कभी दूर से दिखती थी इनकी खूबसूरती, अब पास में भी नहीं ढूंढ सकते इनको

नियमों को ताक पर रख कर सभी ऐतिहासिक भवन और स्मारक स्थल पूरी तरह से अतिक्रमियों के कब्जे में हैं।

By: raktim tiwari

Published: 22 Aug 2017, 08:41 AM IST

शहर में मौजूद ऐतिहासिक इमारतों को अवैध कब्जे से बचाने की कवायद में भले ही पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग योजनाएं बना रहा हो,लेकिन शहर के सभी मौजूदा स्मारक और ऐतिहासिक भवन अतिक्रमण की गिरफ्त में हैं। पुरातत्व विभाग के लिए इनकी सुरक्षा एंव संरक्षण एक चुनौती के समान है।

हालांकि, हाईकोर्ट नियमों के मुताबिक ऐतिहासिक स्मारकों से 200 मीटर की परिधि तक निर्माण कार्य प्रतिबंधित है, लेकिन नियमों को ताक पर रख कर सभी ऐतिहासिक भवन और स्मारक स्थल पूरी तरह से अतिक्रमियों के कब्जे में हैं।

किसी स्मारक आस पास बड़ी होटलें बन गयी हैं तो कई स्मारकों के मुख्य द्वार पर चाय-नाश्ते के ठेले लगे हैं। अतिक्रमण हटाना तो दूर की शहर में ऐसे कई धरोहर है जिन्हें पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जा सकता है, उन्हें भी बदहाल स्थिति में छोड़ दिया गया है। नयाबाजार स्थित बादशाह बिल्डिंग,अंदरकोट स्थित ढाई दिन का झोंपड़ा, आनासागर बारादरी, अकबर का किला आदि ऐतिहासिक इमारतें मौजूद हैं। लेकिन देखरेख के अभाव में ये अतिक्रमण की चपेट में हैं। साथ ही इनके आसपास गंदगी का अंबार लगा देखा जा सकता है।

बादशाही बिल्डिंग बनी नशाखोरी का अड्डा

नया बाजार स्थित यह भवन किसी हिन्दू का हुआ करता था, मुगलकाल में उनके मातहतों के लिए आवास के रूप में अमल किया गया। वर्तमान में यह जगह नशाखोरों का ठिकाना बना हुआ है। यह इमारत अतिक्रमण की चपेट में है। इसके मुख्य द्वार पर चाय नाश्ते के ठेले लगते हैं। लोगो ने इसे पार्किंग स्थल तक बना दिया है। दो सौ मीटर तो दूर इसके चारों तरफ आधे आधे किलोमीटर के दायरे में अतिक्रमण की भरमार है।

विज्ञापन का केंद्र देहली गेट

ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग देहली गेट अतिक्रमण की चपेट में है। गेट के 200 मीटर के दायरे में एक या दो नही 50 से 60 अवैध निर्माण हैं। गेट के आस पास ठेले वालों का जमावड़ा लगा रहता है। अतिक्रमण इतना है कि गेट तक पहुंचने में लगभग 10 से 15 मिनट की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यही नही देहली गेट को लोगों ने विज्ञापन केंद्र बना लिया है। अनगिनत इश्तहार लगा कर इस गेट की सुंदरता को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।

अब्दुल्ला खां और बीबी का मकबरा

स्टेशन रोड पर 1710 ईसवी में बना अब्दुल्ला खां और बीबी का मकबरा भी ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है। लेकिन उनका संरक्षण केवल ताले लगाकर किया गया है इमारतों के आसपास कहीं बहुमंजिला इमारतें ओर दुकानें खुली हुई है तो कुछ निर्माणाधीन भी है। इनके बाहर भी अवैध पार्किंग का अड्डा बन गया है।

किला और म्यूजियम के पीछे शौचालय
अजमेर की ऐतिहासिक इमारतों में विशेष स्थान रखने वाला अजमेर का किला (अकबर का किला) का जीर्णोद्धार कर रंग-रोगन को मरम्मत की गई है लेकिन किले के कुछ भागों में दीवारों पर पेड़-पौधे हो गए हैं तो किले के पिछले भाग की बाउंड्री वॉल क्षतिग्रस्त है जो 200 मीटर के दायरे में आने वाले खाईलैंड मार्केट के लिए शौचालय का काम कर रहा है। यहां भी कई बहुमंजिला इमारतें और दुकानें बनी हुई हैं।

अढाई दिन का झोपड़ा बेकद्री का शिकार

अंदरकोट स्थित लगभग ८०० वर्ष पुराना अढाई दिन का झोपड़ा बेकद्री का शिकार है। इस इमारत के २०० मीटर के दायरे में अतिक्रमण व गंदगी का अंबार है। लोगों ने इमारत की सीढि़यों तक को नहीं छोड़ा। सीढि़यों पर खाद्य सामग्री विक्रेताओं ने अपने ठेले जमा लिए हैं। इस इमारत के आस पास असंख्य होटलों का निर्माण हो गया है। होटलों के कारण झोपड़े तक पहुंच पाना मुश्किल हो गया है। इस इमारत के आस पास पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है जो वहां दिनभर गंदगी फैलाते हैं।

बारादरी बनी खानाबदोशों की आरामगाह
एक समय पर बारादरी शहरवासियों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र हुआ करती थी। दूर दराज से आने वाले पर्यटक यहां आने से अपने आप को रोक नहीं पाते थे। लेकिन वर्तमान समय में यह ऐतिहासिक इमारत खानाबदोशों की आरामगाह बनी हुई है। शहरभर के असामाजिक तत्च यहां अवैध कार्यों को अंजाम देते हैं। खाद्य वस्तु विक्रेता यहां गंदगी फैलाते हैं। सुभाष उद्यान के बाहर हाथ ठेला मालिकों डेरे जमा रखे हैं।

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