटमय) में संभव है। यहां चाहे बल्ले से रन ना बन रहे हों। गेंदों पर विकेट ना मिल रहे हों, लेकिन खिलाड़ी कुछ विशेष रिकॉड्र्स हासिल करने तक खेलते रहते हैं। बहुत से युवा खिलाडिय़ों की जगह पर।


कुक जिस मुकाम पर हैं, अगर वे एक औसत बल्लेबाज की तरह 30-35 रन भी प्रति पारी बनाएं तो भी अगले दो साल में सचिन का रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं। हां, वे अपनी ही तरह खेलें तो यह कहानी सिर्फ 14-15 महीनों में खत्म हो सकती है। फिर भी संन्यास की घोषणा हम भारतीयों को चौंकाती है, क्योंकि हम इस तरह के निर्णायक निर्णयों के आदी नहीं हैं। हमें थोड़ा लिजलिजापन, घिसटना, खुरचना पसंद है। यह प्रवृत्ति केवल खिलाडिय़ों में ही नहीं यहां हर आदमी सेवानिवृत्ति के बाद एक सेवा विस्तार या दूसरे ामध्ङामद ाकी जरूरत महसूस करता है, और इसे अपना हक भी मानता है।

 

आखिर हुआ भी क्या है? बहुत से बल्लेबाजों का खेल एक-दो सीरिज में बिगड़ जाता है। वे चाहकर भी रन नहीं बना पाते हैं। बल्लेबाजों के लिए 33 की उम्र भी कोई बाधा नहीं है। फिर हुआ क्या है? सिर्फ कुछ मैचों में ठीक नहीं खेलने मात्र पर संन्यास। पर इसके पीछे पश्चिम की वो जीवन प²ति है, जिसका पालन कुक के पूर्व भी कुछ खिलाडिय़ों ने किया है।

यह एक तरह की ईमानदारी है कि जब आप भीतर से जान जाते हैं कि आप वो नहीं कर पा रहे हैं, जिसकी आप से अपेक्षा है, तो आप दूसरों से बेहतर होते हुए भी ठीक ऐसा ही कोई निर्णय करते हैं। कुछ मैंचों में विकेट के पीछे 3-4 कैच छूटने मात्र से एडम गिलक्रिस्ट संन्यास ले लेते हैं। खेलने की इच्छा में कमी होने मात्र से विश्व कप (2015 ) जीतने के बावजूद माइकल क्लाक्र्स क्रिकेट को अलविदा कह देते हैं। गैरी किस्र्टन, केविन पीटरसन, ग्लैन मैकग्रा, ब्रायन लारा, रिकी पोंटिंग बहुत से खिलाडिय़ों ने कई विश्व रिकॉड्र्स के बेहद करीब पहुंचने पर भी संन्यास लिया है।


एशियाई क्रिकेट में चाहे इमरान खान, वसीम अकरम, सचिन तेन्दुल्कऱ, सौरव गांगुली, इंजमाम उल हक, शाहिद अफरीदी, महेला जयवर्धने, कुमार संगकारा, मिस्बाह उल हक आदि बहुत से नाम हैं, जो प्रदर्शन में लगातार गिरावट के बावजूद खेलते रहे।

सीनियर खिलाडिय़ों के इस रवैये की वजह से इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों की टीमें तरोताजा बनी रहती हैं। इसके विपरीत सैंकड़ों की संख्या में प्रतिभाओं की मौजूदगी के बावजूद भारतीय टीम में वो ताजगी नजर नहीं आती है।

जब खिलाड़ी वापसी कर पाने में नाकामयाब होते हैं, तो फिर संन्यास की घोषणा करते हैं, जिस पर कोई ध्यान भी नहीं देता

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