सावधान...ये किस राह जा रहे हमारे बच्चे, जल्दी से होना चाहते हैं ये बड़ा

सावधान...ये किस राह जा रहे हमारे बच्चे, जल्दी से होना चाहते हैं ये बड़ा

raktim tiwari | Publish: Aug, 11 2018 10:28:00 AM (IST) Ajmer, Rajasthan, India

www.patrika.com/rajasthan-news

रक्तिम तिवारी/अजमेर।

रैगिंग का नाम सुनते ही विद्यार्थियों की कंपकंपी छूटने लगती है। सीनियर्स की बेवजह की मारपीट, अपशब्दों की बौछार, शर्तें-फरमाइशें पूरी करना जूनियर के लिए नामुमकिन होता है। कई तो प्रताडऩा नहीं झेल पाते और अपनी जिंदगी खत्म कर बैठते हैं। भले सुप्रीम कोर्ट ने अमन काचरू की मौत के बाद रैगिंग को अपराध घोषित कर दिया,पर मामले निरन्तर उजागर हो रहे हैं। कभी इसका दायरा कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक सिमटा था, पर अब रैगिंग की जलकुंभी स्कूल तक जा पहुंची है। स्मार्ट फोन चलाने वाले स्कूली विद्यार्थी पीढ़ी तो कुछ ज्यादा ही तेज-तर्रार हो गई।

शर्मनाक हरकत..
प्रदेश के एक प्रतिष्ठित स्कूल में एक छात्र को प्रताडि़त करने के नाम पर शुरू हुआ रैगिंग का सिलसिला शर्मनाक उत्पीडऩ में तब्दील हो गया। मामला वरिष्ठ छात्रों की मारपीट, अनावश्यक परेशान करने, गाली-गालौच तक होता था तो शायद दबा रह जाता। लेकिन सीनियर्स ने जो अश्लीलता की हदें पार कीं, उससे सामाजिक परम्पराएं, मूल्य और दोस्ती भी शर्मसार हो गई। किशोर विद्यार्थियों में पनपती अश्लीलता वास्तव में चिंता का करण है। यह खतरनाक अमर बेल स्कूल में तेजी से पनप रही है।

कहां गया अनुशासन
विद्यालयों के सख्त अनुशासन, कैमरे से चौकसी, छात्र-छात्राओं से मनोवैज्ञानिक संवाद करने की पोल यूं खुलती नजर आ रही है। अब नैतिक मूल्यों और अनुशासन की धज्जियां उड़ती दिखती है। गुरुओं और शिष्यों के संबंध अब दोस्ताना परिभाषा में ढलने लगे हैं। विद्यालयों में कहीं खुलेआम तो कहीं चोरी-छिपे शराब और मादक पदार्थ पहुंच चुके हैं। किशोर विद्यार्थियों को नशे की लत ने जकडऩा शुरू कर दिया है। कई संस्थाओं के सहकर्मी जरा से लालच में विद्यार्थियों तक मादक द्रव्य पहुंचाने से नहीं चूक रहे। गुरुकुल परम्परा वाले देश में कम उम्र के बच्चे अलग राह चल पड़े हैं।

जल्द हो जाना चाहते बड़ा
खासतौर पर आधुनिक सुविधाओं और चकाचौंध में रहने वाले बच्चे छोटी उम्र में ' सबकुछ Ó हासिल कर लेना चाहते हैं। कई तो इसे फैशन, मनोरंजन और तात्कालिक लुत्फ से ज्यादा कुछ नहीं मानते। कभी सरकारी अथवा निजी विद्यालयों में प्राचार्य और शिक्षकों का जबरदस्त खौफ रहता था। पढ़ाई में पिछडऩे, गृहकार्य पूरा नहीं होने और बदतमीजी पर शिक्षक तत्काल दंड देते थे। अभिभावक कभी गुरुओं की दी सजा का विरोध नहीं करते थे। कम्प्यूटर और तकनीकी युग में माहौल बदल चुका है।

नहीं दे सकते अब सजा
ना अब बच्चों को दंड दिया जा सकता है ना गुरु उन्हें टोकना-रोकना चाहते हैं। तेजी से बदलते देश की यह तस्वीर खौफजदा करने वाली है। हालात भयावह हों उससे पहले पाल बांधनी जरूरी है। इसके लिए बहुत ज्यादा सख्ती या बेहद नरमी के बजाय मध्यम मार्ग अपना होगा। शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों को भी जिम्मेदारी समझते हुए बच्चों की दिनचर्या, शारीरिक बदलाव और व्यवहार को समझते हुए नई भूमिका में आना पड़ेगा। तभी कोई सार्थक परिणाम सामने आ सकते हैं।

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

खबरें और लेख पड़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते है । हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते है ।
OK
Ad Block is Banned