पैर पसार रहा सफेद मावे का काला धंधा

बीते साल 299 में से 90 नमूने फेल, 50 से अधिक की रिपोर्ट आना बाकी

तीन राज्यों में खाद्य पदार्थों में मिलावट का अड्डा बने धौलपुर जिले में खाद्य विभाग की कार्रवाई होने के लाख दावे किए जाते रहे हों लेकिन मिलावट खोर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। बीते साल खाद्य विभाग की सैंपलिंग की कार्रवाई में 40 फीसदी सैंपलों की रिपोर्ट में मिलावट होना सामने आया है।

By: Dilip

Published: 12 Jan 2021, 11:57 PM IST

मिलावट का गढ़: धौलपुर

-बीते साल २९९ में से ९० नमूने फेल, ५० से अधिक की रिपोर्ट आना बाकी

-कार्रवाईयों के बाद भी नहीं थम रहा मिलावट का व्यापार

-अधिकांश कारखाने गांवों में लगे, दबिश देने से कतरा रहा विभाग

धौलपुर. तीन राज्यों में खाद्य पदार्थों में मिलावट का अड्डा बने धौलपुर जिले में खाद्य विभाग की कार्रवाई होने के लाख दावे किए जाते रहे हों लेकिन मिलावट खोर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। बीते साल खाद्य विभाग की सैंपलिंग की कार्रवाई में ४० फीसदी सैंपलों की रिपोर्ट में मिलावट होना सामने आया है। राजस्थान के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश में बड़ी मात्रा में मिलावटी मिठाइयां सहित मावा आपूर्ति का कार्य धौलपुर जिले से होने का सिलसिला जारी है। वहीं, जिले में बढ़ते मिलावटी मावे को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में कारखाने होना भी सामने आया है, लेकिन दबिश देने से स्थानीय खाद्य विभाग कतराता नजर आ रहा है।
१ जनवरी २०२० से ३१ दिसम्बर २०२० तक खाद्य विभाग की ओर से जिले में विभिन्न स्थानों से २९९ सैंपल लिए गए। इन सैंपल में करीब २५० सैंपल की जांच रिपोर्ट आ चुकी है, जिसमें करीब ८० से ९० सैंपल फेल हुए हैं, जबकि ५० से अधिक सैंपलों की अभी रिपोर्ट आना बाकी है। जिन सैंपलों की रिपोर्ट फेल निकली उनमें अधिकांश सैंपल मावे के है। दीपावली सीजन में खाद्य विभाग ने एक कोल्ड स्टोरेज से बड़ी मात्रा से मावा जब्त किया था उसके २६ नमूनों में से २३ नमूनों की रिपोर्ट फेल होने के बाद प्रशासन ने इस मावे को नष्ट करने की कार्रवाई की।

मुफीद जगह है धौलपुर
धौलपुर तीन राज्यों की सीमा पर स्थित है। राजस्थान के अंतिम छोर पर स्थित जिले से १६ किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश राज्य शुरू हो जाता है तो मात्र पांच किलोमीटर दूर चलते ही मध्यप्रदेश आ जाता है। हाइवे पर कई गांव स्थित होने के कारण कच्चे रास्तों पर व्यापारियों ने फैक्ट्रियां स्थापित की हुई हैं। इनमें नकली मावा सहित नकली मिठाइयों का कारोबार धड़ल्ले से होता है।

समीपवर्ती प्रदेशों में भी बड़ी मात्रा में आपूर्ति की जाती है। जिस पर आसानी से किसी की नजर ही नहीं पड़ती है। बड़ा सवाल यह है कि कई फैक्ट्रियों का तो स्वास्थ्य विभाग तक को पता नहीं है। दो वर्ष पहले सुआ का बाग से पकड़ी गई नकली मावा बनाने का कारखाना एक किराए के मकान में चल रहा था। घरों के बेसमेंट में भी कारखाने चल रहे हैं। इनमें से अधिकांश कारखाने गांवों में लगे हुए हैं। जहां से पैक्ड मावा हाइवे होते हुए राजस्थान ही नहीं उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश के जिलों में जा रहा है।
गांवों में फैला में मिलावट खोरों का जाल

जिले में चल रहे सफेद मावे के काले धंधे को देखकर भी जिले का स्वास्थ्य विभाग अभी तक तह तक नहीं पहुंच पाया है। एक ओर तो जिले में चले रहे नकली मावे को पकडऩेे के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कार्रवाईयों के दौरान रसूखदारों व राजनैतिक प्रभाव के चलते जो चल रहा है, उसे देखकर जिले का खाद्य विभाग के अधिकारी भी मौन साधने में भलाई समझते हैं।
कार्रवाईयों पर सवाल

कहने को जिले में त्योहारी सीजन के दौरान खाद्य विभाग की टीम की ओर से जिले भर में सैपलिंग लेकर हल्ला तो जोर-शोर से मचाया जाता है, लेकिन अभी तक सैपलिंग की रिपोर्ट को आने के बाद जिले में सफेद मावे के काले मुनाफाखारों के नामों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है। गंभीर बात यह है कि शहर में लगने वाली मावा मंडी में नकली मावा १२० से १४० रुपए तक में बिकता देखा जा सकता है।

इनका कहना...

जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में मिलावटी मावे का धंधा पकडऩे के लिए दबिश दी जा रही है। विभाग की ओर से गत वर्ष अब तक की सर्वाधिक नमूने लेने की कार्रवाइयां की गई है।
विश्व बंधु गुप्ता, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, धौलपुर

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